नंबर डायल करें और पाएं लखनऊ यूनीवर्सिटी की मनचाही डिग्री मनचाहे नंबरों के साथ
लखनऊ। हैलो! मुझे राजनीति शास्त्र में एमए की डिग्री चाहिए। कितने पैसे लगेंगे और कब तक डिग्री मिल जायेगी। और हां ध्यान रहे 70 प्रतिशत नंबर होने चाहिए। अरे... अरे... घबरा क्यों रहे हो भैया बस नाम-पता, मां का नाम मैसेज कर दो और पैसा जमा करवा दो हफ्ते भर में हो जायेगा। जी हां कुछ ऐसा ही हाला है देश को एक से बढ़कर एक दिग्गज देने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय का। लखनऊ विश्वविद्यालय इन दिनों फर्जीवाड़े के मकड़जाला में उलझकर कलंकित हो रहा है।
विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा की डिग्रीयों और मार्कशीट में एक के बाद एक फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है। हाल ही में लखनऊ विश्वविद्यालय के नाम पर भारी मात्रा में फर्जी डिग्री व मार्कशीट मिलने के बाद राजभवन प्रशासन सकते में है। इतना ही नहीं ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि विदेशों में भी यहां से फर्जी डिग्री व मार्कशीटें बेची जा रही हैं। इस मामले में खुफिया जांच के आदेश दिए गये हैं। खबर यह भी है कि राज्यपाल रामनाईक इस खबर से खासा आहत हैं। पढ़ें: यूपी पुलिस की शर्मनाक हरकत: खुद सोने के लिए मरीजों को बेड से उतार कर जमीन पर सुलाया
मिलाएं नंबर और करें डिग्री की डील
लखनऊ विश्वविद्यालय कैंपस में दलाल सक्रिय रहते हैं। उनकी नजर इतनी पैनी होती है कि वो जरुरतमंद को देखते ही पहचान जाते हैं। फर्जीवाड़े का यह नेटवर्क दिल्ली तक फैला हुआ है जहां से जाली डिग्री व मार्कशीट का धंधा विदेशों तक फैलाया जा रहा है। कैंपस के आस-पास चाय और पान वालों की दुकान पर दलालों का नंबर होता है। चाय पीते-पीते अगर किसी ने दुकान वाले से डिग्री की बात कर दी तो वो फौरन दलाल का नंबर दे देता है और वो भी काम होने की गारंटी के साथ। पढ़ें: भूकंप की आड़ में 22 साल के नशेड़ी ने किया 3 साल की मासूम का बलात्कार
जो चाहें वो डिग्री और जैसा चाहें वैसा मार्कशीट
लखनऊ यूनीवर्सिटी की नकली मार्कशीट व डिग्रियां बाजार में बेचे जाने का मामला कोई नया नहीं है। बीते दो दशक पहले विदेशी छात्रों की डिग्री को लेकर सूबे के कई विश्वविद्यालयों में जांच कराई गई थी। जिसमें लविवि के अलावा अवध विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश के भी विश्वविद्यालय से नाइजीरिया के कुछ छात्रों को फर्जी डिग्री व मार्कशीट दिए जाने की जांच हो चुकी है।
बात अगर साल 2012 की करें तो मुजफ्फरनगर में तीन दर्जन से ज्यादा मार्कशीट व फर्जी डिग्रियां मिली थी। इसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में गहन जांच के बाद 9 कर्मचारियों को आरोपी बनाया गया। उनपर कार्रवाई होती, इससे पहले वे सभी कर्मचारी न्यायालय की शरण में चले गए। इसी के साथ मामला फाइलों में बंद हो गया।
बार कोड तक की नहीं हुई व्यवस्था
लखनऊ यूनीवर्सिटी की मार्कशीट बनाना बहुत मुश्किल नहीं है। साधारण तरीके से छपनेवाली मार्कशीट और डिग्रियों पर बार कोड़ नहीं छापा जाता है। विवि का मोनोग्राम छापना काफी आसान है। आमतौर पर सूबे के सभी विश्विद्यालयों में परीक्षण का काम हाथ से होता है। ऐसे में जाली दस्तावेज को पकड़ना काफी कठिन है।













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