Ajit Pawar Demise: अजित पवार का वो सपना', जो निधन के साथ ही दफन हो गया, जिसके लिए अपनों से की थी बगावत
Ajit Pawar Plane Crash: महाराष्ट्र की राजनीति के 'पावर हाउस' और रिकॉर्ड छह बार उपमुख्यमंत्री का पद संभालने वाले अजित पवार का सफर एक ऐसी त्रासदी के साथ समाप्त हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उनके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि जिस मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए उन्होंने कई बार बगावत की और अपनी राजनीतिक बिसात बिछाई, वह उनके लिए हमेशा एक सपना ही बनकर रह गई।
बारामती के अपने ही घर में, बजट पेश करने से ठीक एक महीने पहले, 'दादा' का अंत उनके उन अनगिनत समर्थकों को गहरा सदमा दे गया, जो उन्हें 'जनता का मुख्यमंत्री' बनते देखना चाहते थे।

Ajit Pawar CM Ambition: छह बार डिप्टी सीएम, पर शीर्ष पद से दूरी
अजित पवार का राजनीतिक रिकॉर्ड अद्भुत रहा। वे कांग्रेस, शिवसेना और भाजपा जैसी परस्पर विरोधी विचारधारा वाली सरकारों में उपमुख्यमंत्री बने। 2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ तड़के ली गई 80 घंटे की शपथ हो या 2023 में चाचा शरद पवार से बगावत कर महायुति में शामिल होना, हर कदम के पीछे उनकी एक ही इच्छा थी-राज्य का नेतृत्व करना। उन्होंने कभी अपनी इस महत्वाकांक्षा को छुपाया भी नहीं, लेकिन गठबंधन की मजबूरियों और सियासी समीकरणों ने उन्हें हमेशा नंबर दो की कुर्सी तक ही सीमित रखा।
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Ajit Pawar Demise: विवादों का साया और 'दादा' की बेबाकी
अजित पवार अपनी कड़क कार्यशैली और समय की पाबंदी के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी बेबाकी अक्सर विवादों का कारण बनी। 2013 में सूखे को लेकर दिया गया उनका 'पेशाब' वाला बयान हो या बिजली कटौती पर की गई टिप्पणी, इन बयानों ने उन्हें आलोचनाओं के घेरे में रखा। हालांकि, उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी मांगकर अपनी गलतियों को स्वीकारा भी। सिंचाई घोटाले और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के बीच भी वे अडिग रहे और हर बार राजनीतिक रूप से पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरे।
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चाचा से बगावत और अपनी पहचान की जंग
जुलाई 2023 उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ था। शरद पवार की छत्रछाया छोड़कर उन्होंने राकांपा के नाम और निशान पर दावा ठोका। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद आलोचकों ने उन्हें 'खत्म' मान लिया था, लेकिन विधानसभा चुनाव में 41 सीटें जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि महाराष्ट्र की ग्रामीण जनता आज भी 'दादा' के विकासवाद पर भरोसा करती है। उन्होंने बारामती से आठ बार विधायक रहकर अपनी एक ऐसी रियासत बनाई थी, जिसे हिला पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं था।
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Baramati aircraft accident: बजट से पहले बुझ गया राजनीति का सूरज
अजित पवार केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि प्रशासन के माहिर खिलाड़ी थे। वित्त मंत्री के रूप में वे फरवरी 2026 का बजट पेश करने की तैयारी में जुटे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 22 जुलाई 1959 को जन्मे अजित पवार ने जिस चीनी कारखाने से 1982 में अपना सफर शुरू किया था, उसका अंत बारामती की उसी मिट्टी में एक विमान दुर्घटना के साथ हुआ। उनके जाने से महाराष्ट्र ने एक ऐसा नेता खो दिया है, जो स्पष्टवादी था, कर्मठ था और जिसने विकास के लिए विचारधाराओं की दीवारें लांघ दी थीं।












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