Jharkhand BJP: बाबूलाल मरांडी चुने गए नेता प्रतिपक्ष, झारखंड में आदिवासी वोट को साधने की तैयारी में बीजेपी
Jharkhand BJP: झारखंड विधानसभा चुनाव के 4 महीने के एक लंबे इंतजार के बाद भाजपा ने विधानसभा में अपना नेता चुन लिया है। 6 मार्च को विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष चुना गया। बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष चुने जानें पर पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने उन्हें बधाई दी। विधायक दल का नेता चुन जाने के बाद मरांडी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का आभार जताया।
पूर्व सीएम ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और राज्यसभा सांसद के लक्ष्मण का भी आभार जताते हुए कहा कि विधायकों के प्रति भी मैं आभार प्रकट करता हूं।

Jharkhand BJP: 'अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करूंगा' बाबूलाल मरांडी
झारखंड में भाजपा विधायक दल का नेता चुने जाने पर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा, "झारखंड की जनता, झारखंड के गरीब, दलित, आदिवासी और महिलाएं हमारी प्राथमिकता हैं। हम सदन के अंदर और बाहर भी उनके लिए लड़ेंगे।" मरांडी ने कहा, "जो भी जिम्मेदारी दी गई है उसे निभाने की मैं अपनी तरफ से पूरी मेहनत करूंगा। उस दिशा में अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करूंगा और सबको साथ लेकर चलने की पूरी कोशिश करूंगा।"
Jharkhand BJP: आदिवासी समाज को साधने की तैयारी में भाजपा
झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है जिसका राज्य के वोट बैंक पर सीधा असर पड़ता है। नवंबर 2024 में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को करारी हार का समाना करना पड़ा था और इसका एक बड़ा कारण आदिवासी समाज का वोट भी था। ऐसे में आदिवासी समाज को साधने और उनके बीच अपनी पकड़ को मजबूत करने का प्रयास कर रही है, लेकिन अब तक उसे सफलता नहीं मिली है।
इस बीच बाबूलाल मरांडी जैसे वरिष्ठ नेता को विपक्ष का नेतृत्व देना भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है। बाबूलाल मरांडी झारखंड में बीजेपी के लिए एक बड़ा चेहरा हैं और वो राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनका आदिवासी समुदाय में गहरी पकड़ है ऐसे में मरांडी को नेता प्रतिपक्ष बना कर पार्टी ने इस वर्ग तक अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है।
Jharkhand BJP के लिए नेता प्रतिपक्ष चुनना एक बड़ी चुनौती
राज्य में विधानसभा चुनाव को हुए चार महीनें बीत चुके थे और भाजपा के पास नेता प्रतिपक्ष का चुनाव एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व ने किया और मरांडी के नाम पर सहमति बनी। इसके अलावा, भाजपा से दूर होते जा रहे आदिवासी समाज को फिर से अपने पाले में लाने की रणनीति के तहत भी यह फैसला लिया गया है।
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