J&K: दशकों से रहस्यमयी समस्या झेल रहे एक आदिवासी गांव को Army ने गोद लिया, यूं आ रहा है बदलाव
डोडा, 16 फरवरी: जम्मू-कश्मीर के एक आदिवासी गांव का आधे से ज्यादा परिवार दशकों से अजीब संकट झेल रहा है। उनके परिवार के कई सदस्य ना तो बोल पाते हैं और ना ही सुन पाने में सक्षम हैं। यह ऐसी रहस्यमयी समस्या है, जिसके डर से महिलाओं के गर्भवती होने पर लोग खुश नहीं होते, पूरा गांव एक चिंता में डूब जाता है। उन्हें डर लगता है कि आने वाली संतान कहीं मूक-बधिर ना पैदा हो जाए। इस गांव के लोग दशकों से खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। लेकिन, जब से भारतीय सेना उनके संपर्क में आई है, उनके दिन फिर गए हैं। अब तो सेना ने उस गांव के कल्याण की जिम्मेदारी ही अपने कंधों पर उठा लगी है।

मूक-बधिर होने की है रहस्यमयी समस्या
जम्मू कश्मीर में डोडा जिले में एक पहाड़ की चोटी पर आदिवासी गांव दधकाई है, जहां 105 परिवारों का घर है। यह गांव भद्रवाह शहर से 105 किलो मीटर दूर है। इस गांव को अब भारतीय सेना ने गोद ले लिया है। दरअसल, इस गांव के लोगों के साथ कुदरत एक अजीब मजाक कर रहा है। गांव के जिन 105 परिवारों की बात की गई है, उनमें से 55 परिवारों में कम से कम एक सदस्य ऐसे हैं, जो रहस्यमयी तरीके से ना तो बोल सकते हैं और ना ही सुन सकते हैं। गांव में ऐसे लोगों की संख्या 78 है। इनमें से 41 महिलाएं और तीन से 15 साल की उम्र के 30 बच्चे हैं।

मूक-बधिर बच्चों को सांकेतिक भाषा सिखाई जा रही है
न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक सेना के एक प्रवक्ता ने कहा है कि इस गांव को अब भारतीय सेना के राष्ट्रीय राइफल्स ने गोद ले लिया है। इसका मकसद गांव के लोगों का कल्याण सुनिश्चित करना है, जिसके तहत कई तरह की सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के जरिए उनमें एक भरोसा कायम किया जा रहा है, ताकि वह खुद से अपना जीवन जीने लायक सक्षम बन सकें। इसकी शुरुआत में लोगों को पहले मूलभूत आवश्यकताएं पूरी करवाई जा रही हैं, जैसे कि कपड़े, भोजन और स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरतें। इसके अलावा सेना घर-घर जाकर मूक-बधिर बच्चों को सांकेतिक भाषा के विशेषज्ञों की सेवा मुहैया करवा रही है, जो कि खास तौर पर तेलंगाना से इसकी ट्रेनिंग लेकर आए हैं।

हैदराबाद और सिकंदराबाद से ट्रेनिंग लेकर आए हैं टीचर
सेना के प्रवक्ता ने बताया है कि अगले चरण दधकाई पंचायत में एक स्कूल के साथ होस्टल की सुविधा भी मुहैया करवाई जाएगी। सेना का कहना है वो उनको व्यापक और लंबे समय के हिसाब से मदद देना चाह रही है। इसके लिए सेना ने तेलंगाना के हैदराबाद और सिकंदराबाद में दो टीचरों को विशेष ट्रेनिंग दिलवाई है, जो अब घर-घर जाकर उन्हें सर्वोत्तम रूप से संभव सांकेतिक भाषा सिखाएंगे।

'महिलाएं गर्भवती होती हैं तो पूरा गांव चिंतित होता है'
भलेसा ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल के चेयरमैन मोहम्मद हनीफ ने सेना के इस कल्याणकारी कार्यों के लिए उसका आभार जताया है। उन्होंने कहा है, जब भी कोई महिला गर्भवती होती है, ना सिर्फ उसका परिवार, बल्कि पूरा गांव इस डर में जीता है कि कहीं बच्चा मूक-बधिर ना पैदा हो। अगर ऐसा होता है तो यह दुख को और बढ़ा देता है। उनके मुताबिक पिछले दो दशकों में कई सरकारी अधिकारी और एनजीओ वाले आकर चले गए, लेकिन कुछ भी ठोस नहीं किया गया। लेकिन, अब सेना ने व्यावहारिक कदम उठाए हैं, जिससे दिव्यांगता का दुख कम होने की उम्मीद जरूर जगी है। हनीफ के मुताबिक अभी तक इस समस्या की जड़ का पता नहीं चल पाया है।

सेना की मदद से यूं आ रहा है गांव में बदलाव
कुछ लड़कियां जिन्होंने सांकेतिक भाषा सीख लिया है, उन्होंने सिलाई केंद्र शुरू करने की ख्वाहिश जताई है। उन्होंने सिलाई मशीन और आवासीय विद्यालय की मांग की है। एक स्थानीय महिला हुसन बीबी ने कहा है कि हमारी उम्मीद अब सिर्फ सेना पर ही टिकी है, जो पिछले 10 वर्षों से हमारी चिंता कर रही है। मेरी तीन बेटियां- असरान बानो (8 साल), रेशमा (12 साल) और आशा बानो (23 साल) अपंगता के साथ जन्मीं और अब सेना ने उन्हें हीरिंग एड दिया है। उनका कहना है कि उनकी बेटियों को सिलाई में गहरी रुचि है और उन्हें भरोसा है कि सेना सिलाई मशीन और टेलरिंग सेंटर उपलब्ध करवा कर उनके सपनों को पूरा करने में जरूर सहायता करेगी। जनवरी में सेना ने पहले चरण में 10 बच्चों को हीरिंग एड उपलब्ध करवाया है, जिसमें प्रत्येक की कीमत 17,000 रुपये है। इसके इलावा संकेत भाषा सिखाने का इंतजाम अलग से किया है। (तस्वीरें- सांकेतिक)
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