अजब-गजबः रंगीन कौवा जो गाता भी है! दिलेर इतना कि बाघ के मुंह से निवाला छीन लाता है
सागर, 24 सितंबर। कौवे केवल काले नहीं होते, रंगीन भी होते हैं और इन्हें गाना भी पसंद है। इनकी आवाज काले कौवों जैसी कर्कश नहीं होती है, बल्कि सुरीली आवाज निकालते हैं। कभी-कभी आभास होता है कि ये गा रहे हैं। मप्र के बुंदेलखंड से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया के आसपास के इलाकों में रंगीन कौवे पाए जाते हैं। सामान्यतः यह आबादी से दूर रहते हैं। हालांकि सामान्य कौवों की तरह इन्हें भी जोड़े में या समूह में रहना पसंद होता है। यह जंगलों के आसपास ज्यादातर पाए जाते हैं। इस इलाके के यह मूल निवासी हैं। इनका वैज्ञानिक नाम रूफस ट्रीपी (Rufous Treepie) है। ये कौवा परिवार के ही सदस्य हैं।

कौवा फैमिली में एक प्रजाति ऐसी भी होती है, जो रंगीन होती है
कौवो को लेकर आम धारणा है कि वह काला ही होता है, लेकिन हमारी दुनिया में पशु-पक्षियों का अनूठा संसार है। कौवा फैमिली में एक प्रजाति ऐसी भी होती है, जो रंगीन होती है और इन्हें गोयल की तरह सुरीली होती है, इन्हें गाना भी पसंद हैं! आपने इन्हें कई दफा देखा भी होगा। लेकिन इन्हें अलग तरह का पक्षी समझकर ध्यान नहीं दिया जाता। हम बात कर रहे हैं कौवा परिवार से ही आने वाले रुफस ट्रीपी पक्षी की, जो देखने में कौवे से जरा छोटा होता है, लेकिन दिखता उसी की तरह है। इसके अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों में बीते सालों में कौवों की सफेद प्रजाति भी देखी जा चुकी है। देश दुनिया में कौवों की करीब 40 से प्रजातियां मौजूद हैं, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पाई जाती हैं। भारत में कौवों की मूल रुप से 6 प्रजातियां सामान्यतः देखी जाती हैं।

रंगीन कौवा रुफस ट्रीपी की आवाज तेज व संगीतमय होती है
रंगीन कौवा जिसका वैज्ञानिक नाम रूफस ट्रीपी है यह कौवा परिवार से आता हैं। दिखने में लगभग कौवे जैसा ही होता है, लेकिन लंबाई उससे कम होती है। इसकी पूछ लंबी होती हैं। यह तेज आवाज निकालता है और संगीतमय तरीके से बोलता है। इसका रंग और यही आवाज इसकी विशिष्ट पहचान है, जो इसके कौवे से अलग रखती है। यह मुख्य रुप से फल, बीज, अकशेरुकी और छोटे-छोटे सरीसृपों को अपना भोजन बनाता है। दूसरे शब्दों में यह सर्वआहारी पक्षी माना जाता है। बुंदेलखंड के जंगलों में खास तौर से पन्ना टाइगर रिजर्व के जंगलों में इसे आसानी से देखा जाता है। यहां यह व्यापक रुप से पाया जाता है।

ये बुद्धिमान पक्षियों की प्रजाति में शामिल हैं
कौवा परिवार हमारे यहां व अन्य देशों में एक बुद्धिमान पक्षी के रुप में माना जाता है। रंगीन कौवा भी इसी श्रेणी में आता है। यह सामान्यतः शहरों के आसपास से लेकर पार्क, फलों के बगीचों और जंगली जानवरों के बीच में देखे जाते हैं। पक्षियों में इन्हें सबसे चपल और चालाक माना जाता है। यह परिवार या समूह में रहना पसंद करते हैं और नर-मादा मिलकर घोंसला बनाते हैं। ये दलों के रुप में शिकार करने में भरोसा करते हैं। हालांकि यह मूल रुप से पेड़ों पर ही रहना पसंद करते हैं। यह झटकेदार फड़फड़ाती गति से उड़ान भरता है। इनके पैर में तीन अंगुलियां जिनमें दो आगे और एक अंगुली पीछे की तरफ होती है, जो इन्हें बैठने में मदद करती है।

बाघों के लिए डेंटिस्ट का काम करता है, हिरण के साथ भी घूमता है।
रंगीन कौवों अर्थात रुफस ट्रीपी की सबसे खास विशेषता है, जो इसके दुनिया के सारे पक्षियों से अलग व निडर बनाती है। यह इकलौता पक्षी है जो जंगल के राजा शेर के मुंह से अपना निवाला ले आता है। दरअसल यह परजीवी भी माना जाता है। शिकार करने के बाद जब बाघ आराम की मुद्रा में होता है तो उसके दांतों में फंसे मांस के टुकड़ों को रुफस ट्रीपी निकाल-निकालकर खाता रहता हैं। चूंकी बाघ को आराम मिलता है, इसलिए वह इसे कुछ नहीं कहता, बल्कि आराम से दांतों की सफाई कराता रहता है, इस कारण इसे बाघों का डेंटिस्ट भी कहा जाता है। इसी प्रकार यह हिरण के झुंड के आसपास भी नजर आता है, यह हिरण पर बैठकर उसके शरीर में रहने वाले छोटे-छोटे पिस्सु जैसे जीवों को निकालकर निवाला बनाता है। इस कारण इसके अक्सर हिरण की सवारी करते देखा जाता है।

सफेद कौवा! किवदंती नहीं हकीकत है, अलग-अलग हिस्सों में पाए गए
सामान्तः हमने अपने जीवन में काला कौवा ही देखा है। हमारे आसपास एक समय यह बहुतायत होते थे, लेकिन अब यह सिमटते जा रहे हैं। बीते सालों में मप्र के बड़वानी के दतवाड़ा गांव, सतना जिले में सफेद कौवा देखा गया था। जगदलपुर के दलपत सागर धरमपुरा इलाके के आसपास भी सफेद कौवे की तस्वीर सामने आई थी। कौवों के झुंड में इसे पहले लोगों ने कबूतर समझा बाद में पता चला कि यह सफेद रंग का कौवा ही है। हाल ही के दिनों में हिमाचल प्रदेश के एक शहर में भी काले कौवों के झुंड में एक सफेद कौवा देखा गया था, इसकी तस्वीर भी सामने आई थी। करीब एक महीने पहले हिमाचल के नाहन में भी काले कौवों के झुंड में दो सफेद रंग के कौवे दिखे थे। इनके अलावा झारखंड के चक्रधरपुर, इसके पहले दक्षिण भारत के कोयंबटूर व तिरुवनंतपुरम में भी दुर्लभ सफेद कौवे देखे जा सके हैं। इसी तरह देश की राजधानी दिल्ली में भी कुछ साल पहले सफेद कौवा दिखा था। वैज्ञानिकों का मत है कि अनुवांशिक दोष के जिसे ल्युसीज्म कहा जाता है उसकी वजह से इनका कभी कभार कौवे का रंग सफेद हो सकता है। कौवों की कई प्रजातियां ऐसी भी सामने आई हैं, जिनके शरीर पर कहीं न कहीं एकाध सफेद धब्बा होता ही है।
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