UNESCO World Heritage: खजुराहो में दरक रही धरोहर, मतंगेश्वर मंदिर के गर्भगृह में टपक रहा बारिश का पानी
UNESCO World Heritage में शामिल खजुराहो के मंदिर को समय के साथ खतरा उत्पन्न होता जा रहा है। हाल ही में यहां पश्चिम मंदिर समूह की तरफ स्थित प्रसिद्ध मतंगेश्वर मंदिर का मामला सामने आया है। यहां मंदिर के अंदर गर्भ गृह में बारिश के दौरान पानी का रिसाव होने लगता है। मंदिर की दीवारों में जगह-जगह से पानी के रेले बहते नजर आते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है की मंदिर की छत अर्थात गुंबद और छत में कई जगह से पानी पतली धार के रुप में नीचे आता है।

प्रसिद्ध मतंगेश्वर मंदिर बारिश के दौरान धारे बह रहे हैं
यूनेस्को की विश्व धरोधर में शामिल खजुराहो के मंदिर को समय के साथ खतरा उत्पन्न होता जा रहा है। हाल ही में यहां पश्चिम मंदिर समूह की तरफ स्थित प्रसिद्ध मतंगेश्वर मंदिर का मामला सामने आया है। यहां मंदिर के अंदर गर्भ गृह में बारिश के दौरान पानी का रिसाव होने लगता है। मंदिर की दीवारों में जगह-जगह से पानी के रेले बहते नजर आते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है की मंदिर की छत अर्थात गुंबद और छत में कई जगह से पानी पतली धार के रुप में नीचे आता है।

मंदिर में छाता लागाकर बैठते हैं पुजारी
मतंगेश्वर मंदिर में बारिश के दौरान बाकी मंदिर तो ठीक गर्भगृह में ही हालात खराब हो जाते हैं। यहां चारों तरफ फर्श पर पानी ही पानी फैल जाता है। बहते हुए पानी में बैठना भी दूभर होता है। मंदिर में पूजा पाठ कराने वाले पुजारी प्रदीप गौतम छाता लेकर बैठते हैं और श्रृद्धालु भी छाता लगाकर दर्शन करते नजर आते हैं।

9वीं शताब्दी में निर्मित सबसे ऊंचा मंदिर है
मतंगेश्वर मंदिर खजुराहो मंदिर समूह में सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है। इसका निर्माण 9वीं सदी में 900 से 925 के बीच कराया गया था। मंदिर में 8.5 फीट लंबा शिवलिंग स्थापित है। कहते हैं कि हर साल यह एक फीट बढ़ता जा रहा है। बताते हैं कि मतंग ऋषि के नाम पर मंदिर का नाम मतंगेश्वर रखा गया है। महोबा के चंदेल शासक हर्षवर्मन ने मंदिर की स्थापना कराई थी।

मंदिर के संरक्षण में पुरातत्व विभाग बरत रहा लापरवाही
करीब तीन साल पहले खजुराहो में मतंगेश्वर मंदिर के ऊपर गुंबद से नीचे तक पत्थरों पर पालिस कराया गया था, इसी क्यूरेशन के दौरान शिखर सी नीचे की ओर पानी का सीपेज सिस्टम बिगड़ गया है। दो साल पहले तक यहां ऐसी कोई समस्या नहीं थी, लेकिन अचानक दो साल से यह समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। विभाग को एसडीएम स्तर तक से जानकारी दी जा चुकी है, पुरातत्व विभाग के जबलपुर मुख्यालय को भी सूचना भेजी जा चुकी है, लेकिन यूनेस्को कि इस धरोहर को लेकर विभाग ने जवाब तक नहीं दिया है।












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