अखिलेश के लिये शर्मनाक, यूपी में गिरवी रखे जा रहे बच्चे
लखनऊ। स्लाइडर में पहली तस्वीर को गौर से देखिये। अगर एक चाय वाला देश का प्रधानमंत्री बन सकता है, तो ये बच्चे बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन मुलायम सिंह यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कभी नहीं चाहते हैं कि गरीब परिवारों के बच्चे पढ़ लिख कर आगे बढ़ें, अगर चाहा होता तो आज इन बच्चों को गिरवी रखने की नौबत नहीं आती।
लोकसभा चुनाव परिणामों में जब समाजवादी पार्टी को मात्र 5 सीटें मिलीं, तो पूरा देश चौंक गया, लेकिन उत्तर प्रदेश के तमाम गरीब चौंके नहीं, कयोंकि सपा का भविष्य उन्होंने ही तय किया था। अभी तक कानून व्यवस्था, दंगे, छेड़छाड़, महिला हिंसा, विकास, आदि को लेकर सपा सरकार पर उंगलियां उठती रहीं, लेकिन अब तो हद ही खत्म हो गई, जब गरीब किसानों को अपने बच्चे तक गिरवी रखने पड़ रहे हैं।
सच में बुंदेलखंड की सूरत इस बार फिर नहीं बदली। हर पार्टियों की तरह सपा ने भी इसे ठगा। बदहाली के कारण उत्तर प्रदेश का यह क्षेत्र हमेशा सुर्खियों में रहता आया है। प्रदेश के पिछड़े जनपदों में शुमार ललितपुर के मड़ावरा ब्लॉक के सकरा गांव में सहरिया जाति के कई किसानों ने दो वक्त की रोटी के लिए अपने डेढ़ दर्जन बच्चों को राजस्थान के ऊंट व्यापारियों के पास गिरवी रख दिया है।
बच्चों को गिरवी रखने का मामला मीडिया में आने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस पर संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से जबाव तलब किया है और जिलाधिकारी को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जबाव मांगा है। आयोग जल्द ही एक टीम मौके पर भेजेगी।
ललितपुर जनपद का मड़ावरा क्षेत्र वर्ष 2003 में सुर्खियों में आया था। खबरों में बताया गया था कि यहां के गरीब लोग घास की रोटियां खाकर जीते हैं। आज 11 साल बाद हालात इतने बदतर हो गए हैं कि यहां के गरीब अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नहीं दे पा रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने 10 से 15 साल के बच्चों को राजस्थान के ऊंट और भेड़ व्यापारियों के पास गिरवी रख दिया है।
लगभग 80 परिवारों की आबादी वाली ग्राम पंचायत धोरीसागर के सकरा गांव निवासी धनसू सहरिया का कहना है कि उसके सामने रोजी-रोटी का जबरदस्त संकट है। गांव में सरकारी राशन भी कई महीनों से नहीं बांटा जा रहा है। ऐसे में परिवार को भुखमरी से बचाने के लिए उसके सामने एक ही विकल्प था कि बच्चों को गिरवी रख दे।

चिलचिलाती धूप में नंगे पैर काम करते हैं बच्चे
ऊंट-भेड़ चराने के लिए अपने बच्चों को राजस्थान के व्यापारियों के पास गिरवी रख दिया। व्यापारियों ने उसे पांच हजार रुपये दिए। गिरवी रखे गए बच्चों ने शोषण की जो कहानी बयां की, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है। इन बच्चों का कहना है कि चिलचिलाती धूप में उन्हें ऊंट और भेड़ों के झुंड को एक से दूसरे इलाके में हांककर ले जाने को कहा जाता है और लापरवाही करने पर यातनाएं दी जाती हैं।

जंगल में नंगे पैर चलाया जाता है बच्चों को
हाल ही में व्यापारियों को चकमा देकर किसी तरह सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गांव लौटे ऐसे ही एक बच्चे ब्रजराम ने बताया कि भेड़ों के साथ जंगलों में उन्हें बिना चप्पल चलाया जाता और किसी भेड़ के इधर-उधर चले जाने पर ठेकेदार बेरहमी से उनकी पिटाई करता था। बच्चों की मानें तो 20 बच्चे इनके गांव से गए थे, जिनमें से करीब 10 बच्चे अभी भी राजस्थान के व्यापारियों की गिरफ्त में हैं।

प्रशासन जागा पर लाचार
आयोग की सक्रियता के बाद अब जिला प्रशासन नींद से जागा है। आनन-फानन में गांव में सहरिया जाति के लोगों को राशन कार्ड दिलाकर राशन वितरित किया गया है और इस जाति के किसानों को राहत राशि के चेक भी वितरित किए गए हैं।

बदहाली के लिये कौन जिम्मेदार
खास बात यह कि मुख्य विकास अधिकारी जगदीश प्रसाद स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि क्षेत्र में बदहाली है। दो महीने पहले ओले पड़ने और बेमौसम बारिश के कारण फसल बर्बाद होने को वह अहम वजह बता रहे हैं। उनका कहना है कि श्रम प्रवर्तन विभाग को व्यापारियों के चंगुल में फंसे बच्चों को वापस लाने के निर्देश दिए गए हैं।

भूख से कोई मरता नहीं
सवाल यह है कि जो सरकार मुजफ्फरनगर में दंगा पीड़ितों के शिविरों में बच्चों के ठंड से मरने की खबर को गंभीरता से न लेकर उसे विरोधियों का दुष्प्रचार बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती हो और प्रशासनिक अधिकारी कहते हों कि 'भूख से कोई नहीं मरता', उन्हें बुंदेलखंड की बदहाली से क्या लेना-देना।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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