अफ्रीका के एक और देश ने अमेरिकी सैनिकों को निकाला बाहर, ईरान-रूस के आगे बाइडेन की बड़ी हार!
Chad-Americ News: अफगानिस्तान के बाद अब एक अफ्रीकी देश से अमेरिकी सैनिकों विदाई होने वाली है और बाइडेन प्रशासन की विदेश नीति की एक और बड़ी हार होने वाली है। संयुक्त राज्य अमेरिका, अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में भूमि से घिरे देश, चाड से अपने सैनिकों को वापस बुलाने पर विचार कर रहा है।
हालांकि यह कदम अस्थायी है, लेकिन इसका बहुत बड़ा जियो-पॉलिटिकल असर पड़ने वाला है। चाड से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, अफ्रीका महाद्वीप और विशेषकर साहेल क्षेत्र में पश्चिम के घटते सैन्य प्रभाव की तरफ इशारा करता है। क्योंकि, पिछले 2-3 सालों में एक के बाद एक अफ्रीकी देशों से अमेरिकी और फ्रांसीसी सैनिकों की वापसी हो रही है।

आखिर अफ्रीकी देशों से पश्चिमी देशों की सेनाओं की वापसी के क्या मायने हैं, आखिर इसके पीछे की वजह क्या है, आइये समझने की कोशिश करते हैं।
चाड से बाहर निकलेंगे अमेरिकी सैनिक
इस महीने की शुरुआत में, चाड के वायु सेना प्रमुख ने एन'जामेना के पास एक एयरबेस पर देश में अमेरिकी सैनिकों के अभियान रोकने की मांग की थी। गुरुवार को अमेरिकी अधिकारियों ने कहा, कि वे अपने सैनिकों को अस्थायी रूप से देश से बाहर ले जाने की योजना बना रहे हैं।
इस घटनाक्रम से चाड के साथ अमेरिका के संबंधों में नरमी आई है, जो पश्चिम अफ्रीका में इस्लामी विद्रोह के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका का एक महत्वपूर्ण भागीदार रहा है। चाड का कदम, इस क्षेत्र में पश्चिम के घटते सैन्य प्रभाव का एक और संकेत है।
खासकर पश्चिमी अफ्रीकी देशों में इस्लामिक चरमपंथ हावी होता जा रहा है और ऐसे में फ्रांसीसी और अमेरिकी सैनिकों की वापसी स्थिति को नाजुक बना सकता है।
नाइजर में, पिछले साल सैन्य शासन की स्थापना हुई थी और सेना ने चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर दिया था, जिससे नाइजर के नए सैन्य शासन ने अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग समझौते को समाप्त कर दिया। इसका मतलब यह था, कि अमेरिका को ऐसे देश से बाहर निकाला जा रहा है, जहां उसका सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी ठिकाना है।
अगले कुछ महीनों में करीब 1,000 अमेरिकी सैनिकों को नाइजर से वापस जाना होगा।
नाइजर पहले ही फ्रांसीसी सैनिकों को बाहर निकाल चुका है। पेरिस ने दिसंबर 2023 में पश्चिम अफ्रीकी देश में अपने सैन्य अभियान को खत्म कर दिया था। यह इस्लामी विद्रोहियों का मुकाबला करने के उद्देश्य से एक दशक से चली आ रही फ्रांसीसी सैनिकों की उपस्थिति का अचानक अंत था।
नाइजर से सैनिकों की वापसी, खासकर फ्रांसीसी सैनिकों की वापसी, एक व्यापक पैटर्न का हिस्सा हैं। बुर्किना फासो और माली सहित क्षेत्र में सैन्य जुंटा ने 2020 और 2022 के बीच लगातार अलग अलग देशों में तख्तापलट किए हैं और जिन देशों में सैन्य शासन की स्थापना हुई है, उन देशों ने एक के बाद एक पश्चिमी देशों से अपने सैन्य रिश्ते को खत्म किया है।
क्या पश्चिम से टूट रहा अफ्रीकी देशों का दिल?
अफ्रीकी देशों से पश्चिमी सैनिकों की वापसी के पीछे यूरोपीय संघ की भूमिका भी संदिग्ध है। अफ्रीकी जनता में उन कई देशों के प्रति गहरा अविश्वास है, जो इस गुट का हिस्सा हैं। अक्सर, इसका कारण उपनिवेशवादियों के रूप में इन देशों की भूमिका रही है। इन देशों के कई नागरिकों की सामूहिक चेतना में औपनिवेशिक युग की खराब स्मृति अभी भी ताज़ा है।
इसका दूसरा पहलू क्षेत्र में शांति बनाए रखने में यूरोपीय संघ की नाकामी है। आतंकवादी गतिविधियों पर रोक लगाना, इस क्षेत्र में यूरोपीय सैनिकों की उपस्थिति के पीछे प्राथमिक कारण बताया गया है, जो बड़े पैमाने पर बनी हुई है। आतंकवाद को रोकने में यूरोप नाकाम रहा है।
इस ब्लॉक ने माली और नाइजर में सैनिकों को प्रशिक्षण देने में भारी भरकम पैसा खर्च किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य अल-कायदा से जुड़े चरमपंथ का मुकाबला करना था। लेकिन, यूरोपीय संघ ने जिन लोगों को प्रशिक्षित किया, उनसे ही जुड़े लोगों ने सरकारों को गिराने वाले तख्तापलट में केन्द्रीय भूमिका निभाई।
क्या रूस और ईरान भरेंगे खाली स्थान?
जैसे जैसे इस क्षेत्र में पश्चिम का सैन्य प्रभाव कम हो रहा है, रूस और ईरान जैसे देशों का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
वैगनर ग्रुप, जो रूस की एक निजी आर्मी कंपनी है, जो भाड़े के सैनिकों की भर्ती करता है, और जिसे अमेरिकी अधिकारियों ने "क्रेमलिन की प्रॉक्सी सैन्य शक्ति" के रूप में वर्णित किया है, उसने अपने संचालन का विस्तार किया है। यह समूह मध्य अफ्रीकी गणराज्य, लीबिया, माली और सूडान जैसे देशों में अब काफी सक्रिय हो चुका है। वैगनर ने बुर्किना फासो के साथ जुड़ने की कोशिश की है। इसके अलावा, चाड की सरकार को भी अस्थिर करने का आरोप वैगनर पर ही लगे हैं।
रूसी सरकार खुद भी अफ्रीकी देशों में अलग अलग सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। 2023 में, काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) ने नोट किया है, कि अफ्रीका में रूस का प्रभाव बढ़ रहा है, मॉस्को ने 43 अफ्रीकी देशों के साथ सैन्य सहयोग समझौते हासिल किए हैं। ऐसा लग रहा है, कि रूस की रणनीति पूरे महाद्वीप में अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए पश्चिम विरोधी भावना का लाभ उठा रही है।
इसके अलावा, ईरान की बढ़ती भूमिका उसके सैन्य ड्रोनों के निर्यात को देखते हुए समझा जा सकता है, जिसका युद्धक्षेत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। सूडान में, ईरानी ड्रोन ने गृह युद्ध के दौरान सूडानी सशस्त्र बलों के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे राजधानी के आसपास के क्षेत्र पर फिर से सुडानी सेना का कब्जा हो गया है। इसी तरह, इथियोपिया की सेना ने 2021 में ईरानी ड्रोनों की मदद से टाइग्रेयन विद्रोहियों को हरा दिया और उसने अपनी जीत क्रेडिट भी ईरान को दिया है।
जाहिर तौर पर, बाइडेन प्रशासन की ये बड़ी जियो-पॉलिटिकल हार है और ये बताता है, कि वर्ल्ड पॉलिटिक्स में अमेरिका का वर्चस्व कैसे खत्म हो रहा है।












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