केवल छह दिन में ही हार गया था तालिबान, डरपोक की तरह भागा था काबुल से
काबुल, 12 सितंबर। तालिबान ने इस बार अफगानिस्तान को ऐसे जीत लिया जैसे किसी ने मख्खन के बीच से छुरी निकाल ली हो। इसलिए खूब अकड़ रहा है। लेकिन लगता है वह 20 साल पहले हुई अपनी शर्मनाक हार को भूल गया है। तब अमेरिका ने सिर्फ छह दिनों में ही तालिबान की सत्ता उखाड़ फेंकी थी। बुजदिलों की तरह तालिबानी काबुल से भाग खड़े हुए थे। अगर इस बार भी वे शांति के लिए खतरा बने तो वजूद मिटते देर न लगेगी। काबुल कांड ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की साख मिट्टी में मिली दी है। वे पलटवार के लिए मौका तलाश रहे हैं। बाइडन अपनी और अमेरिका की छवि को बचाने के लिए अब किसी सीमा तक जा सकते हैं। उसी तरह जैसे 2001 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 'ऑपरेशन इनडरिंग फ्रीडम’ लॉन्च किया था।

तालिबान पर अमेरिकी हमले की पृष्ठभूमि
11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ था। न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर को बिमान टकरा कर जमींदोज कर दिया गया था। इस घटना में करीब तीन हजार लोग मारे गये थे। 20 सितम्बर 2001 को अमेरिका ने अपनी तमाम जांच के बाद कहा था कि इस घटना के पीछे अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन का हाथ है। उस समय लादेन अफगानिस्तान में छिप कर अलकायदा को संचालित कर रहा था। तब अमेरिका ने अफगानिस्तान में शासन कर रहे तालिबान सरकार को अल्टीमेटम दिया कि वह लादेन को अमेरिका के हवाले कर दे। तालिबान ने लादेन को सौंपने से इंकार कर दिया। वह अमेरिका से लादेन के खिलाफ सबूत मांगने लगा। 9/11 की घटना ने अमेरिका को हिला दिया था। पूरे देश में आक्रोश की लहर थी। राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 21 सितम्बर को संसद (कांग्रेस) की दोनों सदनों को संबोधित किया। देश की भावनाओं से सदन को अवगत कराया। इसके बाद बुश ने सेना, सीआइए और एफबीआइ के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक इमरजेंसी बैठक की। तालिबान को सबक सीखाने के लिए 'ऑपरेशन इनडरिंग फ्रीडम' शुरू करने पर सहमति बनी। ब्रिटेन भी इस अभियान में साझीदार बना।

ऑपरेशन इनडरिंग फ्रीडम और तालिबान की हार
7 अक्टूबर 2011, दिन रविवार। अमेरिका के बी-1 लेंसर, बी-2 स्प्रीट और बी-52 स्ट्रेटोफॉर्टरेस जैसे अत्याधुनिक विमानों ने अफगानिस्तान में अलकायदा और तालिबान के सैन्य ठिकानों पर बमबारी शुरी कर दी। लेंसर अमेरिकी वायुसेना का सुपरसोनिक बमर्षक है जब कि स्प्रीट की खासियत यह है कि वह बहुत मुश्किल से रडार पर दिखाता है और छिप कर वार करता है। ब्रिटेन के लड़ाकू विमान भी अगल टारगेट पर बम गिराने लगे। इस हमले से पहले अमेरिका और ब्रिटेन ने ओमान की खाड़ी के पास अपने युद्धपोत तैनात कर दिये थे। इन युद्धपोतों से क्रूज मिजाइल से हमला किया जाने लगा। बम और मिजाइल के चौतरफा हमलों से तालिबान के होश फाख्ता हो गये। बड़ी संख्या में तालिबानी सैनिक मारे गये। दो दिन बाद ही अमेरिका के नेतृत्व में सहयोगी सेना ने मजारे शरीफ पर कब्जा कर लिया। तालिबान के पांव उखड़ते चले गये। धीर-धीरे पूरे उत्तरी अफगानिस्तान पर अमेरिका ने अपने प्रभाव में कर लिया। अमेरिका ने केवल छह दिन में ही काबुल पर भी नियंत्रण कर लिया। मित्र सेना के काबुल में आने से पहले ही तालिबानी सरकार के नुमाइंदे शासकीय भवन छोड़ कर भाग गये। 2001 में तालिबानी भी काबुल से वैसे ही भागे थे जैसे कि 2021 में अशरफ गनी।

बिना लड़े ही भाग खड़े हुए तालिबानी
तालिबान का इतनी जल्दी औऱ बिना लड़े ही काबुल से भाग जाना बहुत हैरान करने वाला था। तालिबान के बड़े नेता काबुल से भाग कर अफगानिस्तान के कुंदुज प्रांत चले गये। लेकिन 26 नम्बर को अमेरिका ने यहां भी नियंत्रण बना लिया । तब तालिबान से सभी बड़े नेता भाग कर पाकिस्तान चले गये। दिसम्बर में कंधार भी तालिबान के हाथ से निकल गया। नम्बर 2001 में अमेरिका के नेतृत्व में मित्र सेना ने कंधार से 190 किलोमीटर दूर एक सैन्य अड्डा बनाया। अमेरिका को सूचना थी कि लादेन तोराबोरा की पहाड़ियों में कही छिप कर रह रहा है। दिसम्बर में अमेरिका, ब्रिटेन और नॉदर्न एलायंस की सेना ने मिल कर तोराबोरा की पहाड़ियों पर हमला शुरू किया। तालिबान और अलकायदा के सभी गुप्त ठिकाने बमबारी में तबाह हो गये। लेकिन लादेन अमेरिका के हाथ नहीं आया। वह भाग कर पाकिस्तान चला गया था। इस तरह अफगानिस्तान से तालिबान के शासन का खात्मा हो गया। अक्टूबर 2004 में पहली बार अफगानिस्तान में प्रत्यक्ष चुना हुआ। हामिद करजई राष्ट्रपति चुने गये। एक साल बाद 2005 में संसद के लिए चुनाव हुआ। इस तरह तालिबान को अफगानिस्तान में शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी।












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