US Iran Peace Agreement: शांति समझौते में 'कबाब में हड्डी' बना पाकिस्तान! अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सर
US Iran Peace Agreement: अमेरिका-ईरान शांति समझौते में मध्यस्थ की भूमिका निभाने का दावा कर रहे पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक और झटका लगा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने समझौते का पूरा टेक्स्ट जारी करने में हुई देरी के लिए पाकिस्तान और कतर की व्यवस्था में प्रेस फ्रीडम की कमी को एक वजह बताया।
वेंस के इस बयान ने पाकिस्तान में मीडिया की आजादी और पारदर्शिता को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं दूसरी तरफ स्विट्जरलैंड में प्रस्तावित साइनिंग सेरेमनी भी नहीं हो सकी, जिससे पाकिस्तान की कूटनीतिक उपलब्धि बताई जा रही पहल पर भी सवाल उठने लगे हैं।

जेडी वेंस ने क्यों लिया पाकिस्तान का नाम?
'इंटरेस्टिंग टाइम्स विद रॉस डौथट' पॉडकास्ट में जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका समझौते का पूरा टेक्स्ट जल्दी जारी करना चाहता था, लेकिन इसमें देरी हुई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और कतर में अमेरिकी संविधान के First Amendment जैसी मजबूत प्रेस फ्रीडम व्यवस्था नहीं है। उनके मुताबिक वहां यह उम्मीद नहीं की जाती कि किसी बड़े समझौते को जनता और मीडिया के सामने तुरंत विश्लेषण के लिए रखा जाए। वेंस की यह टिप्पणी सीधे तौर पर पाकिस्तान की मीडिया व्यवस्था पर सवाल मानी जा रही है।
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First Amendment का क्या है महत्व?
अमेरिकी संविधान का First Amendment अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसके तहत सरकार मीडिया या नागरिकों की आवाज दबाने वाले कानून आसानी से नहीं बना सकती। जेडी वेंस का कहना था कि इसी वजह से अमेरिका में बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों को सार्वजनिक करना जरूरी माना जाता है। दूसरी तरफ पाकिस्तान में ऐसी संवैधानिक सुरक्षा उतनी मजबूत नहीं है, जिसके कारण पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लगातार बहस होती रही है।
प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में क्यों पिछड़ रहा पाकिस्तान?
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान 180 देशों में 153वें स्थान पर है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों का कहना है कि वहां पत्रकारों को कई तरह के दबाव, सेंसरशिप और सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हाल के वर्षों में कई रिपोर्ट्स में मीडिया पर बढ़ते नियंत्रण की बात कही गई है। नवंबर 2025 में पारित 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद भी आलोचकों ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्र निगरानी की ताकत कमजोर हुई है, जिसका असर प्रेस फ्रीडम पर पड़ सकता है।
MoU जारी होने में क्यों हुआ विवाद?
डोनाल्ड ट्रंप ने 15 जून को अमेरिका-ईरान शांति समझौते की घोषणा कर दी थी, लेकिन समझौते का पूरा MoU दो दिन बाद सार्वजनिक किया गया। इस देरी को लेकर अमेरिका में विपक्षी डेमोक्रेट नेताओं ने सवाल उठाए। आलोचकों का आरोप था कि समझौते की कुछ अहम शर्तें जनता से छिपाई जा रही हैं और ईरान को बड़ी रियायतें दी गई होंगी। बढ़ते राजनीतिक दबाव के बाद आखिरकार समझौते का पूरा टेक्स्ट जारी किया गया, जिससे विवाद कुछ हद तक शांत हुआ।
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स्विट्जरलैंड साइनिंग सेरेमनी क्यों नहीं हो सकी?
पाकिस्तान सरकार इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता के तौर पर पेश कर रही थी। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया था कि 19 जून को स्विट्जरलैंड में आधिकारिक साइनिंग सेरेमनी होगी। लेकिन बाद में ईरान के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया कि ऐसा कोई कार्यक्रम तय नहीं है। इसके बाद डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने डिजिटल माध्यम से समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इस घटनाक्रम के बाद शहबाज शरीफ ने स्विट्जरलैंड से जुड़ा जिक्र अपने पोस्ट से हटा दिया और प्रस्तावित दौरा भी रद्द कर दिया।












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