तालिबान से बातचीत कर भारत को कितना फायदा ? पाकिस्तान के अड़ंगे से होगा नुकसान?
भारत और तालिबान के बीच बैकचैनल बातचीत से क्या हासिल होगा। जानिए भारत और तालिबान को क्या फायदा होंगे?
नई दिल्ली, जुलाई 11: एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव करते हुए भारत ने हाल ही में स्वीकार किया है कि उसने अफगानिस्तान में तालिबान के साथ बैकचैनल बातचीत शुरू कर दिया है। जून की शुरुआत में कुछ भारतीय मीडिया ने दावा किया था कि नई दिल्ली ने अफगानिस्तान में मौजूद चरमपंथी संगठनों से बातचीत शुरू कर दी है और फिर कुछ दिनों के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस बात की पुष्टि कर दी कि, भारत अफगानिस्तान की तरक्की के लिए अफगानिस्तान में मौजूद कई अलग अलग समूहों से बातचीत कर रहा है, वहीं तालिबान ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि भारत के साथ उसकी बातचीत हो रही है, ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि भारत को तालिबान से बातचीत करने से क्या हासिल होगा?

भारत-तालिबान की बातचीत
कुछ समय पहले तक भारत, तालिबान के साथ खुले तौर पर संवाद करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। दरअसल, इसके पीछे भारत का ये मानना रहा है कि तालिबान से बातचीत करने से एक तो अफगान सरकार और उसके शक्तिशाली क्षेत्रीय और वैश्विक समर्थकों के साथ उसके संबंधों को नुकसान हो सकता है, वहीं, तालिबान से बात करने पर वैश्विक समुदाय में ये मैसेज जाएगा कि भारत एक चरमपंथी संगठन से बात कर रहा है। जबकि भारतीय खुफिया अधिकारी सालों से मानते आए हैं कि भारत को तालिबान से बातचीत करनी चाहिए। खास तौर पर 2011 में अफगानिस्तान में काम कर रहे भारतीय इंजीनियरों के अगवा होने के बाद भारत ने तालिबान से किसी भी तरह का संबंध बनाने से परहेज ही किया

भारत की नजर में तालिबान
भारत ने हमेशा तालिबान को एक चरमपंथी संगठन के साथ साथ पाकिस्तान के एक 'छद्म संगठन' के तौर पर देखा है, जिसका मकसद भारत में अशांति फैलाना है। भारत का मानना रहा है कि पाकिस्तान ने तालिबान को बनाया ही इसलिए है, ताकि अफगानिस्तान और भारत में अशांति का वातावरण तैयार हो सके। लिहाजा, नई दिल्ली तालिबान के साथ बातचीत करके किसी भी "आतंकवादी समूहों" से बात नहीं करने की अपनी आधिकारिक नीति से समझौता नहीं करना चाहती थी, क्योंकि उसका मानना था कि ऐसा करने से उस पर कश्मीरी चरमपंथी संगठनों से बात शुरू करने के लिए दवाब बनान शुरू हो जाएगा। लेकिन, पिछले कुछ सालों में कई सारी चीजें बदल गई हैं।

पिछले कुछ सालों में बदली स्थिति
2015 में ईरान और रूस ने एक अन्य सशस्त्र चरमपंथी समूह इस्लामिक स्टेट ऑफ खुरासान यानि आईएसके को अफगानिस्तान पर अपने प्रभाव का विस्तार करने से रोकने के लिए तालिबान का समर्थन करना शुरू कर दिया। और यहीं से स्थितियां बदलनी शुरू हो गईं। अफगान सुरक्षा बलों की क्षमता और तालिबान के ऑपरेशनल शक्ति को देखते हुए रूस ने तालिबान के साथ अपने रिश्ते को विस्तार देना शुरू कर दिया और फिर तालिबान और रूस के बीच आधिकारिक बातचीत का द्वार खुल गया और तालिबानी नेता बगैर किसी रोक के रूस जाने लगे। यहां तक कि तालिबानी नेता रूस से प्रेस कॉन्फ्रेंस तक करते हैं। और फिर तालिबान ने भी अपनी नीति में परिवर्तन लाते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ अपने राजनयिक संबंधों को धीरे-धीरे मजबूत करना शुरू कर दिया और अफगान सरकार के खिलाफ महत्वपूर्ण क्षेत्रीय बढ़त हासिल करना शुरू कर दिया। फरवरी 2020 में अमेरिका के साथ एक ऐतिहासिक शांति समझौता करना तालिबान के लिए मास्टरस्ट्रोक माना गया और तालिबान अफगानिस्तान के लोगों के बीच यह संदेश देने में कामयाब हो गया कि अमेरिका के साथ लड़ाई में अंतिम जीत तालिबान की हुई है।

अफगानिस्तान में मुश्किल में भारत
रूस, ईरान और चीन के द्वारा तालिबान के अस्तित्व को स्वीकार करना और अमेरिकी सेना का अफगानिस्तान से बाहर निकलने के बाद अफगानिस्तान में भारत के लिए मुश्किल परिस्थितियां तैयार हो गईं और फिर भारत सरकार को तालिबान को लेकर अपनी नीति में परिवर्तन लाने के लिए मजबूर होना पड़ा और फिर भारत ने अफगानिस्तान में अपनी रणनीतिक जमीन खोने से बचने के लिए तालिबान के साथ साथ वहां मौजूद दूसरे क्षेत्रीय संगठनों से बातचीत करना शुरू कर दिया। सितंबर 2020 में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वीडियो लिंक के माध्यम से दोहा में होने वाली अंतर-अफगान शांति वार्ता में भाग लेकर पहली बार तालिबान के साथ बातचीत करने में भारतीय हित के होने का संकेत दिया था। एक वरिष्ठ भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भी इस बैठक में हिस्सा लिया था और ये पहला मौका था जब भारत के सीनियर मोस्ट अधिकारियों ने तालिबान के प्रतिनिधियों के साथ आमने-सामने बैठकर किसी कार्यक्रम में भाग लिया। तब से भारतीय सुरक्षा अधिकारियों ने कई तालिबान गुटों के साथ बातचीत के रास्ते खोलने शुरू कर दिए, जिन्हें "राष्ट्रवादी" या पाकिस्तान और ईरान के प्रभाव क्षेत्र से बाहर माना जाता है।

फायदा उठा पाएगा भारत ?
तालिबान के साथ बैकचेनल बातचीत के जरिए भारत को काफी कुछ हासिल करना है और अमेरिका के अफगानिस्तान से बाहर निकलने के बाद नई दिल्ली को अफगानिस्तान में अपने हितों और निवेश की रक्षा करनी है। खास कर भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कश्मीर-केंद्रित सशस्त्र समूह जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद कश्मीर में किसी भी तरह से अशांति फैलाने के लिए अफगानिस्तान में मौजूद इन संगठनों का इस्तेमाल ना करें। तालिबान के साथ बैकचैनल बातचीत होने से भारतीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि आने वाले वर्षों में अफगानिस्तान नई दिल्ली के लिए एक बड़े सुरक्षा खतरे में नहीं बदलेगा।

भारत से बातचीत से तालिबान को फायदा
इंटरनेशनल स्टडीज में रिसर्च फेलो अब्दुल बासित का मानना है कि भारत से बातचीत के जरिए तालिबान काफी कुछ हासिल कर सकता है। उन्होंने अलजीजरा के लिए लिखे अपने एक लेख में कहा है कि अफगानिस्तान से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद तालिबान को अपने विकास और पुनर्निर्माण लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण बाहरी मदद की आवश्यकता होगी। भारत सुरक्षा गारंटी के बदले तालिबान को बहुत बड़ी मदद प्रदान कर सकता है और तालिबान के नेता ये जानते हैं, लिहाजा वो भारत से बात करने का मतलब उनके लिए फायदा ही फायदा है। तालिबान के लिए भारत की पहुंच भी सकारात्मक रूप से चल रही अफगान शांति प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, जिससे अमेरिका के बाद के अफगानिस्तान में भारत-पाकिस्तान प्रॉक्सी युद्ध की संभावना कम हो जाएगी। यदि भारत, तालिबान के साथ एक अनौपचारिक द्विपक्षीय संबंध स्थापित करने में कामयाब हो जाता है, तो अफगानिस्तान भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी झड़प से दूर रह सकता है और इसके बजाय अपनी घरेलू समस्याओं और संघर्षों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।

पाकिस्तान की भूमिका
तालिबान के साथ भारत के बैकचैनल बातचीत की सफलता पर पाकिस्तान आंशिक तौर पर या ज्यादा प्रभाव डाल सकता है। पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा कि तालिबान और भारत की बातचीत हो। पाकिस्तान के एनएसए मोइद यूसुफ ने पिछले हफ्ते भारत-तालिबान बातचीत पर तंज कसते हुए भारत की नैतिकता पर सवाल उठाने की कोशिश की थी और साफ कर दिया था कि भारत-तालिबान बातचीत से पाकिस्तान खुश नहीं है। पाकिस्तान तालिबान में मौजूद उन नेताओं को अलग करने की कोशिश करेगा, जो भारत से संबंध बनाने के हिमायती हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बार का तालिबान बहुत बदला हुआ है।

क्या मानते हैं भारतीय एक्सपर्ट?
विदेश नीति के जानकार मेजर गौरव आर्या ने एक यूट्यूब चैनल पर बातचीत के दौरान कहा कि ''ये तालिबान 2.0 है और एक बार अफगानिस्तान पर प्रभाव जमाने के बाद अब तालिबान पाकिस्तान के दायरे से निकलना चाहेगा''। गौरव आर्या का मानना है कि पिछले 20 सालों में तालिबान ने काफी कुछ सीखा है और उसे अपना पैर मजबूत करने के लिए पैसा चाहिए और भारत से उसे काफी पैसा मिल सकता है। लिहाजा तालिबान एक अलग तरह की विदेश नीति बनाने की कोशिश करेगा। वहीं, इंटरनेशनल स्टडीज में रिसर्च फेलो अब्दुल बासित का मानना है कि पाकिस्तान लाख विरोध कर ले, लेकिन तालिबान किसी भी कीमत पर भारत से बातचीत करेगा और खुद को मजबूत करने की कोशिश करेगा, क्योंकि तालिबान जानता है कि पाकिस्तान उसकी आर्थिक मदद नहीं कर सकता है।












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