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झारखंड डायरी: पहले चरण के चुनाव प्रचार का आखिरी दिन, रांची से सरायकेला तक क्या है हाल

Jharkhand Diary: झारखंड में 13 नवंबर को होने वाले प्रथम चरण के मतदान के लिए आज चुनाव प्रचार का अंतिम दिन था और वनइंडिया का काफिला आज पहुंचा रांची से जमशेदपुर। टाटानगर जमशेदपुर एकीकृत बिहार-झारखंड प्रदेश का भी औद्योगिक राजधानी हुआ करता था। यह शहर दो विधानसभा क्षेत्रों में बंटा है, जमशेदपुर पूर्व और पश्चिम। दोनों ही सीटों पर बड़ा ही रोमांचक मुकाबला है। एकदम आमने-सामने की टक्कर।

जमशेदपुर पूर्व से कांग्रेस के टिकट पर महागठबंधन के उम्मीदवार हैं डॉक्टर अजय कुमार, वहीं राजग ने भाजपा की पूर्णिमा साहू को मैदान में उतारा है। डॉक्टर अजय कुमार कद्दावर आईपीएस ऑफिसर रहे हैं जबकि पूर्णिमा साहू राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास की पुत्रवधू हैं। जमशेदपुर पूर्व में जहां दोनों प्रत्याशियों का पहला चुनाव है वहीं पश्चिम में क्लैश ऑफ टाइटंस है। सरयू राय की राजग में वापसी हुई है, वे चुनाव लड़ तो रहे हैं जदयू के कोटे पर लेकिन उनका चुनाव चिन्ह है सिलिंडर छाप तो महागठबंधन में एक बार फिर कांग्रेस के बन्ना गुप्ता पर भरोसा जताया गया है।

Jharkhand Diary for Ranchi to Seraikela

आज केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी जमशेदपुर के आदित्यपुर में जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो भाजपा और राजग का लाव-लश्कर उधर ही लगा हुआ था। शहर के अन्य हिस्सों में भाजपा कैंप में चहलकदमी अपेक्षाकृत कम थी। भाजपा कैंप का फोकस बहुसंख्यक समुदाय के ध्रुवीकरण, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ और राष्ट्रवाद पर है।

का‍ँग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा दूसरी तरफ युवाओं पर है। जमशेदपुर की दोनों सीट पर प्रचार के अंतिम दिन का‍ँग्रेस का अभियान जोर पर था। पश्चिम में कांग्रेस के बन्ना गुप्ता अपने समर्थकों के साथ डोर टू डोर अभियान चला रहे थे वहीं जमशेदपुर पूर्व से कांग्रेस उम्मीदवार डॉक्टर अजय कुमार का रोड-शो था। जमशेदपुर पूर्व में जहां दोनों प्रत्याशियों का पहला चुनाव है वहीं पश्चिम में क्लैश ऑफ टाइटंस है। सरयू राय की राजग में वापसी हुई है, वे चुनाव लड़ तो रहे हैं जदयू के कोटे पर लेकिन उनका चुनाव चिन्ह है सिलिंडर छाप तो महागठबंधन में एक बार फिर कांग्रेस के बन्ना गुप्ता पर भरोसा जताया गया है।

सोमवार (11 नवंबर) को वनइंडिया की टीम भी डॉक्टर कुमार के काफिले के साथ बिरसानगर के संजय मार्केट से साकची तक आई। यह विशाल जनसैलाब दिखा। यहां छह प्रचार गाड़ी, एक खुली जीप में स्वयं कांग्रेस प्रत्याशी लोगों का आशीर्वाद मांग रहे थे कई कारें और कई सौ बाइक पर सवार और हज़ारों पैदल समर्थक।

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कांग्रेस प्रत्याशी अजय कुमार से हमने बात भी की। उनका कहना था कि जनसेवा के लिए राजनीति में आए हैं। वे जमशेदपुर पूर्व की जनता को एक परिवार के चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिए लड़ रहे हैं। जीतने पर सुशिक्षा, रोजगार और शांति उनकी प्राथमिकता होगी।

राज्य के अन्य भागों की तरह जमशेदपुर के मतदाताओं का दिमाग पढ़ना बहुत कठिन है। लोग मीडिया से खुलकर बात नहीं करते। जो पार्टियों के समर्थक हैं वे रटे-रटाए नारे लगाते हैं, लेकिन आम मतदाता कुछ भी बोलने से कतराते हैं। फिर भी कुछ बातें बिल्कुल साफ थीं। अल्पसंख्यकों का रुझान सौ फीसदी कांग्रेस की तरफ है वहीं व्यवसायी वर्ग यद्यपि चुप हैं लेकिन अधिकांश भाजपा के पक्ष में हैं।

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युवाओं में कांग्रेस को लेकर आग्रह है लेकिन महिलाओं का भरोसा भाजपा में अधिक मालूम पड़ता है। निम्न आय वर्ग, दलित, आदिवासी मतदाता अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहे लेकिन राज्य में ये करीब 26 प्रतिशत फ्लोटिंग वोटर्स किसी भी पार्टी और प्रत्याशी की किस्मत चमका सकते हैं और किसी की नैय्या डूबा सकते हैं।

मतदाताओं की दुविधा का आलम यह था कि साकची की जिन सड़कों पर मिनट भर पहले जहां कांग्रेस का काफिला गुजरा था और लोग डॉक्टर अजय कुमार के जयकारे लगा रहे थे, तुरत वहीं पर मोदी और राष्ट्रवाद के नारे लगने लगे। इन्हीं गलियों में आम तटस्थ मतदाता भी हैं, जैसे कि साइकिल रिक्शा चलाने वाले दिनेश गिरी। ऑटो और ई रिक्शा के आने से अब इनके रिक्शे की सवारी कम ही लोग करते हैं, इनकी आमदनी पर भी असर पड़ा है, सरकारी सहायता नहीं मिलती है लेकिन उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। किसी भी पार्टी के उम्मीदवार के बारे में उन्हें कुछ खास जानजारी नहीं है लेकिन उन्हें भी 'मोदी' सबसे बेहतर विकल्प लगते हैं।

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जमशेदपुर पहले से ही विकसित शहर है तो इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट यहां के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है। महंगाई और रोजगार एक मुद्दा जरूर है लेकिन इस पर भी लोग उतने आक्रामक नहीं दिखे। मुझे लग रहा है कि यह चुनाव मुद्दों पर नहीं विचारधारा पर लड़ा जा रहा है। सड़क के किनारे सब्जी बेचने वाले एक सज्जन ने कहा कि उनको सिर्फ राष्ट्रवाद से मतलब है इसीलिए सिर्फ कमल का फूल दिखता है।

बिरसानगर के संजय मार्केट में थोड़ी सी झारखंड के जनजातीय उद्योग की झलक मिली। कुछ महिलाएं सड़क के किनारे सखुआ के पत्ते का दोना, चिड़ैता, दातुन और सूखी लकड़ी बेचती दिखीं। सखुआ के पत्ते को बड़े करीने से मोड़कर दोना और प्लेट बना रही महिलाओं से हमने बात भी की। ये दलित (लोहार) समुदाय से आती हैं। जंगल से पत्ते ये खुद नहीं लातीं बल्कि किसी और से खरीदती हैं, फिर उनका दोना प्लेट और गट्ठर बनाकर बेचती हैं। उनका परिवार आज भी सखुआ पेड़ के भरोसे चलता है। इन्हें सरकारी सुविधा के नाम पर महज पांच किलो फ्री राशन मिलता है। न मइया सम्मान निधि ना ही आयुष्मान कार्ड, ना कोई उम्मीदवार इनके पास वोट मांगने आता है और ना ही कोई इनकी सुध लेने वाला फिर भी ये हर चुनाव में वोट जरूर डालते हैं।

आदिवासी पट्टी और ऐतिहासिक सरायकेला:

जमशेदपुर से आगे स्थित सरायकेला एक ऐसा क्षेत्र है जो सांस्कृतिक धरोहर से समृद्ध है और अपनी विशेष आदिवासी पहचान के लिए जाना जाता है। यह क्षेत्र झारखंड की आदिवासी पट्टी का एक अभिन्न हिस्सा है, जहां भूमि अधिकार, आदिवासी स्वायत्तता, और अवैध भूमि अतिक्रमण से सुरक्षा जैसे राजनीतिक मुद्दे विशेष महत्व रखते हैं। यहां के निवासी अपने भूमि और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा को लेकर सतर्क रहे हैं, विशेषकर बांग्लादेशी घुसपैठ के बढ़ते मुद्दे के मद्देनजर, जो इन दिनों चुनावों का एक प्रमुख विषय बन गया है।

घुसपैठ और आदिवासी मतदाताओं की प्रतिक्रिया:

इस क्षेत्र में मतदाता चुनावी वादों को लेकर सतर्क हैं। घुसपैठ के मुद्दे पर भाजपा की सख्त नीति ने कुछ आदिवासी मतदाताओं के बीच समर्थन हासिल किया है, जो बाहरी लोगों से अपनी भूमि और संस्कृति के खोने का भय महसूस कर रहे हैं। दूसरी ओर, यूसीसी और एनआरसी का विरोध कर रही जेएमएम-नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के कदम उन मतदाताओं को आकर्षित कर रहे हैं जो आदिवासी-केंद्रित नीतियों की अपेक्षा रखते हैं। दोनों पार्टियां आदिवासी पट्टी का समर्थन पाने के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन इन मतदाताओं के लिए किसी नेता का चुनाव उसी पर निर्भर करेगा जो उनकी विशिष्ट पहचान पर आधारित सुरक्षित भविष्य का भरोसा दिला सके।

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