क्या है इस्तांबुल कन्वेंशन ? जिससे पीछे हटने पर तुर्की की महिलाएं भड़क गईं
अंकारा, 2 जुलाई: तुर्की के दोनों बड़े शहर इस्तांबुल और अंकारा में गुरुवार को हजारों महिलाएं सड़कों पर उतर आईं। इनका गुस्सा महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर हुए अंतरराष्ट्रीय समझौते से निकलने के वहां के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के फैसले को लेकर है। दुनिया के कई पश्चिमी देशों ने इस फैसले के लिए तुर्की की जबर्दस्त आलोचना की है। लेकिन, एर्दोगन महिलाओं को विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन अंतरराष्ट्रीय संधियों में कुछ नहीं रखा है, उनके अपने देश का कानून ही महिलाओं को उनका वाजिब हक दिलाने के लिए काफी है। जबकि, हकीकत ये है कि तुर्की की युवा महिलाएं कह रही हैं, वह अपने देश में ही असुरक्षित हो चुकी हैं। हर दिन सुबह की नींद महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की खबरों से खुलती है।

इस्तांबुल कन्वेंशन से पीछे हटने पर तुर्की में बवाल
तुर्की एक मुस्लिम देश है और वहां के राष्ट्रपति ने अपने फैसले से दिखा दिया है कि उनके लिए महिलाओं की सुरक्षा और उनके अधिकार ज्यादा मायने नहीं रखती। बड़ी बात ये है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार को लेकर हुई इस अंतरराष्ट्रीय संधि पर इस्तांबुल में ही हस्ताक्षर किए गए हैं, लेकिन खुद तुर्की ही उसमें से बाहर निकल गया है। ऊपर से तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की इस दलील ने वहां की महिलाओं के गुस्से की आग में घी डालने का काम किया है कि 'इस्तांबुल कन्वेंशन से पीछे हटने का मतलब ये कतई नहीं है कि वह महिलाओं की सुरक्षा से समझौता कर रहे हैं।' (ऊपर की तस्वीर सौजन्य- डीडी इंडिया)

क्या है इस्तांबुल कन्वेंशन ?
खास बात ये है कि महिलाओं को उनके खिलाफ होने वाली हिंसा और घरेलू उत्पीड़न से बचाने और उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए 2011 में इस्तांबुल कन्वेंशन पर वहां के सबसे बड़े शहर इस्तांबुल में ही चर्चा की गई थी और इसका खाका तैयार किया गया था। इस्तांबुल कन्वेंशन का मकसद तुर्की समेत दुनिया के बाकी देशों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार और घरेलू हिंसा पर लगाम लगाना था और समाज को उन्हें लैंगिक समानता दिलाने के लिए प्रोत्साहित करना था। इस समझौते पर 38 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। हालांकि, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने कहा है कि यह गलत दावा किया जा रहा है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा के खिलाफ '(हम) अपना कदम पीछे खींच रहे हैं।' उन्होंने प्रदर्शनकारी महिलाओं को विश्वास दिलाने की कोशिश की है कि 'हमारा संघर्ष इस्तांबुल कन्वेंशन से शुरू नहीं हुआ था और ना ही इस संधि से पीछे हटने से खत्म होगा।' लेकिन, तुर्की की महिलाओं को राष्ट्रपति की ओर से जताए गए भरोसे पर विश्वास नहीं है।

तुर्की में सुरक्षित महसूस करना मुमकिन नहीं-प्रदर्शनकारी महिला
एर्दोगन के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरीं महिलाओं ने जो बैनर लगाया था, उसमें से एक पर लिखा था, 'हम चुप नहीं होंगे, हम नहीं डरेंगे, हम झुकेंगे नहीं।' तुर्की की राजधानी अंकारा में एकत्रित हजारों की भीड़ के बीच महिलाओं ने कहा, 'हम इस्तांबुल कन्वेंशन पर हार नहीं मान रहे हैं।' 26 वर्षीय छात्रा ओजगुल का कहना है, 'यह अविश्वसनीय लग रहा है कि सुधारने के बजाय सरकार अधिकारें छीन रही है। हम हर दिन महिला हत्या की घटना सुनकर जागते हैं। एक महिला के रूप में इस देश में सुरक्षित महसूस करना संभव ही नहीं है।' जबकि तुर्की के रुढ़िवादियों और एर्दोगन की इस्लामिक एके पार्टी की दलील है कि यह संधि परिवार की शक्ति को कमजोर करता है। कुछ की दलील है कि यह संधि समलैंगिकता को बढ़ावा देता है।(ऊपर की तस्वीर सौजन्य- डीडी इंडिया)

तुर्की के फैसले की हो रही है आलोचना
तुर्की के आधिकारिक तौर पर कांउसिल ऑफ यूरोप्स इस्तांबुल कन्वेंशन से अलग होने पर एमनेस्टी इंटरनेशनल और यूरोपियन यूनियन ने भी उसकी खिंचाई की है। वहीं अमेरिकी प्रशासन ने भी तुर्की के फैसले की आलोचना की है और संधि से पीछे हटने के उसके फैसले को निराशाजनक और महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा मिटाने की कोशिशों के अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को पीछे धकेलने जैसा बताया है।












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