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Lucknow Shaam-e-Awadh: लखनऊ की शाम क्यों कहलाती है 'शाम-ए-अवध'? फैजाबाद से कैसे छिना नवाबी ताज?

Lucknow Shaam e Awadh: जब सूरज अपनी थकान उतारकर लखनऊ के आसमान में ढलता है, जब फ़िजाओं में गुलाबी शाम का सुरूर घुलने लगता है, जब हवाओं में कबाब और इत्र की खुशबू मिल जाती है, और जब गजलें अपनी सबसे मीठी तान छेड़ने लगती हैं-तब जन्म लेती है 'शाम-ए-अवध'।

लखनऊ की शाम को शाम-ए-अवध क्यों कहते हैं? यह केवल नवाबी विरासत का असर नहीं, बल्कि यह उन अहसासों की खूबसूरत कशिश है, जो इस शहर की हर गली, हर महफिल, हर चाय की चुस्की और हर ठहरे हुए लम्हे में महसूस की जाती है। यह वह शाम है, जो दिल में उतरती है, जो थमती नहीं, बल्कि जिंदा रहती है-ठीक वैसे ही, जैसे अवध की तहजीब। Oneindia की स्पेशल सीरीज में 'शाम-ए-अवध' का चक्कर...

Lucknow Shaam e Awadh

अवध: जिसका कोई वध न कर सके

अवध केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक दर्शन है। कहते हैं, 'अवध' नाम ही इसीलिए पड़ा, क्योंकि इसका कभी वध नहीं हुआ।' इतिहास के पन्नों को पलटें, तो पाएंगे कि यह भूमि सिर्फ़ तलवारों की लड़ाई का मैदान नहीं रही, बल्कि यहां अदब और मोहब्बत की इबारतें लिखी गईं।

अवध की राजधानी पहले फैजाबाद थी, जहां नवाबों ने अपनी शानो-शौकत की बुनियाद रखी। लेकिन जब राजधानी लखनऊ बनी, तब इस शहर ने नवाबी संस्कृति को अपने सीने से लगा लिया और उसे एक नए मुकाम तक पहुंचा दिया।

शाम का अवध से रिश्ता उतना ही पुराना है, जितना इस शहर का इश्क से। नवाब आसफ-उद-दौला ने जब लखनऊ को नवाबी रंग में रंगा, तब से यह शामें और भी हसीन हो गईं। शाम होते ही महफिलें सजने लगतीं, बागों में इश्क की कहानियां बुनी जातीं, और गजलों की महक फिजाओं में घुल जाती। यह शामें सिर्फ सूरज के ढलने का नाम नहीं, बल्कि पूरे शहर के जाग उठने का नाम थीं।

Lucknow Shaam e Awadh

लखनऊ की शाम क्यों होती है खास?

1️⃣ नवाबी ठाठ की महफिलें

कहते हैं, लखनऊ की शामों में नवाबी शान सांस लेती है। ये शामें महज वक्त का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक एहसास हैं-गुलाबी आसमान, धीमी हवा और झिलमिलाती रोशनी के बीच नवाबी अंदाज में बहती हुई। पुराने जमाने में नवाबों के दरबार में शाम होते ही नृत्य, संगीत और मुशायरों की महफिलें सजती थीं। आज भी लखनऊ की गलियों में यह जादू महसूस किया जा सकता है।

2️⃣ मुशायरों और अदब की रोशनी

'शाम-ए-अवध' गजलों और शेरो-शायरी की सरजमीं है। कभी मीर और ग़ालिब की गजलों से यह शहर गूंजता था, आज भी जब गोमती किनारे महफिलें सजती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे नवाबों का दौर लौट आया हो।

बशीर बद्र का एक शेर लखनऊ की शाम को बहुत खूबसूरती से समेटता है- 'हमसे पूछो क्या होता है, शाम के लखनऊ का मंजर, किसी ने गजल छेड़ी, और दुनिया ठहर गई।'

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3️⃣ चौक और हजरतगंज की रौनक

लखनऊ की शामें सिर्फ़ महफिलों तक ही सीमित नहीं, बल्कि यह बाजारों की चमक में भी बसती हैं। जब हजरतगंज की सड़कें रोशनी से नहा जाती हैं, जब चौक की गलियों में टुंडे कबाबी (Lucknow Tunday Kababi) की खुशबू तैरने लगती है, जब अमीनाबाद, अकबरी गेट में रुमाली रोटियों की रौनक बढ़ जाती है-तब लखनऊ सच में जिंदा होता है।

4️⃣ऐतिहासिक इमारतों की रोशनी

रूमी दरवाजा (Rumi Darwaza), बड़ा इमामबाड़ा (Bada Imambara), छोटा इमामबाड़ा (Chota Imambara), और लाल पुल-जब इन इमारतों पर शाम की रोशनी गिरती है, तो ऐसा लगता है जैसे इतिहास फिर से जिंदा हो रहा हो। यह नजारा सिर्फ़ देखने लायक नहीं, बल्कि महसूस करने लायक होता है।

5️⃣गोमती किनारे की ठंडी हवा

गोमती नदी लखनऊ की आत्मा है, और इसकी शामें एक कविता। जब पानी पर शाम के रंग बिखरते हैं, और जब हल्की-हल्की ठंडी हवा चेहरे को छूकर गुजरती है, तो ऐसा लगता है कि यही है वो 'शाम-ए-अवध' जिसे हर शायर ने अपने अल्फ़ाजों में बांधना चाहा। मरीन ड्राइव का नजारा, 1090 चौराहे की चटोरी गली (Lucknow Chatori Gali)के लजीज व्यंजन अवध की ख़ुबरूरती में चार चांद जोड़ते हैं।

शाम-ए-अवध: एक जज्बात, एक अहसास

'शाम-ए-अवध' सिर्फ एक समय नहीं, बल्कि यह एक अहसास है। यह वो शाम है, जो दिलों में उतरती है और हमेशा वहीं बस जाती है। यह वो शाम है, जिसे महसूस किया जाता है, जिसे जिया जाता है।

लखनऊ की शाम को देखकर अक्सर यह एहसास होता है कि कुछ जगहें सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं होतीं, वे एक जज्बात होती हैं। और लखनऊ की शाम-वह जज्बात है, जिसमें अदब भी है, मोहब्बत भी है, शायरी भी है, और एक बेपनाह खूबसूरती भी।

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'शाम-ए-अवध' का साहित्य और शायरी में स्थान

लखनऊ की शाम को लेकर कई शायरों और कवियों ने अपनी रचनाओं में जिक्र किया है। नवाबी दौर में शायरी और अदब का खूब विकास हुआ, और 'शाम-ए-अवध' इस शहर की पहचान बन गई। जैसा कि एक शेर में कहा गया है-

'कुछ खास है लखनवी अंदाज-ए-बयां में, शाम-ए-अवध सुनी थी, आज देख भी ली।'
'शाम-ए-अवध'-जिसे न देखा, उसने लखनऊ को नहीं जाना।

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Faizabad News: फैजाबाद से ताज छिन्ने की कहानी

अवध रियासत की स्थापना 1722 के आस-पास हुई थी। अवध के पहले नवाब सआदत अली खान ने अयोध्या के पास अपना महल बनवाया और एक नया शहर फैजाबाद बसाया। नवाब शुजा-उद-दौला ने फैजाबाद को एक प्रमुख शहर के रूप में विकसित किया। नवाब आसफ़-उद-दौला (Nawab Asaf-Ud-Daula) ने 1775 में राजधानी को लखनऊ में स्थानांतरित कर दिया। अवध पर नवाबों का शासन था। नवाब शिया मुसलमान थे, इसलिए अवध में इस्लाम के इस संप्रदाय को विशेष संरक्षण मिला। अवध में ब्रिटिशों की दिलचस्पी 1760 के दशक में शुरू हुई और 1800 के बाद उन्होंने वहां अपना नियंत्रण बढ़ाया। 1947 में भारत की आजादी के बाद अवध क्षेत्र उत्तर प्रदेश का हिस्सा बन गया।

अक्सर लोगों के मन में ये भ्रम रहता है कि अयोध्या और फैज़ाबाद अलग-अलग जगह हैं या एक ही। चलिए इसे समझते हैं...

फैज़ाबाद मुगल काल में बसा

मुगल काल में नवाबों ने इसे बसाया था। अवध राज्य की राजधानी भी यहीं थी। 'फैज़ाबाद' नाम नवाबों द्वारा रखा गया था। लंबे समय तक ये जिला मुख्यालय रहा। फैज़ाबाद एक प्रशासनिक और ऐतिहासिक शहर रहा है।

राम की नगरी अयोध्या

यह रामायण काल की नगरी मानी जाती है - भगवान राम की जन्मभूमि। अयोध्या हिंदुओं के सात पवित्र तीर्थों में से एक है। यह धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

संक्षेप में फर्क समझें:

क्रमांक प्वाइंट्स अयोध्या फैजाबाद
1
धार्मिक महत्त्व भगवान राम की जन्मभूमि नहीं
2
ऐतिहासिक महत्त्व प्राचीन हिन्दू नगरी नवाबी काल की बसावट
3
वर्तमान स्थिति जिले का नाम और प्रमुख तीर्थ अयोध्या जिले का एक शहर
4
मुख्य पहचान धार्मिक प्रशासनिक / ऐतिहासिक

अब क्या बदलाव हुआ है?

2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने फैजाबाद जिले का नाम बदलकर 'अयोध्या जिला' कर दिया। यानी अब फैजाबाद एक शहर है, जो अयोध्या जिले का हिस्सा है। अयोध्या शहर और फैजाबाद शहर - दोनों अभी भी पास-पास स्थित हैं (लगभग जुड़वां शहर कह सकते हैं), लेकिन अब पूरा जिला 'अयोध्या' के नाम से जाना जाता है।

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