अखिलेश के तेवर बदल रहे हैं सपा की कार्यशैली को
लखनऊ। अखिलेश यादव पार्टी के भीतर अपने बागी तेवर के लिए जाने जाते हैं। पार्टी के भीतर बलराम यादव को शामिल किये जाने का जिस तरह से उन्होंने खुलकर विरोध किया उसके आगे आखिरकार उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव व खुद नेताजी को झुकना पड़ा।
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मंगलवार को पार्टी के भीतर जिस तरह से कौमी एकता दल को पार्टी में शामिल किया गया और शिवपाल सिंह यादव की मुख्तार अंसारी के साथ तस्वीरें लोगों सामने आयी उसपर महज चौबीस घंटे के भीतर शिवपाल सिंह यादव को सफाई देनी पड़ गयी। शिवपाल ने अपनी तस्वीरों को झुठलाते हुए सफाई दी कि कौमी एकता दल मुख्तार अंसारी की पार्टी नहीं है ऐसे में उन्हें पार्टी में शामिल नहीं किया गया है।
लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल किये जाने के पीछे मंत्री बलराम यादव को मुख्य तौर पर जाना जा रहा था। ऐसे में सपा में कौमी एकता दल के विलय के तुरंत बाद ही अखिलेश यादव ने बलराम यादव का मंत्री पद वापस ले लिया।
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अखिलेश यादव ने जिस तरह से इस पूरे प्रकरण पर मजबूत रूख दिखाया उसने पार्टी के भीतर यह संदेश साफ दिया है कि वह पार्टी में अहम फैसले लेने का अधिकार रखते हैं। पार्टी सूत्रों की मानें तो कौमी एकता दल के पार्टी में विलय से पहले अखिलेश यादव से राय नहीं ली गयी। जिससे अखिलेश यादव काफी खफा दिखे और उन्होंने बिना किसी की राय लिये बलराम यादव का मंत्री पद वापस ले लिया।
अखिलेश यादव के इस सख्त रुख की ना तो शिवपाल सिंह यादव और ना ही पार्टी के आला नेताओं को अपेक्षा थी। बलराम यादव ने एक तरफ जहां मीडिया के सामने आकर मुलायम सिंह को सर्वेसर्वा कहा तो शिवपाल सिंह यादव ने भी उनका बचाव किया। शिवपाल सिंह ने कहा कि यह मुख्यमंत्री का विवेक है कि वह किसे मंत्री पद की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कौमी एकता दल के पार्टी में विलय से पहले मुलायम सिंह यादव की इजाजत ली गयी थी।












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