MP Nikay Chunav: पूर्व विधायकों को क्यों लड़ना पडा था पार्षद का चुनाव, क्या मजबूरी रही... पढ़िए यह खबर
सागर, 29 जून। राजनीति और सत्ता का पॉवर किसी नशे से कम नहीं है..! भले ही इसके लिए विधायक के बाद पार्षदी का रास्ता ही क्यों न चुनना पडे। राजनीति में वैसे तो कोई सांसद या विधायक जब निर्वतमान होता है तो वह पार्षद बनने की कभी नहीं सोचता, लेकिन ऐसे कई अपवाद भी हैं जब को पूर्व विधायक सत्ता और पॉवर में रहने के लिए पार्षद बना हो। सागर में ऐसे तीन उदाहरण हैं, जब विधायक निकाय पर काबिज होने के लिए वार्ड पार्षद का चुनाव लडने मैदान में उतरे थे।

राजनीति के क्षेत्र में विधायक या सांसद का पद बड़ी अहमियत रखता है। जिले में ऐसे कई नेता हुए हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुवात तो नगरीय निकायों में पार्षद या ग्रामीण क्षेत्र में छोटे पदों से की, लेकिन आगे चलकर वह विधायक तो ठीक मंत्री भी बने। इसके उलट जिले में ऐसे भी उदाहरण है कि नेता पहले तो विधायक रहे, लेकिन बाद में निकाय की कमान थामने उन्हें पार्षद का चुनाव जीतना पड़ा।
नंदलाल पहले पार्षद से विधायक, फिर पार्षद बने
इसमें सबसे पहले नाम आता है पूर्व सांसद और विधायक रहे नंदलाल चौधरी का। हालांकि श्री चौधरी का राजनीतिक सफर पार्षद पद से ही शुरू हुआ था, जब वह 1957 में भगवानगंज वार्ड से पार्षद बने थे। इसके तुरंत बाद 1962 में कांग्रेस ने उन्हें सुरक्षित खुरई विस से टिकट दिया और वह विधायक बने। इसके बाद वह 1983 में एक बार फिर भगवानगंज से ही फिर कांग्रेस से पार्षद बने। ऐसे ही दो नाम और है जो एक साथ ही विधायक चुने गए और बाद में एक ही सत्र में एक तो महापौर तो दूसरे नपाध्यक्ष बनीं।
विधायक बने, फिर हारे तो पार्षद बन निकाय पर काबिज हो गए
उल्लेखनीय है कि स्व. लोकमन खटीक 1985 में नरयावली विस क्षेत्र से और स्व. श्रीमती मालती मौर्य खुरई से कांग्रेस से विधायक निर्वाचित हुईं थीं। दोनों ही अपना अगला विस चुनाव हार गए। 1994 में हुए नगरीय निकाय चुनाव में जबकि अप्रत्यक्ष रूप से महापौर/नपाध्यक्ष का चुनाव पार्षदों के जरिए होना था, तब स्व. खटीक सागर निगम में काकागंज वार्ड से पार्षद बनकर महापौर निर्वाचित हुए तो ऐसे ही श्रीमती मौर्य भी खुरई नपा के गांधी वार्ड से निर्वाचित हुईं और नपाध्यक्ष बनीं। जिले में अब तक ऐसे तीन ही उदाहरण है जो विधायक या सांसद होने के बाद फिर निकाय में पार्षद पद के लिए चुनावी मैदान में उतरे हों। जिले में ऐसे भी कई नेता है जो राजनीतिक दलों, निर्दलीय रूप से विस का चुनाव लडक़र चर्चाओं में आए, लेकिन पार्षदी के चुनाव में कभी जीत तो कभी हार मिली।












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