Oil Price: क्या इलेक्शन रिजल्ट के बाद बढ़ने वाले हैं पेट्रोल-डीजल के दाम? OPEC और OPEC+ कैसे कर रहा कंट्रोल?
Oil Price: भारत में कल चुनावी नतीजे जारी होने वाले हैं और उससे पहले कई लोग आशंका जता रहे हैं, कि क्या इलेक्शन रिजल्ट के बाद पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी होने वाली है?
पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) और रूस सहित इसके सहयोगी देशों (जिन्हें सामूहिक रूप से OPEC+ के नाम से जाना जाता है) उसने रविवार 2 जून को बैठक बुलाई थी, जिसमें संयुक्त तेल उत्पादन नीति पर चर्चा की गई है।

क्या भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे
सऊदी अरब लंबे वक्त से कोशिश कर रहा है, कि तेल प्रोडक्शन को कम किया जाए, ताकि तेल की कीमतों में इजाफा हो, लेकिन यूक्रेन युद्ध ने रूस को कम कीमत पर कच्चा तेल बेचने पर मजबूर कर रखा है और इसका जबरदस्त फायदा भारत को मिल रहा है।
दरअसल, यूक्रेन ने पिछले दिनों रूस में तेल संयंत्रों पर भीषण ड्रोन हमले किए थे, जिसकी वजह से रूस जितन तेल का उत्पादन कर रहा है, उसे स्टोर नहीं कर पा रहा है, जिसकी वजह से उसे कम कीमत पर कच्चा तेल बेचने पर मजबूर होना पड़ रहा है और भारतीय तेल कंपनियों ने मई महीने में रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कम कीमत पर तेल खरीदा है।
दूसरी तरफ, अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में मई महीने में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट आई है, लिहाजा इस बात की फिलहाल कोई संभावना नहीं दिख रही है, कि नई सरकार आने के बाद पेट्रोल या डीजल की कीमत में कोई बढ़ोतरी हो।
OPEC और OPEC+ में क्या अंतर है?
OPEC की स्थापना 1960 में बगदाद में इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर की थी, जिसका मकसद पेट्रोलियम नीतियों के कॉर्डिनेशन और उचित और स्थिर कीमतों को सुनिश्चित करना था। अब इसमें 12 देश शामिल हैं, जो मुख्य रूप से मध्य पूर्व और अफ्रीका से हैं, जो दुनिया के तेल का लगभग 30% हिस्सा रखते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में ओपेक के प्रभाव को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसकी वजह से अक्सर आंतरिक मतभेद पैदा हुए हैं। वहीं, दुनिया की तमाम बड़ा अर्थव्यवस्थाओं ने जैविक ऊर्जा की जगह स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की तरफ बढ़ना शुरू कर दिया है, जिसकी वजह से अब संभावना बनने लगी है, कि धीरे धीरे OPEC का प्रभुत्व कम हो सकता है।
वहीं, ओपेक ने 2016 के अंत में रूस सहित दुनिया के 10 प्रमुख गैर-ओपेक तेल निर्यातकों के साथ मिलकर ओपेक+ गठबंधन का गठन किया था।
ओपेक+ क्रूड उत्पादन वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 41% है। इस समूह का मुख्य उद्देश्य वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति को रेगुलेट करना है। सऊदी अरब और रूस इसके अगुआ हैं, जो क्रमशः 9 मिलियन और 9.3 मिलियन बैरल प्रति दिन (बीपीडी) तेल का उत्पादन करते हैं।
2007 में ओपेक में शामिल होने वाला अंगोला इस साल की शुरुआत में उत्पादन स्तर पर मतभेदों का हवाला देते हुए ओपेक से अलग हो गया। इक्वाडोर ने 2020 में और कतर ने 2019 में ओपेक को छोड़ दिया।
तेल कीमतों को कैसे प्रभावित करता है OPEC?
ओपेक का कहना है, कि उसके सदस्य देशों का क्रूड निर्यात, वैश्विक कच्चे तेल निर्यात का लगभग 49% है। ओपेक का अनुमान है, कि उसके सदस्य देशों के पास दुनिया के तेल भंडार का लगभग 80% हिस्सा है। अपने बड़े बाजार हिस्से के कारण, ओपेक तेल की कीमतों को लेकर जो भी फैसला लेता है, वो वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित करता है। वैश्विक बाजारों में कितना तेल बेचा जाए, यह तय करने के लिए इसके सदस्य देशों के बीच नियमित बैठक होती रहती है।
इसकी वजह से, जब दुनिया में तेल की डिमांड कम होती है, तो ये तेल का प्रोडक्शन कम कर देते हैं और जब मांग बढ़ती है, तो फिर ये प्रोडक्शन तेज कर देते हैं।
लेकिन, ओपेक अकसर तेल की कीमतों को बढ़ाने के लिए जब वैश्विक डिमांड बढ़ने लगती है, उस वक्त भी तेल का प्रोडक्शन कम करने लगता है, जिससे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आता है। कोविड-19 के बाद जब बाजारों में सुधार आना शुरू हुआ था, उस वक्त भारत में भी तेल की मांग तेज हो गई थी, लेकिन उस वक्त सऊदी अरब ने तेल का प्रोडक्शन कम कर दिया, जिससे भारत में तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था। तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री ने उस वक्त तेल प्रोडक्शन बढ़ाने की मांग को लेकर सऊदी अरब का दौरा भी किया था, लेकिन सऊदी अरब ने भारत सरकार की बात नहीं मानी।
अगर यूक्रेन युद्ध शुरू नहीं होता, तो सऊदी अरब की बदमाशी से भारत में तेल की कीमतें इस स्तर तक बढ़ सकती थीं, कि आम जनता भयंकर परेशान होती, लेकिन यूक्रेन युद्ध ने रूस को डिस्काउंट पर तेल बेचने को मजबूर कर दिया और भारत ने इसका जबरदस्त फायदा उठाया है।
मौजूदा स्थिति ये है, कि भारत ने सऊदी अरब से तेल खरीदना काफी कम कर दिया है। और भारत को तेल बेचने के मामले में सऊदी अरब अब रूस, इराक के बाद तीसरे नंबर पर आ गया है।
हालांकि, सऊदी अरब के दबाव की वजह से ओपेक+ समूह, अभी भी 5.86 मिलियन बीपीडी उत्पादन में कटौती कर रहा है, जो वैश्विक मांग के लगभग 5.7% के बराबर है। इस कटौती में 2024 के अंत तक ओपेक+ सदस्यों द्वारा 3.66 मिलियन बीपीडी की कटौती शामिल है। कुछ सदस्य देशों ने स्वैच्छिक तौर पर तेल प्रोडक्शन में कटौती का फैसला जून में खत्म करने का फैसला किया है और ये देश 2.2 मिलियन बीपीडी हर महीने तेल की कटौती कर रहे थे।
स्वैच्छिक कटौती का नेतृत्व सऊदी अरब ने किया था, जिसने 1 मिलियन बीपीडी की कटौती की है। उत्पादन में भारी कटौती के बावजूद ब्रेंट क्रूड की कीमतें इस साल के सबसे निचले स्तर 81 डॉलर प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रही हैं, जो अप्रैल में 91 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर से काफी नीचे है, जो उच्च स्टॉक और वैश्विक मांग वृद्धि पर चिंताओं के दबाव में है। लिहाजा, अगरस दुनिया किसी और चुनौती में नहीं घिरती है, तो इस बात की संभावना नगण्य है, कि भारत में आने वाले कुछ महीनों में तेल की कीमतों में किसी तरह का कोई इजाफा होगा।
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