Turkey Election: क्या तुर्की के आधुनिक 'गांधी' बन पाएंगे अगले राष्ट्रपति? अर्दोआन पहली बार चुनाव में पिछड़े

तुर्की के कई पत्रकारों का कहना है, कि किलिकडारोग्लू की राजनीति में महात्मा गांधी की शैली झलकती है। हालांकि, अर्दोआन की तरह वो जनता पर धर्म की राजनीति का धुआं नहीं छोड़ते हैं, जो उन्हें कमजोर करता है।

Turkey Election 2023

Turkey Election 2023 Kemal Kilicdaroglu: तुर्की में अगले हफ्ते, यानि 14 मई को संसदीय और राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है और तुर्की के तमाम नेता, चुनावी कैम्पेन के लिए जी-जान से जुटे हुए हैं। हालांकि, मुख्य मुकाबले तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन और 6 विपक्षी पार्टियों के संयुक्त उम्मीदवार केमल किलिकडारोग्लू के बीच है।

केमल किलिकडारोग्लू, तुर्की की मुख्य विपक्षी पार्टी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (तुर्की में कुम्हुरियेट हल्क पार्टिसि या CHP) के अध्यक्ष हैं, जिनका 5 और विपक्षी पार्टियों ने समर्थन किया है।

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किलिकडारोग्लू क्यों कहा जाता तुर्की का 'गांधी'

महत्मा गांधी की तरह की गोल चश्मा और मूंछ रखने वाले किलिकडारोग्लू ने अपने सरल और सहज व्यक्तित्व से लोगों को लुभाया है। लिहाजा, पिछले कई सालों से, राजनीतिक टिप्पणीकारों ने किलिकडारोग्लू की तुलना महात्मा गांधी से की है।

तुर्की की मीडिया अकसर किलिकडारोग्लू को "गांधी केमल" के नाम से संबोधित करती है।

उन्हें महात्मा गांधी की तरह ही मामूली चश्मे वाले नेता के तौर पर देखा जाता है, जो लोगों के साथ काफी सहज होते हैं। पोलिटिको की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि गांधी की तरह, किलिकडारोग्लू की राजनीतिक शैली "विनम्र" है।

किलिकडारोग्लू की पार्टी CHP की विचारधारा वामपंथी-मध्यममार्गी है, जो तुर्की की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है, जिसे आधुनिक तुर्की राष्ट्र के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने स्थापित किया था।

साल 2016 से जर्मनी में निर्वासन में रह रहे तुर्की के समाचार पत्र कुम्हुरियेट के पूर्व संपादक कैन डंडर ने जून 2017 में द वाशिंगटन पोस्ट में एक लेख में लिखा था, जिसमें उन्होंने सीएचपी के प्रमुख चुने जाने के तुरंत बाद किलिकडारोग्लू को 'गांधी' उपनाम दिया था। हालांकि, उन्होंने अपने आर्टिकिल में ज्यादातर महात्मा गांधी की विनम्रता और कदकाठी से किलिकडारोग्लू की तुलना की थी और उनकी क्रांतिकारी साख को उजागर नहीं किया गया था।

हालांकि, किलिकडारोग्लू की राजनीति बहुत हद तक गांधी की तरह की अहिंसक आंदोलन से प्रभावित रहा है। जब किलिकडारोग्लू के डिप्टी एनिस बेरबेरोग्लू, जो एक पत्रकार हैं, उन्हें राष्ट्रपति अर्दोआन ने अपनी आलोचना से तिलमिला कर कथित जासूसी के आरोप में जेल भेजा और फिर उन्हें 25 साल की जेल की सजा सुनाई गई, तो किलिकडारोग्लू ने अंकारा से इंस्ताबुल तक 450 किलोमीटर की यात्रा शुरू कर विरोध मार्च शुरू किया था।

किलिकडारोग्लू के 450 किलोमीटर की पदयात्रा की तुलना तुर्की में महात्मा गांधी के प्रसिद्ध 1930 के दांडी मार्च से की गई। महात्मा गांधी की पदयात्रा के दौरान अंग्रेजी शासन ने करीब 60 हजार भारतीयों को गिरफ्तार किया था, जबकि किलिकडारोग्लू की यात्रा के दौरान अर्दोआन सरकार ने उनके करीब 2 लाख समर्थकों को गिरफ्तार किया और उस वक्त तुर्की की सभी 372 जेलें, किलिकडारोग्लू के समर्थकों से भर गईं थीं।

इस मार्च का तुर्की की राजनीति और तुर्की की जनता पर भारी असर पड़ा और अर्दोआन के समर्थन में भारी कमी आई, वहीं किलिकडारोग्लू, विपक्षी मोर्चे के सबसे लोकप्रय और सशक्त नेता बन गये, जिन्हें अर्दोआन के खिलाफ एक मजबूत उम्मीदवार के तौर पर खड़ा कर दिया।

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किलिकडारोग्लू की पृष्ठभूमि क्या है?

किलिकडारोग्लू, जो अब 75 साल के हों, वो पहले तुर्की की सरकार में एक सिविल सर्वेंट थे, जिन्होंने कई वर्षों तक तुर्की की सामाजिक सुरक्षा एजेंसी का नेतृत्व किया और नौकरी से रिटायर होने के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया।

अल जज़ीरा प्रोफाइल में कहा गया है, कि उनका जन्म 1948 में पूर्वी तुर्की शहर टुनसेली में हुआ था, एक ऐसे परिवार में जो अल्पसंख्यक अलेवी विश्वास का पालन करता था। अलेविस 13वीं शताब्दी के फारसी-तुर्की दरवेश हाजी बेक्टश वेली के अनुयायी हैं, जिन्होंने इस्लाम के एक गूढ़ और मानवतावादी रूप को अपनाया है।

किलिकडारोग्लू ने अंकारा एकेडमी ऑफ इकोनॉमिक्स एंड कमर्शियल साइंसेज (अब गाज़ी विश्वविद्यालय) में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की और सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में तुर्की के आर्थिक और वित्तीय संस्थानों में शीर्ष पदों पर काबिज हुए। उन्होंने अंकारा में हैकेटपे विश्वविद्यालय में भी पढ़ाया।

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राजनीति में उनका करियर कैसा रहा है?

साल 2002 में किलिकडारोग्लू को उनकी पार्टी सीएचपी की तरफ से इंस्ताबुल सीट से टिकट दिया गया और उन्होंने जीत हासिल कर पहली बार देश की संसद में कदम रखा। ये वही चुनाव था, जिसने पहली बार अर्दआन की जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी (एडालेट वी कल्किन्मा पार्टिसि या एकेपी) को सत्ता में लाया था।

किलिकडारोग्लू तुर्की में भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाले एक बड़े नेता बन गये, जिसे पता था, कि सरकार में भ्रष्टाचार कहां और किस स्तर पर होता है। साल 2007 में वो देश की संसद के लिए फिर से चुने गए। 2009 में, उन्होंने इस्तांबुल के मेयर बनने के लिए चुनाव लड़ा और 2010 में उन्हें उस वक्त सीएचपी पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया, जब सीएचपी के तत्कालीन अध्यक्ष डेनिज़ बायकल का एक घोटाले से जुड़ा वीडियो लीक हो गया था और उन्हें पार्टी का अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा था।

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क्या अर्दोआन को टक्कर दे पाएंगे किलिकडारोग्लू?

किलिकडारोग्लू को अपने सीएचपी के साथ-साथ पांच छोटे विपक्षी दलों का औपचारिक समर्थन मिला हुआ है, जिसे 'टेबल ऑफ सिक्स' कहा जा रहा है।

किलिकडारोग्लू ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद अपने सहयोगियों से कहा था, कि "हम परामर्श और समझौते के साथ तुर्की पर शासन करेंगे। हम नैतिकता और न्याय के शासन को एक साथ स्थापित करेंगे।"

विश्लेषकों का कहना है, कि किलिकडारोग्लू ने तुर्की में वर्षों के आर्थिक संकट के बीच लोगों को एक नई उम्मीद दी है। अर्दोआन, जिन्होंने तुर्की की संसद (लीरा) को काफी कमजोर कर दिया है, उसे किलिकडारोग्लू ने फिर से मजबूत करने का वादा किया है। किलिकडारोग्लू का लोकतंत्र में भारी आस्था है और अगर वो जीतते हैं, तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए ये अमृत के समान होगा।

लेकिन, राष्ट्रपति अर्दोआन कट्टर मजहबी एजेंडे के साथ चुनाव प्रचार कर रहे हैं और दो दिन पहले उनकी चुनावी रैली में रिकॉर्ड 17 लाख लोग पहुंचे थे, जिसे देखकर कहना मुश्किल है, कि चुनाव में किसका पलड़ा भारी रहेगा।

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    कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है, कि किलिकडारोग्लू, अर्दोआन की तरह लोगों पर अपना प्रभाव नहीं डाल पाते हैं और अर्दोआन की तरह रैलियां नहीं करते हैं। भीड़ को अपनी धुन पर नचाने की क्षमता का भी उनमें अभाव है, जबकि अर्दोआन ऐसा करने में माहिर हैं। तभी वो पिछले 20 सालों से सरकार चला रहे हैं।

    एक्सपर्ट्स के मुताबिक, किलिकडारोग्लू देश में भ्रष्टाचार विरोधी नेता की पहचान जरूर रखते हैं, लेकिन उनका विजन क्या होगा, अर्दोआन के हटने के बाद उनकी आर्थिक और विदेश नीति क्या होगा, इसपर उन्होंने ज्यादा बात नहीं की है, जो उनके खिलाफ भी जा सकता है।

    तुर्की में जो भी ओपिनियन पोल किए गये हैं, उनमें राष्ट्रपति अर्दोआन को किलिकडारोग्लू के मुकाबले थोड़ा पीछे दिखाया गया है, लेकिन अर्दोआन के करिश्मे को कम करके नहीं आंका जा सकता है, क्योंकि कुछ बात है, तभी तो 2003 से वो लगातार पहले देश के प्रधानमंत्री रहे और फिर राष्ट्रपति बन गये।

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