865 गांवों पर क्यों झगड़ रहे हैं महाराष्ट्र और कर्नाटक

प्रतीकात्मक तस्वीर, महाराष्ट्र

महाराष्ट्र विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर कर्नाटक के 865 गांवों को अपने यहां मिलाने की 'कानूनी प्रक्रिया' शुरू करने की बात कही है. कुछ ही दिन पहले कर्नाटक विधानसभा ने ऐसा ही एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें कहा गया था कि अपनी एक इंच जमीन भी किसी अन्य राज्य को नहीं दी जाएगी.

नेताओं के बीच का यह विवाद हिंसा के रूप में सीमा तक पहुंच चुका है. बीते मंगलवार दोनों राज्यों में एक दूसरे के वाहनों पर हमले किए गए. इस तरह हिंसा के और भड़कने का डर भी बढ़ गया है. क्या है यह विवाद जिसने मसले को बारूद के ढेर में बदल दिया है?

महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद

महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों के बीचसीमा विवाद की जड़ 1956 के राज्य पुनर्गठन कानून में है. इस कानून के तहत राज्यों को भाषा के आधार पर पुनर्गठित किया गया था. इस तरह 1 मार्च 1960 को महाराष्ट्र वजूद में आया. तभी से यह उन 865 गांवों पर दावा कर रहा है, जिनमें मराठी भाषी लोग रहते हैं. इन गांवों में बेलगावी (जिसे पहले बेलगाम कहते थे), कारवर और निपाणी शामिल हैं. कर्नाटक इन गांवों को छोड़ने को राजी नहीं है.

25 अक्टूबर 1966 को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे मेहर चंद महाजन की अध्यक्षता में एक आयोग बनाया गया था जिसने बेलगाम पर महाराष्ट्र के दावे को खारिज कर दिया था. हालांकि उस आयोग ने 264 गांवों को महाराष्ट्र में शामिल करने की सिफारिश की थी. इन गांवों में निपाणी, खानपुर और नंदगढ़ शामिल हैं. साथ ही आयोग ने महाराष्ट्र के 247 गांवों को कर्नाटक को देने की सिफारिश भी की थी. इन गांवों में जट्ट, अक्कलकोट और सोलापुर शामिल थे.

महाराष्ट्र ने आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया और यह विवाद लटक गया. 2004 में महाराष्ट्र ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. उसी दौरान कर्नाटक ने बेलगाम का नाम बदकर बेलगावी कर दिया और उसे राज्य की दूसरी राजधानी बना दिया.

कानूनी हल की जरूरत

कर्नाटक और महाराष्ट्र दोनों ही राज्य इस बात को समझ रहे हैं कि अब इस विवाद का हल राजनीतिक तरीकों से नहीं निकाला जा सकता और इसे कानूनी तरीकों से हल किए जाने की जरूरत है. 2004 से ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. दोनों राज्य अपने-अपने दावे छोड़ने को तैयार नहीं हैं. अलग-अलग दलों की सरकारें आने के बावजूद राज्यों के रुख नहीं बदले हैं.

कब बुझेगी पूर्वोत्तर में सीमा विवाद की आग?

2010 में केंद्र सरकार ने एक हलफनामे में पुनर्गठन कानून के तहत राज्यों की सीमाओं के निर्धारण को सही ठहराया था. सरकार ने कहा जिन 1956 के कानून के तहत क्षेत्र विशेष को अलग-अलग राज्यों को देना सही था.

विवाद पर राजनीति

यह विवाद हमेशा से दोनों राज्यों की राजनीति के केंद्र में रहा है. महाराष्ट्र में हर पार्टी के घोषणापत्र में इस मुद्दे का जिक्र होता है और राज्यपाल जब विधानसभा में भाषण देते हैं, तब भी इस विवाद पर बात होती है. लेकिन इस बार मामला आगे बढ़ गया है.

दो हफ्ते पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने सीमा विवाद की समीक्षा करने के लिए एक बैठक बुलाई और अपने दो मंत्रियों, चंद्रकांत पाटील व शंभूराज देसाई को इस विवाद के राजनीतिक व कानूनी हल खोजने की जिम्मेदारी सौंप दी. साथ ही, उन्होंने बेलगावी और अन्य मराठीभाषी इलाकों के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए पेंशन और मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं का ऐलान कर दिया.

एक ही दिन बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने जवाबी कार्रवाई करते हुए महाराष्ट्र के कन्नड़ स्कूलों के लिए वित्तीय मदद की घोषणा कर दी. बोम्मई ने यह भी कहा कि उनकी सरकार महाराष्ट्र के सांगली जिले के 40 गांवों पर दावा करने पर विचार कर रही है. सोलापुर जिले के कुछ सीमांत गांवों पर भी बोम्मई ने दावा ठोक दिया है.

इस कदम की महाराष्ट्र में तीखी प्रतिक्रिया हुई और वहां के उप मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि उनकी सरकार 'एक भी गांव कर्नाटक को नहीं देगी.' उसके बाद ही जगह-जगह कई बार हिंसा हो चुकी है.

रिपोर्टः विवेक कुमार

Source: DW

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