कमाल है, सिर्फ 5 रुपये में हो गई 'फुल हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी', जबलपुर के इस हॉस्पिटल में मरीज अचंभित
Amazing: कभी-कभी नहीं, बल्कि अक्सर सरकारी अस्पतालों की व्यवस्थाओं और डॉक्टर्स को लेकर पब्लिक की आलोचनाओं की बाढ़ रहती हैं। तरह-तरह के इल्जाम लगते हैं। मनोवृत्ति के मुताबिक इंसान प्राइवेट हॉस्पिटल पर ज्यादा भरोसा करने लगता हैं। चाहे वहां इलाज में कितने भी रुपये लगे।
लेकिन आज हम आपको सरकारी हॉस्पिटल के प्रति धारणा बदलने वाली खबर बता रहे हैं। प्राइवेट हॉस्पिटल में महंगे इलाज की दुनिया में क्या आप कल्पना कर सकते है कि महज 5 रुपये में 'हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी' हो जाए? पढ़ने-सुनने में भले ही अचंभा लग रहा हो, लेकिन एमपी के जबलपुर में यह हकीकत देखने को मिली।
सरकारी जिला अस्पताल विक्टोरिया में 25 वर्षीय एक मरीज की हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी हुई। वो भी सिर्फ पांच रुपये की रजिस्ट्रेशन फीस में। इसके आलावा मरीज का पूरा इलाज मुफ्त में हुआ। ज्वाइंट डायरेक्टर हेल्थ डॉ. संजय मिश्रा ने बताया कि प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में इस तरह का पहला ऑपरेशन हैं। आने वाले वक्त में अब प्रयास किए जाएंगे कि घुटना रिप्लेसमेंट भी हो।

प्राइवेट हॉस्पिटल में लग रहे थे लाखों रुपये
हॉस्पिटल के सिविल सर्जन डॉ. मनीष मिश्रा ने बताया कि शहर के आधारताल क्षेत्र में रहने वाले संतोष कुमार एक सड़क हादसे का शिकार हो गए थे। चोट इतनी गंभीर थी कि कुल्हे के ज्वाइंट पूरी तरह ख़राब हो गए। मरीज तड़पती हुई हालत में अस्पताल में जब भर्ती हुआ तो सिर्फ उसका रजिस्ट्रेशन शुल्क पांच रुपये लगा। इससे पहले जिन निजी अस्पतालों में इलाज के लिए संतोष को ले जाया गया तो वहां करीब ढाई-तीन लाख रुपये का खर्च सुनकर घर वालों की हिम्मत जबाव देने लगी थी।
सर्जरी करने लायक बनाया गया OT
परिवार के लोगों ने ईश्वर के साथ सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों पर भरोसा किया और मरीज को जिला अस्पताल में भर्ती कराया। जहां डॉक्टर्स ने सर्जरी करने का चुनौतीपूर्ण फैसला लिया। फुल हिप रिप्लेसमेंट लायक ऑपरेशन थियेटर में भी कुछ कमियां थी, तो उन्हें पूरा करने के बाद हड्डी रोग विभाग के डॉ. सुनील पटेल और डॉ.अमितोष चतुर्वेदी समेत निश्चेतना विशेषज्ञ डॉ. एल एन पटेल और डॉ. निशेष चौधरी की टीम सर्जरी करने जुट गई। कुछ ही घंटो में डॉक्टर्स की टीम की मेहनत रंग लाई और जटिल ऑपरेशन सफल हुआ।
..और मजबूत हो गई भरोसे की मीनार
ख़ास बात यह भी रही कि मरीज की परिस्थिति की देखते हुए पूरा स्टाफ परिवार के सदस्य के तौर मरीज को ट्रीट कर रहा था। न तो मरीज के पास इलाज कराने लायक पैसों की व्यवस्था थी और न ही शासकीय योजना का आयुष्मान कार्ड। हॉस्पिटल प्रबंधन के सहयोग से संतोष की न सिर्फ जान बची बल्कि उसे नया जीवन भी मिला। चिकित्सकों का कहना है कि कुछ ही महीने में पूर्ण स्वस्थ होने के बाद संतोष पहले की तरह चल-फिर सकेगा। इस केस से पीड़ित परिवार का सरकारी अस्पताल के प्रति भरोसा अब नींव के पत्थर की तरह मजबूत हो गया हैं। इस तरह जबलपुर जिला अस्पताल की यह कामयाबी पूरे प्रदेश के लिए उदहारण बन गई हैं। डॉक्टर्स की टीम ने साबित किया है कि आज भी सरकारी हॉस्पिटल से बेहतर और सस्ता, सुविधानजनक इलाज कोई और नहीं दे सकता।












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