दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा क्यों?

नस्ली भेदभाव

पिछले कुछ सालों में भारत में अफ़्रीकियों पर कई हमले हुए हैं और भारतीयों पर नस्ली भेदभाव के इल्ज़ाम लगे.

अफ़्रीका में इन ख़बरों का क्या असर होता है?

हाल के दक्षिण अफ़्रीकी दौरे पर हमारी यही जानने की कोशिश थी. विवादास्पद युवा नेता फुमलानी मफेका ने कहा, "जब हम भारत में अफ़्रीकियों पर हमलों के बारे में सुनते हैं तो निराशा होती है. हम सोचने लगते हैं कि क्या हमें यहां भारतीयों के ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई करनी चाहिए?"

नस्ली भेद भाव

25 वर्षीय छात्रा लेसेगो टेंडेली का दाख़िला दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुआ. वो भारत आने की तैयारी कर चुकी थीं.

वो कहती हैं, "तब मेरी माँ ने कहा कि दिल्ली में अफ़्रीकियों पर हमले हो रहे हैं. एक अफ़्रीकी लड़की के साथ रेप की भी ख़बर है."

आख़िर में लेसेगो ने ये फ़ैसला किया कि वो भारत नहीं जाएंगी.

ओयामा मुगडुसो एक कामयाब पेशवर हैं. वो एक बड़ी कंपनी के लिए काम करने एक साल के लिए मुंबई आये थे. उनका दावा है कि मुंबई में नस्ली भेदभाव के कारण वो नौ महीने में ही दक्षिण अफ़्रीका लौट गए.

उन्होंने मायूस होकर कहा, "मैं दुनिया के कई देशों में गया हूँ, लेकिन भारत से अधिक नस्ली भेदभाव कहीं नहीं पाया."

अफ़्रीकियों का आरोप है कि यहां रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी उनके ख़िलाफ़ नस्ली भेदभाव करते हैं.

नस्ली भेदभाव

फुमलानी मफ़ेका जैसे नेताओं ने अपने देश में इसे एक सियासी मुद्दा बना दिया है. उनकी पहचान भारतीय विरोधी की बन गई है.

वो अपने बचाव में कहते हैं, "मेरे कई दोस्त भारतीय हैं. मैं ये नहीं कहता भरतीय मूल के लोगों को वापस भेज दिया जाए, लेकिन 150 साल बाद भी उन्होंने हमारी एक भाषा तक नहीं सीखी है"

इकॉनमिक फ़्रीडम फाइटर्स पार्टी के 37 वर्षीय विवादास्पद अध्यक्ष जूलियस मलेमा भारतीय मूल के लोगों पर "रेसिस्ट" होने का कई बार इल्ज़ाम लगा चुके हैं.

भारतीय मूल के लोगों के ख़िलाफ़ उनके बयान सार्वजनिक हैं. इस साल की शुरुआत में उन्होंने अपने युवा समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा था, "ज़्यादातर भारतीय अफ़्रीकियों से नफ़रत करते हैं. वो नस्लवादी हैं."

जूलियस मलेमा के इस बयान ने दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय मूल के लोगों को असहज कर दिया. अब तो भारतीय मूल के लोगों के ख़िलाफ़ भारत वापस जाओ के नारे भी सुनाई देने लगे हैं.

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जूलियस मलेमा समाज को विभाजित करने के इल्ज़ाम से घिरे नेता ज़रूर हैं, लेकिन युवाओं में उनकी लोकप्रियता दक्षिण अफ़्रीकी नेताओं के लिए एक चिंता की बात है.

बढ़ती बेरोज़गारी के कारण मलेमा जैसे नेता दक्षिण अफ़्रीका की राजनीती का एक अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं.

दक्षिण अफ़्रीका में नेल्सन मंडेला एक इंद्रधनुष समाज बनाने पर ज़ोर देते थे. उन्होंने 1994 में दक्षिण अफ़्रीका की नस्ली भेदभाव करने वाली गोरी नस्ल की सरकार से आज़ादी के बाद एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जिसमें समाज के किसी वर्ग को नस्ली भेदभाव का सामना नहीं करना पड़े.

वो ख़ुद भी भेदभाव का शिकार हुए थे और 26 साल क़ैद रहे.

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नस्ली भेदभाव

सरकारी आंकड़ों के अनुसार काले लोग देश की आबादी का 76 फ़ीसदी हैं जबकि गोरे महज नौ फ़ीसदी हैं और भारतीय मूल के लोग 2.5 फ़ीसदी हैं.

भारतीय मूल के लोगों को 158 साल पहले बंधुआ मज़दूर की तरह लाया गया था. ज़्यादातर लोगों को डर्बन शहर में बसाया गया.

उन्हें गन्ने के खेतों और रेलगाड़ी की पटरियां बिछाने के काम के लिए लाया गया था. ऐसा ब्रिटिश हुकूमत ने किया था, जिसका उस समय भारत और दक्षिण अफ़्रीका दोनों देशों पर राज था.

उस समय भारत से गए बंधुआ मज़दूरों को कुली कहा जाता था.

नस्ली भेद भाव

यहां भारतीयों ने कड़ी मेहनत की और धीरे-धीरे समाज के ऊंचे पायदान पर चढ़ते गए.

आज की तारीख़ में दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय मूल के लोग आर्थिक और शैक्षणिक रूप से काफ़ी मजबूत हैं. भारतीय मूल के लोगों का कहना है कि स्थानीय उनकी कामयाबी से जलते हैं.

भारतीय भी स्वीकार करते हैं कि कालों से भेदभाव है. राजधानी प्रिटोरिया की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले भारतीय मूल के स्टूडेंट्स का कहना है कि अगर वो यहां की स्थानीय काली लड़की से शादी करते हैं तो घर में विरोध का सामना करना पड़ेगा.''

इन युवाओं का कहना है कि उनकी पीढ़ी में रंगभेद की मानसिकता धीरे-धीरे ख़त्म हो रही है.

दक्षिण अफ़्रीका में ज़्यादातर लोगों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि भारत में अफ़्रीक़ियों के ख़िलाफ़ भेदभाव क्यों है? उनका कहना है कि वो तो भारत प्रेमी हैं. ऐसे में उनके लोगों पर हमले क्यों और उनके ख़िलाफ़ नस्ली भेद भाव क्यों?

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