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Watch: 55 की उम्र में जम्मू-कश्मीर के CM उमर अब्दुल्ला ने फांदी दीवार, पुलिस रह गई हक्का-बक्का, जानें मकसद?

Umar Abdullah Jumps Boundary Wall: जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सोमवार, 14 जुलाई 2025 को श्रीनगर के नक्शबंद साहिब कब्रिस्तान में मजार-ए-शुहादा पहुंचकर 1931 के शहीदों को श्रद्धांजलि दी। 55 वर्षीय उमर ने सुरक्षा बलों के बैरिकेड्स और चारदीवारी फांदकर स्मारक पर फातिहा पढ़ी, जिससे पुलिस हक्का-बक्का रह गई।

उन्होंने दावा किया कि रविवार, 13 जुलाई को शहीद दिवस के मौके पर उन्हें नजरबंद कर दिया गया था, जिसके कारण वह स्मारक नहीं जा सके थे।

Umar Abdullah Jumps Boundary Wall

उमर अब्दुल्ला ने क्या कहा?

नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKNC) के नेता उमर ने कहा, 'यह शर्मनाक है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर हमें कल शहीदों को श्रद्धांजलि देने से रोका गया। मेरे घर के बाहर बंकर लगा दिए गए, जो देर रात तक हटाए नहीं गए। आज मैंने बिना किसी को बताए कार से यहां पहुंच गया।' उन्होंने सुरक्षा बलों पर निशाना साधते हुए कहा, 'नौहट्टा चौक पर गाड़ी रोककर बैरिकेड्स लगाए गए और हमारे साथ बदतमीजी की गई। मैं पूछता हूं, किस कानून के तहत हमें रोका गया? यह आजाद भारत है, लेकिन कुछ पुलिसवाले हमें गुलाम समझते हैं। हम सिर्फ जनता के सेवक हैं।'

सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप

उमर ने आरोप लगाया कि सुरक्षा बलों ने बिना कानूनी आधार के उन्हें और JKNC नेताओं को मजार-ए-शुहादा पहुंचने से रोका। उन्होंने कहा किपुलिस ने रविवार की पाबंदियों को आज भी लागू करने की कोशिश की। यह लोकतंत्र पर धब्बा है। उमर ने सवाल उठाया कि शहीदों को श्रद्धांजलि देना कैसे कानून-व्यवस्था के लिए खतरा हो सकता है।

13 जुलाई: शहीद दिवस का ऐतिहासिक महत्व

13 जुलाई 1931 को श्रीनगर की सेंट्रल जेल के बाहर डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह की सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की थी, जिसमें 22 कश्मीरी मारे गए थे। ये प्रदर्शनकारी अब्दुल कादिर का समर्थन कर रहे थे, जिन्हें डोगरा शासन के खिलाफ विद्रोह के लिए जेल में डाला गया था। यह घटना कश्मीर के पहले राजनीतिक आंदोलन का प्रतीक है। तब से 13 जुलाई को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है, और मजार-ए-शुहादा पर लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं।

सोशल मीडिया पर हलचल

उमर अब्दुल्ला के दीवार फांदने की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। एक एक्स यूजर ने लिखा, '55 की उम्र में उमर का यह जज्बा कश्मीर की जनता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दिखाता है।' एक अन्य ने टिप्पणी की, 'सुरक्षा बलों का यह व्यवहार शर्मनाक है। शहीदों को श्रद्धांजलि देना कोई अपराध नहीं।' कुछ यूजर्स ने इसे सियासी स्टंट बताया, लेकिन ज्यादातर ने उनके साहस की सराहना की।

सियासी तनाव बढ़ा?

उमर के इस कदम ने जम्मू-कश्मीर में सियासी माहौल गरमा दिया है। JKNC ने केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन पर निशाना साधा, इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही, लेकिन कोई स्पष्ट बयान जारी नहीं किया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना JKNC के लिए सियासी लाभ का मुद्दा बन सकती है।

उमर अब्दुल्ला का मजार-ए-शुहादा पहुंचना और सुरक्षा बलों पर लगाए गए आरोप कश्मीर में प्रशासन और स्थानीय नेताओं के बीच तनाव को उजागर करते हैं। शहीद दिवस की संवेदनशीलता को देखते हुए, यह मामला आने वाले दिनों में और चर्चा में रहेगा। उमर का यह साहसिक कदम न केवल उनके समर्थकों के बीच उनकी छवि को मजबूत कर सकता है, बल्कि कश्मीर में स्वायत्तता और स्वतंत्रता के मुद्दों को भी फिर से हवा दे सकता है।

ये भी पढ़ें- 13 जुलाई को जम्मू-कश्मीर में क्यों मनाया जाता है शहीद दिवस? CM उमर अब्दुल्ला को श्रद्धांजलि देने से क्यों रोका

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