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अमेरिका को चांद पर वापस पहुंचने में 50 साल क्यों लगे? साउथ पोल पर उतरा पहला अमेरिकी प्राइवेट स्पेसक्राफ्ट

51 साल बाद अमेरिका दोबारा चांद पर पहुंचा है। एक प्राइवेट कंपनी द्वारा निर्मित अंतरिक्ष यान जिसका नाम ओडीसियस है, गुरुवार को न्यूयॉर्क समयानुसार शाम 6.23 बजे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचा।

पिछले महीनेअमेरिकी मून लैंडर मिशन पेरेग्रीन वन की असफलता के बाद, ये चंद्रमा पर किसी प्राइवेट अंतरिक्ष यान की पहली सफल लैंडिंग है। नासा ने इस मिशन के लिए लगभग 118 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भुगतान किया था।

US returns to moon

ओडीसियस 1972 में अपोलो 17 के बाद चंद्रमा की सतह पर उतरने वाला पहली अमेरिकी स्पेसक्राफ्ट बन गया है। इंटूइटिव मशीन्स नाम की ह्यूस्टन की ये कंपनी पहली निजी कंपनी बन गई है जिसने सफलतापूर्वक चांद पर अपना लैंडर उतारा है।

हालांकि लैंडर को उतारते वक्त कंट्रोलर्स का उसके साथ संपर्क लगभघ 10 मिनट के लिए टूट गया था लेकिन फिर जल्द इससे सिग्नल मिलने लगा। मिशन के डायरेक्टर टिम क्रेन ने कहा कि हम बिना किसी संदेह के कह सकते हैं कि ओडिसियस चांद की सतह पर मौजूद है।

ओडेसियस को बीते सप्ताह फ्लोरिडा के केप केनावेराल लॉन्च स्टेशन से छोड़ा गया था। स्पेसक्राफ्ट के 3 लाख 84 हजार किलोमीटर कू दूरी तय करने के बाद कंपनी के सीईओ स्टीव आल्टेमस ने अपनी टीम से कहा, "चांद पर स्वागत है, ओडेसियस को नया घर मिल गया है।"

नासा के ऐडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने कहा, "आज, आधी सदी से भी अधिक समय में पहली बार, अमेरिका चंद्रमा पर लौटा है। आज, मानवता के इतिहास में पहली बार, एक वाणिज्यिक कंपनी, एक अमेरिकी कंपनी ने वहां तक यात्रा शुरू की और उसका नेतृत्व किया।"

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने ओडेसियस लैंडर के ज़रिए छह वैज्ञानिक उपकरण चांद पर भेजे हैं। ओडिसियस मून मिशन का मकसद चांद पर मौजूद धूल की स्टडी करना है। दरअसल, अपोलो मिशन पूरा करके लौटे अंतरिक्ष यात्रियों ने बताया था कि धूल की वजह से उनके इक्विपमेंट्स खराब हुए थे।

इसलिए अब अमेरिकी वैज्ञानिक ये जानना चाहते हैं कि स्पेसक्राफ्ट के लैंड होने से उड़ने वाली धूल कैसे हवा में रहती है और फिर मून सरफेस पर बैठ जाती है। आपको बता दें कि अमेरिका आर्टेमिस मिशन पर काम कर रहा है जिसके तहत इंसान को चांद पर उतारा जाएगा और लंबे वक्त तक चांद इंसान के रहने की व्यवस्था की जाएगी।

चांद पर लौटने में 50 साल क्यों लगे?

बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक चंद्रमा पर बेहद कठोर वातावरण है। इसके लिए ऐसे अंतरिक्ष यान को डिज़ाइन करना कठिन है, जो इसकी सतह पर नेविगेट कर सके। इसके परीक्षण के लिए पृथ्वी पर उन स्थितियों को फिर से बनाना वैज्ञानिकों के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है।

वर्तमान में अमेरिकी निजी कंपनियों के संसाधन 1960 के दशक में नासा के पास मौजूद संसाधनों की तुलना में बहुत कम हैं। पांच दशक पहले अमेरिका अपने कुल बजट का 4 फीसदी मून मिशन पर खर्च कर देता था।

सबसे बड़ी बाधा शायद ऐसे इंजीनियर और कंपनियाँ भी रही होंगी जिनके पास मून मिशन का बहुत कम या कोई अनुभव नहीं था। 50 साल से अधिक समय हो गया है जब लोगों ने चंद्रमा पर लैंडर डिजाइन किया और भेजा था, इसलिए कंपनियां लगभग शून्य से शुरू कर रही थीं और नई प्रौद्योगिकियों के साथ काम कर रही थीं।

सबसे अहम बात ये है कि 1972 में आखिरी अपोलो मिशन के बाद नासा ने अपना ध्यान मून से हटाकर अंतरिक्ष शटल, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन और अन्य लक्ष्यों पर केंद्रित कर दिया था।

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