यूक्रेन ने बदला जंग का तरीका, बेदम हो जाएंगे बड़े बड़े हथियार.. नेक्स्ट जेनरेशन लड़ाई के लिए भारत कितना तैयार?
Indian Army: यूक्रेन में पिछले दो सालों से चल रही लड़ाई में हेलीकॉप्टर्स को गाजर-मूली की तरह मार गिए हैं, जिससे सबक लेते हुए अमेरिकी सेना ने अपनी अगली पीढ़ी के, अरबों डॉलर के फ्यूचर अटैक रिकोनाइसेंस एयरक्राफ्ट (FARA) कार्यक्रम को रद्द करने का फैसला किया है।
इसके अलावा, अमेरिकी सेना ने साल 2025 तक UH-60 वी ब्लैक हॉक हेवीकॉप्टर के उत्पादन को भी रोकने की योजना तैयार की है और हेलीकॉप्टर्स के बजाए अब अमेरिकी सेना ने मानवरहित प्रणालियों और अंतरिक्ष में ले जाने वाले सस्ते सेंसर और नेक्स्ट जेनरेशन हथियारों में निवेश करने का फैसला किया।

हथियारों को बदलने की जरूरत क्यों?
यूक्रेन युद्ध, गाजा युद्ध और लाल सागर में हूतियों के जहाजों पर होने वाले हमलों ने एक चीज जो साफ कर दी है, लो ये, कि अब महंगे हवाई प्लेटफार्मों को बहुत सस्ते AD हथियारों से बेअसर किया जा सकता है। अमेरिकी वायु सेना ने सर्विस फ्लीट रीपर ड्रोन को किसी ऐसे हथियार से बदलने की योजना बनाई है, जो ऐसे शत्रुतापूर्ण वातावरण में मजबूती से रिस्पांस कर सके। अभी तक पता चला है, कि अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर ड्रोन, जिसे भारत अमेरिका से खरीद रहा है, उसे युद्ध के मैदान में काफी आसानी से गिरा दिया जा रहा है। लिहाजा, अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर ड्रोन को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
पेंटागन अब ऐसे हथियारों को अपने बेड़े से हटाना चाहता है, जिसके जरिए उसने अफगानिस्तान में उस तालिबान से लड़ाई लड़ी थी, जिसके पास गिने-चुने हथियार ही थे।
लेकिन, यूक्रेन युद्ध ने आधुनिका लड़ाई के तरीके को बदल दिया है। यूक्रेन में ना सिर्फ लड़ाकू हेलीकॉप्टरों को मार गिराया गया है, बल्कि संघर्ष के पहले ही महीने में दोनों पक्षों ने लगभग 50 लड़ाकू विमान खो दिए। हेलीकॉप्टर्स बेड़े में तबाही मचने के बाद रूस को अपने स्टैंड-ऑफ हथियारों और क्रूज मिसाइलों का उपयोग करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
यूक्रेनी एडी हथियार (Area denial weapon) युद्ध में सबसे प्रभावी साबित हुए हैं। सप्रेशन ऑफ एयर डिफेंस (SEAD) हर परिस्थिति में प्रभावी नहीं होता है। यूक्रेनी सेना ने मास्को पर प्रतीकात्मक रूप से हमला करने के लिए छोटे, सस्ते कामिकेज़ ड्रोन का भी बहुत प्रभावी उपयोग किया, जिनमें कुछ लंबी दूरी के ड्रोन थे।
समुद्र में मार करने वाली क्रूज मिसाइलों ने रूस के बड़े युद्धक जहाज "मोस्कवा" को डूबो दिया, जो एक और संकेत है, कि बड़े, महंगे प्लेटफार्मों की सुरक्षा करना आसान नहीं है। रूस के कई एयरक्राफ्ट को रूस ने अपने ड्रोन से तबाह कर दिए हैं।
एयर पॉवर को नेक्स्ट लेवल पर जाने की जरूरत
अभी तक एयरफोर्स को किसी लड़ाई में सबसे ज्यादा जरूरी माना जाता रहा है, लेकिन अब हवाई लड़ाई के तरीके भी बदल रहे हैं। सैन्य जानकारों के मुताबिक, लड़ाकू विमानों में भी स्टील्थ फाइटर जेट्स अभी हॉट डिमांड में हैं। एयर पावर से किसी टारगेट पर बम गिराने, जमीनी सेना को हवाई मदद देने, पैराट्रूप हमला करने, कार्गो ऑपरेशन और एयरड्रॉप की अनुमति मिलती है।
एक्सपर्ट्स का कहना है, कि एक मजबूत दुश्मन के सामने हवाई शक्ति हमेशा काम नहीं कर पाती है। वियतनाम युद्ध में अमेरिकी एयरफोर्स नाकाम हो गया था। दो अरब-इजरायल युद्धों और बेक्का घाटी अभियानों में हवाई वर्चस्व का असर थोड़ा कम ही रहा है।
जमीन से हवा में मार करने वाली अत्याधुनिक मिसाइलों ने बहुत हद तक हवाई युद्ध की परिभाषा बदल दी है।
मानव-पोर्टेबल मिसाइल AD सिस्टम (MANPADS), जिसे कंधे पर रखकर फायर किया जाता है, उसके जरिए किसी जगह छिपकर दुश्मन के टारगेट पर बहुत आसानी से हमला किया जाता है और यूक्रेन में इस हथियार ने रूसी खेमे में जमकर तूाही मचाई है। यूक्रेन को अमेरिका से मिले AD सिस्टम ने दर्जनों हेलीकॉप्टर्स को मार गिराए।
इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और गाइ़डेड एनर्जी हथियारों के विकास ने भी युद्ध को काफी कठिन बना दिया है। और दुश्मनोो को लंबी दूरी के महंगे सटीक हमलों के लिए मजबूर किया गया है।
हवाई युद्ध का क्या है भविष्य?
अमेरिका फिफ्थ जेनरेशन स्टील्थ फाइटर जेट का निर्माण कर चुका है और छठी पीढ़ी के फाइटर जेट के निर्माण में लग चुका है। अमेरिका भविष्य में चीन या फिर रूस के साथ संघर्ष ध्यान में रखकर भविष्य के लिए खुद को तैयार कर रहा है। भारत में अभी पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को लेकर फाइल रक्षा मंत्रालय के दफ्तर में फाइलों में है, जबकि पाकिस्तान ने चीनी स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने की घोषणा इसी महीने की है।
इसके अलावा अमेरिका, मानव रहित विमान, मानव रहित एडवांस ड्रोन सिस्टम, साइबर और इलेक्ट्रॉनिक हथियारों के निर्माम में जुटा हुआ है।
भविष्य की लड़ाई में ट्रेडिशनल नेविगेशन, टारगेटिंग, कम्युनिकेशन, ISR सपोर्ट, अंतरिक्ष से इस्तेमाल होने वाले हथियारों और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध शामिल होंगे।
पांचवीं पीढ़ी के एक आधुनिक लड़ाकू विमान की कीमत करीब 100 मिलियन डॉलर है। अत्याधुनिक एवियोनिक्स और हथियारों के साथ एनजीएडी अत्यधिक लागत वाली होगी और इसकी लागत "कई सौ करोड़" होगी। लिहाजा, ऐसे फाइटर जेट्स का बेड़ा तैयार करना काफी महंगा होगा और ये फाइटर जेट, काफी सस्ते मिसाइलों से मार खाकर बेदम भी हो सकते हैं।
यूक्रेन में हवाई हमले क्यों साबित हो रहे फेल?
यूक्रेन ने अपनी सीमित हथियार क्षमता के साथ अपने से कम से कम 10 गुना ज्यादा मजबूत रूसी वायुसेना को अपने छोटे हथियारों से भारी नुकसान पहुंचाया है। इसका नतीजा ये हुआ है, कि पिछले कई महीनों से रूसी ड्रोनों ने उड़ान भरना बंद कर रखा है। हालांकि, इसके पीछे पश्चिमी देशों से लगातार मिलने वाला एयर डिफेंस सिस्टम और युद्ध के मैदान का अपनी जमीन पर होने वाली लड़ाई का फायदा भी था।
हालांकि, कई एक्सपर्ट्स का कहना है, कि रूस ने काफी खराब लड़ाई लड़ी है, जिससे यूक्रेन को रूसी विमानों को ध्वस्त करने में काफी मदद मिली। लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, इराक युद्ध के दौरान छोटी इराकी मिसाइलों ने भी कई अमेरिकी फाइटर जेट्स को ध्वस्त कर दिया था।
जिससे सवाल उठते हैं, कि यदि दुश्मन के ठिकानों को लंबी दूरी के हथियारों और क्रूज मिसाइलों से मारना है, तो क्या हमें महंगे प्लेटफार्मों पर बड़ी रकम बर्बाद करने की जरूरत नहीं है? साइबर युद्ध, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक जैमिंग, सस्ती लेकिन प्रभावी ओवर-लैपिंग वायु सुरक्षा, ड्रोन और मिसाइलों का बड़ा भंडार, क्या युद्ध में ज्यादा बड़ी भूमिका नहीं सकते हैं।
क्या भारत को बदलने चाहिए हथियार
भारत को पाकिस्तान और चीन, बेहतर क्षमताओं वाली दो शक्तिशाली सेनाओं का सामना करना है। लिहाजा, भारत को लंबी दूर तक मार करने वाली अपने हथियारों की आक्रामक क्षमता को और मजबूत करना होगा। जो एक स्मार्ट और ज्यादा किफायती विकल्प हो सकता है। भारत को अपनी मिसाइल स्टॉक को बढ़ाने के साथ सात अपने एयर डिफेंस को और भी ज्यादा मजबूत करना होगा। वहीं, संवेदनशील क्षेत्रों में एडी सिस्टम को बढ़ाना होगा।
इसके अलावा, भारत को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को बढ़ाने की जरूरत होगी। सुरक्षित जाम-प्रतिरोधी संचार महत्वपूर्ण होगा। इसके अलावा, भारत को स्पेस टेक्नोलॉजी का भी तेजी से विस्तार करना होगा, ताकि युद्ध के दौरान स्पेस वार में कहीं कोई चूक ना हो। वहीं, ड्रोन की क्षमता को एडवांस स्तर पर ले जाने की जरूरत होगी और युद्ध की स्थिति में सप्लाई चेन गड़बड़ा जाता है, लिहाजा एक विशालकाय भंडार बनाने की भी जरूरत होगी।
भारत को ड्रोन के घरेलू डिजाइन और उत्पादन में तेजी लानी होगी। ईरान और तुर्की इसके शानदार उदाहरण हैं और हाल की लड़ाईयों में देखा गया है, कि ईरानी ड्रोन ने लाल सागर में अमेरिका और ब्रिटेन जैसी शक्तियों को किस तरह से नाको चने चबाने पर मजबूर कर दिया है।
ड्रोन को स्टैंड-ऑफ हथियारों के साथ बहुत छोटे से लेकर मध्यम आकार और गुप्त यूसीएवी तक पूरे स्पेक्ट्रम को कवर करना होगा। मानवयुक्त मानवरहित टीमिंग (एमयूएम-टी) भविष्य है।
हालांकि, इन सबके बावजूद स्टील्थ फाइटर जेट्स और बमवर्षक विमान अभी भी प्रासंगिक बने रहेंगे। इन्हें विकसित होने में काफी समय लगता है, लिहाजा यह प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए। वहीं, लड़ाकू विमानों के पास लंबी दूरी तक सटीक प्रहार करने वाले हथियार होने चाहिए।
और सबसे अहम बात.. हमें हथियारों के विकास और उत्पादन में जल्दबाजी करने की जरूरत है, क्योंकि यूक्रेन युद्ध से सबसे बड़ी सीख यही मिलती है। यूक्रेन युद्ध से लगातार सबक मिल रहे हैं और सस्ते और प्रभावी हथियार विकसित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता बनानी होगी। वहीं, हमें लगातार संख्या और क्षमताओं के मुताबिक प्रतिद्वंद्वी की ताकत और उसके खतरे का आकलन करते रहना होगा, लिहाजा स्पेस, एमयूएम-टी, साइबर, एडी सिस्टम विस्तार करना होगा।
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