Malegaon Blast Case: प्रज्ञा ठाकुर की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, इस दिन आएगा फैसला
Malegaon News: 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल की पूर्व सांसद और बीजेपी नेता प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जमानत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई बंद कर दी है।
यह याचिका 2017 में विस्फोट के एक पीड़ित के पिता, निसार अहमद, ने दायर की थी, जिसमें उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा प्रज्ञा को दी गई जमानत को रद्द करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि ट्रायल कोर्ट में इस मामले का फैसला जल्द आने वाला है, इसलिए इस याचिका पर आगे विचार करने की जरूरत नहीं है।

क्या है Malegaonब्लास्ट केस?
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव में एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल पर रखे बम में हुए विस्फोट ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इस धमाके में 7 लोगों की जान चली गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। यह उन शुरुआती आतंकी घटनाओं में से एक थी, जिसमें दक्षिणपंथी हिंदुत्व समूहों पर संदेह जताया गया था। शुरुआती जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी, जिसने प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मुख्य आरोपी माना था। बाद में 2011 में यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया।
प्रज्ञा ठाकुर पर आरोप है कि उनकी मोटरसाइकिल, एक सुनहरे रंग की एलएमएल फ्रीडम, इस धमाके में इस्तेमाल हुई थी। हालांकि, प्रज्ञा ने दावा किया था कि उन्होंने यह बाइक 2004 में बेच दी थी। इसके अलावा, उन पर साजिश की बैठकों में शामिल होने और धमाके की योजना बनाने का भी आरोप है। इस मामले में उनके साथ लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, मेजर रमेश उपाध्याय, स्वामी दयानंद पांडे, अजय रहीरकर, समीर कुलकर्णी और सुधाकर चतुर्वेदी भी आरोपी हैं।
Malegaon: जमानत का विवाद और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
प्रज्ञा ठाकुर को 24 अक्टूबर 2008 को गिरफ्तार किया गया था और उन पर मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून) समेत कई गंभीर धाराएं लगाई गई थीं। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 15 अप्रैल 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने मकोका हटा दिया, और 25 अप्रैल 2017 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रज्ञा समेत सातों आरोपियों को जमानत दे दी। हाईकोर्ट ने प्रज्ञा को 5 लाख रुपये के निजी मुचलके पर जमानत देते हुए कहा था कि उनके खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि प्रज्ञा एक महिला हैं, जो आठ साल से ज्यादा समय तक जेल में रही थीं और ब्रेस्ट कैंसर के कारण उनकी सेहत खराब है।
हालांकि, इस जमानत के खिलाफ निसार अहमद ने 2017 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। उनकी मांग थी कि प्रज्ञा की जमानत रद्द की जाए, क्योंकि यह मामला गंभीर आतंकी घटना से जुड़ा है। 2 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि एनआईए कोर्ट ने 19 अप्रैल 2025 को इस मामले में फैसला सुरक्षित कर लिया है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस याचिका पर आगे सुनवाई करने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए याचिका पर सुनवाई बंद कर दी।
ट्रायल कोर्ट में फैसला 8 मई को संभावित
मुंबई की विशेष एनआईए कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अब अपने अंतिम चरण में है। प्रज्ञा ठाकुर के वकील ने कोर्ट को बताया कि 8 मई 2025 को फैसला सुनाया जा सकता है, और सभी आरोपियों को उस दिन कोर्ट में मौजूद रहने का निर्देश दिया गया है। इस केस में 108 गवाहों से पूछताछ की गई है, और 323 गवाहों में से 34 अपने बयानों से मुकर चुके हैं। एनआईए ने 1500 पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें प्रज्ञा और अन्य आरोपियों के खिलाफ यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) की धारा 16 और 18, साथ ही आईपीसी की धाराओं 120बी, 302, 307, 324, 326 और 427 के तहत सजा की मांग की गई है।
विशेष रूप से, एनआईए ने पहले 2016 में प्रज्ञा को क्लीन चिट देने की कोशिश की थी, लेकिन अब उसने अपना रुख बदलते हुए सभी सात आरोपियों के लिए फांसी की सजा की मांग की है। इस बदलते रुख ने मामले को और जटिल बना दिया है।
जज का तबादला टला, फैसला सुनाने की तैयारी
इस मामले की सुनवाई विशेष एनआईए कोर्ट के जज ए.के. लाहोटी की बेंच में हो रही है। उनका तबादला प्रस्तावित था, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें 31 अगस्त 2025 तक मुंबई में ही रहने की अनुमति दी है, ताकि वे इस बहुचर्चित मामले का फैसला सुना सकें। यह सुनिश्चित करता है कि 16 साल पुराने इस मामले में अब कोई और देरी न हो।
प्रज्ञा ठाकुर की गैर-हाजिरी और जमानती वारंट
प्रज्ञा ठाकुर इस मामले में कई बार कोर्ट में पेश नहीं हुईं, जिसके चलते उनके खिलाफ कई जमानती वारंट जारी किए गए। नवंबर 2024 में विशेष एनआईए कोर्ट ने उनकी गैर-हाजिरी पर 10,000 रुपये का जमानती वारंट जारी किया था, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया। हाल ही में, उनकी सेहत खराब होने की वजह से वकील ने कोर्ट से छूट की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि अंतिम सुनवाई में उनकी मौजूदगी जरूरी है।
एक लंबी कानूनी लड़ाई का अंत?
मालेगांव ब्लास्ट केस न केवल एक आतंकी घटना से जुड़ा है, बल्कि यह राजनीतिक और सामाजिक बहस का भी केंद्र रहा है। प्रज्ञा ठाकुर, जो 2019 में भोपाल से बीजेपी सांसद चुनी गई थीं, इस मामले में हमेशा सुर्खियों में रहीं। उनकी गिरफ्तारी से लेकर जमानत तक, और अब ट्रायल कोर्ट के फैसले तक, यह मामला कई मोड़ ले चुका है। 8 मई 2025 को आने वाला फैसला न केवल प्रज्ञा और अन्य आरोपियों के भविष्य को तय करेगा, बल्कि यह भी निर्धारित करेगा कि इस जटिल और संवेदनशील मामले में न्याय की परिभाषा क्या होगी।
जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है, अब गेंद ट्रायल कोर्ट के पाले में है। देश की निगाहें 8 मई पर टिकी हैं, जब इस 16 साल पुराने मामले में अंतिम फैसला सुनाया जाएगा। क्या प्रज्ञा ठाकुर और अन्य आरोपी दोषी ठहराए जाएंगे, या उन्हें बरी कर दिया जाएगा? यह सवाल अभी अनुत्तरित है, लेकिन जवाब ज्यादा दूर नहीं।












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