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समंदर के हर हिस्से में दाखिल हो चुका है प्लास्टिक, 88% प्रजातियां प्रभावित

दुनिया का कोई समंदर ऐसा नहीं है जहां प्लास्टिक की मौजूदगी ना हो.

बर्न, 08 फरवरी। वन्यजीव संगठन वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फोरम (WWF) ने कहा है कि प्लास्टिक समंदर के हर हिस्से में दाखिल हो चुका है और इसे रोकने की कोशिशें तेज करनी होंगी. संगठन इसके लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि करने का सुझाव भी दे रहा है. WWF की ओर से प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि समुद्रों में प्लास्टिक की बेतहाशा बढ़ती मौजूदगी से 88 प्रतिशत समुद्री प्रजातियां प्रभावित हुई हैं. कई समुद्री जीवों ने ये प्लास्टिक निगल लिया है और इनमें वे प्रजातियां भी हैं, जिन्हें इंसानी भोजन में शामिल किया जाता है.

रिपोर्ट में और क्या है?

जर्मनी के आल्फ्रेड वेगनर इंस्टीट्यूट के सहयोग से लिखी गई इस रिपोर्ट में 2,590 वैज्ञानिक शोधों से जानकारी जुटाई गई है. ये प्लास्टिक और माइक्रो-प्लास्टिक के समंदर पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में जानकारी देती है. रिपोर्ट के मुताबिक, अटलांटिक और प्रशांत महासागर में तैरते प्लास्टिक के विशाल "प्लास्टिक आइलैंड्स" बन चुके हैं. जीवाश्म ईंधन से निकले पदार्थ समंदर के हर हिस्से तक पहुंच चुके हैं. समंदर की सतह से लेकर गहरी तह तक, ध्रुवों से लेकर सबसे दूर-दराज के द्वीपों के तटीय इलाकों तक, समुद्री घास के छोटे से हिस्से से लेकर विशालकाय व्हेल तक, हर जगह प्लास्टिक के अंश पाए गए हैं.

ये तस्वीर इंडोनेशिया की है. तंजुंग बुरुंग तट पर जमा कचरा.

WWF ने बताया है कि कम से कम 2,144 प्रजातियां अपनी बसाहट में प्लास्टिक प्रदूषण का सामना कर रही हैं. 90 प्रतिशत समुद्री पक्षी और 52 प्रतिशत कछुए इसका प्रभाव झेल रहे हैं. WWF ने चेताया है कि अब कवच वाले समुद्री जीवों और घोंघों में भी प्लास्टिक की मौजूदगी दिखने लगी है. रिपोर्ट का अनुमान है कि साल 2040 तक प्लास्टिक का उत्पादन दोगुना हो जाएगा, जो समुद्र में प्रदूषण को चार गुना तक बढ़ा देगा. इससे ग्रीनलैंड के आकार से ढाई गुना इलाका सीधे तौर पर प्रभावित होगा. संगठन के मुताबिक, पीला सागर, पूर्वी चीन सागर और भूमध्य सागर इस वक्त सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. यह जितना माइक्रो-प्लास्टिक सोख सकते थे, वह सीमा पहले ही पार कर चुके हैं.

प्रदूषण की वजह क्या है?

WWF के विशेषज्ञ आइरिक लिंडेरबैर्ग ने कहा, चाहे समुद्री प्रदूषण का बड़ा कारण मछली उद्योग है, लेकिन ज्यादा पाए जाने वाली चीज सिंगल-यूज प्लास्टिक है. उन्होंने कहा, "क्योंकि प्लास्टिक सस्ता हो गया तो उत्पादकों ने बड़े स्तर पर उत्पादन करना शुरू कर दिया. और इससे ज्यादा से ज्यादा सिंगल यूज प्रोडक्ट बने, जो आखिर में कचरा बन गए."

हम सिंगल यूज प्लास्टिक से घिर हुए हैं. चिप्स के पैकेट से लेकर तेल की बोतल तक.

लिंडेरबैर्ग के मुताबिक, कुछ स्थानों पर ईकोसिस्टम नष्ट होने की स्थिति आ गई है, जिससे पूरा समुद्री भोजन चक्र प्रभावित होगा.

संगठन के अनुसार, प्लास्टिक प्रदूषण में भारी कमी करनी होगी, क्योंकि समुद्री ईकोसिस्टम की प्लास्टिक सोखने की क्षमता बहुत ही सीमित है, "हमें ऐसा मानकर चलना होगा कि ये सिस्टम प्लास्टिक नहीं सोखता और इसी लिए हमें शून्य उत्सर्जन और शून्य प्रदूषण की ओर जितनी तेजी से संभव हो, बढ़ना होगा."

WWF प्लास्टिक उत्पादन के लिए वैश्विक मानक और असली रिसाइकल प्रक्रिया चाहता है. संगठन ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र की केन्या की राजधानी नैरोबी में पर्यावरण पर होने वाली बातचीत में प्लास्टिक से जुड़ी एक अंतरराष्ट्रीय संधि पर विचार होना चाहिए. 28 फरवरी से 2 मार्च तक ये बातचीत होनी है.

आरएस/ओएसजे (एएफपी, डीपीए)

Source: DW

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