अफ़ग़ानिस्तान को इस्लामिक अमीरात बनाकर तालिबान क्या बदलने जा रहा है?
'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान' से 'इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान' बनने के सफ़र में कई पड़ाव हैं, एक लंबा इतिहास है. अफ़ग़ानिस्तान में अमीरात की संकल्पना तालिबान के आने से कहीं पुरानी है.
महज़ कुछ दिनों में ही अफ़ग़ानिस्तान पूरी तरह से बदल गया है. मुल्क की बागडोर संभालने के बाद तालिबान जिस तरह का निज़ाम बनाना चाहता है, उसे लेकर बहुत कम जानकारियां अभी तक स्पष्ट हो पाई हैं. अमेरिकी फौज काबुल छोड़ने की जल्दबाज़ी में हैं और हामिद करज़ई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के इलाक़े में जिस तरह की अफ़रा-तफ़री का माहौल है, उस सब के बीच बस एक चीज़ साफ़ दिखाई दे रही है, वो है 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान' का इतिहास का हिस्सा हो जाना. अफ़ग़ानिस्तान जिस नए दौर से गुज़र रहा है, उसके पहले अध्याय के कुछ हिस्से लिखे जा चुके हैं जैसे- राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी का मुल्क छोड़कर चले जाना, काबुल का पतन, तालिबान के हाथ में कमान और अफ़ग़ानिस्तान को 'इस्लामिक अमीरात' बनाने की तालिबान की योजना. एक सच ये भी है कि तालिबान ख़ुद को 'इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान' के तौर पर परिभाषित करता है. साल 2020 के 'दोहा समझौते' पर उन्होंने इसी नाम से दस्तख़त किए थे. यही दस्तावेज़ अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का पहला एलान है.
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तालिबान के प्रवक्ता हाल के दिनों में इस 'दोहा समझौते' का जिक्र बार-बार करते रहे हैं और ज़बीहुल्ला मुजाहिद ने अपने संवाददाता सम्मेलनों में अफ़ग़ानिस्तान को इसी नाम से बुलाया है. नए निज़ाम को इस पर प्रतिक्रियाएं मिलनी शुरू हो गई हैं. काबुल, जलालाबाद और असदाबाद जैसे शहरों में हुए विरोध-प्रदर्शनों से ये साफ़ हो गया है. यहाँ 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान' के झंडे लिए प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलवाई गईं. तालिबान ने फ़ैसला किया है कि अब वो इस झंडे की जगह अपने झंडे का इस्तेमाल करेगा.
अफ़ग़ानिस्तान के नाम में किए जा रहे इस बदलाव के राजनीतिक, वैचारिक और धार्मिक परिणाम होने वाले हैं. अफ़ग़ानिस्तान और उसके लोगों का इस्लामी दुनिया और बाक़ी अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जो रिश्ता है, इस बदलाव का उस पर भी असर पड़ेगा.
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फ़ारस की खाड़ी के इलाके में इस तरह के मुल्क हैं. जैसे क़तर और कुवैत अमीरात हैं. संयुक्त अरब अमीरात के नाम से ही ये जाहिर होता है कि वो अमीरातों का महासंघ है. जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी में मध्य पूर्व मामलों के जानकार जेवियर ग्विराडो कहते हैं, "गणतांत्रिक देशों में राष्ट्रपति धार्मिक नेता नहीं होते हैं लेकिन अमीरात व्यवस्था वाले मुल्कों में राष्ट्राध्यक्ष धार्मिक नेतृत्व ही होता है. राजनीतिक और धार्मिक शक्तियां एक व्यक्ति में केंद्रित होती हैं, और वो शख़्स मुल्क का आमिर होता है." ज़्यादातर मुस्लिम देशों में ये आम बात है कि राजनीतिक और धार्मिक शक्ति एक ही व्यक्ति में निहित होती है.
बोस्टन यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजी (मानवविज्ञान) के विशेषज्ञ थॉमस बारफील्ड बताते हैं कि "आमिर के खिताब का इतिहास आमिर अलमुमिनिन के वक़्त का है. इसका मतलब है 'वफ़ादार और भरोसेमंद लोगों का कमांडर'. पैगंबर मोहम्मद के वक़्त फौज के कुछ सरदार इस खिताब का इस्तेमाल किया करते थे."
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थॉमस बारफील्ड का कहना है कि तालिबान जिस अमीरात की बात कर रहे हैं, वो इस्लामिक स्टेट की खिलाफत से अलग है. "इस्लामिक स्टेट का कहना है कि उसकी योजना दुनिया पर फतह हासिल करके ये सुनिश्चित करना है कि उसके खलीफा की हुकूमत सभी मुसलमानों पर स्थापित हो, चाहे वे कहीं भी रह रहे हों. जबकि तालिबान खुद को एक ऐसी स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के तौर पर देखता है जिसका दायरा अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन पर रहने वाले लोगों तक ही सीमित है." जेवियर ग्विराडो कहते हैं, "खिलाफत की संकल्पना चार खलीफाओं के दौर से जुड़ी हुई है जब सातवीं सदी में पैगंबर मोहम्मद के वारिसों का इस्लामी दुनिया पर सीधी हुकूमत थी."
थॉमस बारफील्ड बताते हैं कि "जब इस खिलाफत का निज़ाम कमज़ोर पड़ने लगा तो अमीरातों और सल्तनतों का उदय शुरू हुई. सुल्तान का मतबल ऐसे नेता से होता था जिसके हाथ में फौज की कमान होती थी." तो तालिबान के अमीरात और इस्लामिक स्टेट की खिलाफत में किसकी जीत होगी? थॉमस बारफील्ड जवाब देते हैं, "दोनों ही गुट एक दूसरे को दुश्मन की नज़र से देखते हैं. और ये देखना दिलचस्प होगा कि कहीं काबुल में इस्लामिक स्टेट बम धमाकों का सिलसिला न शुरू कर दे." गुरुवार को काबुल एयरपोर्ट पर जो कुछ हुआ, ये उसी की एक कड़ी थी.
अमेरिका तालिबान के इस वादे पर यकीन करना चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल पश्चिमी देशों के हितों के ख़िलाफ़ नहीं होने दिया जाएगा लेकिन खुद को 'इस्लामिक स्टेट' कहने वाले चरमपंथी संगठन के इरादे कुछ और हैं.
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अमीरात ही क्यों?
जेवियर ग्विराडो कहते हैं, "अमीरात वाली व्यवस्था चुनने की वजह इसकी जड़ें तालिबान की अपनी राजनीतिक परंपरा में ही हैं." साल 2001 में तालिबान के पतन तक उसकी हुकूमत की बागडोर संभालने वाले मरहूम मुल्ला उमर आमिर का खिताब रखते थे. जेवियर का कहना है कि जब अलग नस्ल और खानदान का कोई नया गुट सत्ता में आता है तो वह अपनी राजनीतिक हैसियत हासिल करने के लिए आमिर की पदवी धारण करता है. अफ़ग़ानिस्तान अब तक कई राजनीतिक व्यवस्थाओं को अपना चुका है. इसमें मोहम्मद ज़ाहिर शाह का संवैधानिक राजतंत्र भी था जिसे साल 1973 में एक विद्रोह के बाद सत्ता से बेदखल कर दिया गया. साल 2001 में अमेरिका के आने के बाद इस्लामी गणराज्य की स्थापना की गई लेकिन तालिबान हमेशा से पुरानी अमीरात वाली व्यवस्था को बहाल करना चाहता था. अब ये तय है कि वे कामयाब होने जा रहे हैं. हालांकि कई अफ़ग़ानों को डर है कि इसका मतलब नब्बे के दशक वाली दमनकारी और हिंसक शासन व्यवस्था की वापसी होने वाली है.
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अमीरात व्यवस्था वाली सरकार कैसी होगी?
ये सवाल कई लोग पूछ रहे हैं कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में जिस अमीरात व्यवस्था वाली सरकार की बात कर रहा है, वो कैसी होगी? साल 2004 में जब अफ़ग़ानिस्तान पर पश्चिमी मुल्कों का असर था, तो उस वक़्त बने संविधान ने देश को 'इस्लामी गणराज्य' का दर्जा दिया था. इसमें लोकप्रिय जन आकांक्षाओं से चलने वाली लोकतांत्रिक सरकार की व्यवस्था की गई थी. लेकिन अब ये संविधान एक मृतप्राय दस्तावेज़ बनकर रह गया है. थॉमस बारफील्ड कहते हैं, "ये तय है कि तालिबान कोई नया संविधान नहीं लिखने जा रहे हैं कि क्योंकि उनके लिए इस्लाम और शरिया कानून काफ़ी है. अफ़ग़ानिस्तान में अब कोई चुनाव नहीं होंगे क्योंकि तालिबान की हुकूमत की वैधता जनता की मर्जी पर निर्भर नहीं करेगी बल्कि ये अल्लाह की मर्ज़ी से चलेगी." तालिबान की हुकूमत का जो भी शख़्स आमिर बनेगा उसके पास राजनीतिक और न्यायिक शक्तियां होंगी, वही धार्मिक सत्ता भी होगा. लेकिन क्या वो हमेशा-हमेशा के लिए हुकूमत करेगा? थॉमस बारफील्ड कहते हैं, "अगर आप अफ़ग़ानिस्तान के अतीत में मुड़कर देखें तो ज़्यादातर नेताओं की हुकूमत उनकी मौत या मुल्क से निर्वासन के साथ ही ख़त्म हुई है."
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इसका मतलब ये नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान के आमिर पास बेहिसाब ताक़त होगी और उसकी नियुक्ति बिना किसी सौदेबाज़ी और बातचीत के हो जाएगी. जेवियर ग्विराडो कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में कई नस्ल, कबीलों और खानदान हैं और ये मुमकिन है कि वे प्रभावशाली लोगों के समूह के भीतर कोई चुनाव कराएं." अब तक जो अंदाज़े लगाए जा रहे हैं, उसके मुताबिक़ दोहा समझौते में अमेरिका से तालिबान की तरफ़ वार्ता करने वाले मुल्ला उमर के करीबी रहे मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर मुल्क के नए आमिर बन सकते हैं. लेकिन इसके बावजूद अभी कई सवाल हैं, जिनके जवाब खोजे जा रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान में अमीरात की परंपरा तालिबान के आंदोलन से कहीं पुरानी है. थॉमस बारफील्ड बताते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में आमिर के खिताब का इस्तेमाल 19वीं सदी में सबसे पहले किया गया था. तब तक अफ़ग़ानिस्तान के नेता 'शाह' टाइटल इस्तेमाल किया करते थे. लेकिन तभी एक विवाद उभरा क्योंकि 'शाह' कहलाने के लिए अहमद शाह दुर्रानी (1722-1772) का वंशज होना ज़रूरी था. अहमद शाह दुर्रानी को आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान का संस्थापक कहा जाता है.
तालिबान के प्रवक्ता ने बार-बार ये बात दोहराई है कि वे एक 'समावेशी सरकार' का गठन चाहते हैं. थॉमस बारफील्ड कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में बहुसंख्यक समुदाय इस्लाम के सुन्नी मत को मानता है. शियाओं की तुलना में सत्ता के ढांचे को लेकर इनमें लचीलापन ज़्यादा है. इसलिए ये उम्मीद की जा सकती है कि तालिबान से जुड़े धड़े समझौते करने से हिचकेंगे नहीं.
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कैसी होगी महिलाओं की स्थिति?
क्या सत्ता के लिए की जा रही सौदेबाज़ी में महिलाओं की कोई भागीदारी होने जा रही है? फिलहाल न तो ऐसा होते हुए दिख रहा है और न ही इसकी कोई उम्मीद लग रही है. लड़कियों को केवल पढ़ने और काम करने की इजाजत देने का मतलब है कि तालिबान के पिछले रुख में बदलाव आया है. लेकिन पिछले 20 साल में अफ़ग़ानिस्तान में कुछ ऐसे बदलाव आए हैं, जिनके जाने में वक़्त लगेगा और तालिबान को फिलहाल से इससे निपटना होगा. जेवियर ग्विराडो आगाह करते हुए कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा आज़ादी पहले से ज़्यादा प्रशिक्षित है. ख़ासकर शहरों में, वे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं. वे वोट देते रहे हैं. इसलिए तालिबान शायद पिछली बार की तरह शासन चलाना नहीं चाहेगा."
अगर तालिबान ने दमन और ताक़त के जोर पर लोगों को दबाना शुरू किया तो उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने में परेशानी आएगी और इसके कूटनीतिक और आर्थिक परिणामों से उसे दो-चार होना होगा. थॉमस बारफील्ड कहते हैं, "सवाल ये है कि क्या तालिबान ने ये सबक सीखा है या नहीं कि देश पर हुकूमत करने के लिए उन्हें दुश्मनों से समझौते करने होंगे." प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने और पुरानी अफ़ग़ान हुकूमत के लोगों के साथ मेलजोल रखने वालों को धमकी देने से ज़्यादा उम्मीद बंधती हुई नहीं दिखती है. लेकिन इस सवाल का जवाब और नए आमिर का एलान, दोनों ही आने वाले वक़्त के पास छुपा है.
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