ड्रैगन का गुलाम बनेगा इस्लामिक संगठन तालिबान! CPEC प्रोजेक्ट से जुड़ने के लिए कर रहा चापलूसी
तालिबान और चीन के बीच मधुर संबंध बनाने के लिए पाकिस्तान का पूरा राजनीतिक और सैन्य महकमा लगा हुआ है। आईएसआई चीफ का काबुल दौरे के पीछे भी यही वजह थी।
काबुल, सितंबर 07: अफगानिस्तान पर भले ही चीन ने कब्जा कर लिया है लेकिन इस्लामिक आतंकवादी संगठन तालिबान चीन का गुलाम बनने के लिए पूरी तरह से तैयार है। तालिबान भले ही अफगानिस्तान में लोगों का कत्लेआम कर रहा हो, लेकिन चीन की चापलूसी करने में उसे कोई परहेज नहीं है और ना ही उइगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार से उसे कोई मतलब है। इसीलिए अब तालिबान ने चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर से जुड़ने की इच्छा जताई है।

चीन के चरणों में लेटा तालिबान
तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने सोमवार को कहा कि इस्लामिक समूह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) में शामिल होना चाहता है। तालिबान के प्रवक्ता ने यह भी बताया कि तालिबान पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूह 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (टीटीपी) के बारे में इस्लामाबाद की चिंताओं को दूर करेगा। पाकिस्तानी न्यूज चैनस समा न्यूज के मुताबिक, तालिबान के प्रवक्ता मुजाहिद ने यह भी पुष्टि की है कि, पाकिस्तान के इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद और तालिबान के वरिष्ठ नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के बीच एक बैठक की गई है।

चापलूसी में जुटा इस्लामिक संगठन
सीपीईसी चीन की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' का एक हिस्सा है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया के तटीय देशों में चीन के ऐतिहासिक व्यापार मार्गों को बनाना है। 2015 में चीन ने 'चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर' (CPEC) परियोजना की घोषणा की थी, जिसकी कीमत 46 बिलियन अमरीकी डॉलर है। लेकिन, पाकिस्तान की आर्थिक तंगी की वजह से इसका काम रूका हुआ है। पिछले दिनों पाकिस्तान ने चीन ने 6 अरब डॉलर लोन मांगा था, लेकिन चीन ने यह कहते हुए कर्ज देने से इनकार कर दिया था, कि पाकिस्तान पहले चीन का बकाया लौटाए। जिसके बाद से सीपीईसी प्रोजेक्ट का काम बंद पड़ा है।

भारत को रोकना चाहता है चीन
दरअसल, माना जाता है कि सीपीईसी के साथ चीन का लक्ष्य संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान और मध्य और दक्षिण एशिया में अपने प्रभाव का विस्तार करना है। हालांकि, चीन इन आरोपों से इनकार करता रहा है और चीन का कहना है कि उसका ये प्रोजेक्ट किसी भी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि आर्थिक समृद्धि के लिए है। सीपीईसी पाकिस्तान के दक्षिणी ग्वादर बंदरगाह (कराची से 626 किलोमीटर पश्चिम में) को अरब सागर पर बलूचिस्तान में चीन के पश्चिमी शिनजियांग क्षेत्र से जोड़ेगा। इसमें चीन और मध्य पूर्व के बीच संपर्क में सुधार के लिए सड़क, रेल और तेल पाइपलाइन लिंक बनाने की योजना भी शामिल है।

आईएसआई चीफ का काबुल दौरा
तालिबान ने सीपीईसी प्रोजेक्ट के लिए उस वक्त हरी झंडी दिखाई है, जब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख जनरल फैज हमीद ने काबुल का दौरा किया था और कई तालिबानी नेताओं से मुलाकात की थी। ये घटनाक्रम उन रिपोर्टों के बीच आया है जिनमें कहा गया है कि आईएसआई ने तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने का समर्थन किया है। लेखक सर्जियो रेस्टेली ने इनसाइडओवर समाचार वेबसाइट पर बताया कि, "इस्लामाबाद ने तालिबान के गठन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) तालिबान को बनाने वाला और उसका समर्थन करने वाला है"।

क्या चाहता है पाकिस्तान?
रेस्टेली ने कहा कि तालिबान का निर्माण इस क्षेत्र में पकड़ हासिल करने के लिए अपनी रणनीतिक योजना के एक हिस्से के रूप में काबुल में कब्जा हासिल करने के लिए इस्लामाबाद का प्रयास था, जिसमें अभी वो कामयाब होता दिखाई दे रहा है। कई रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि आईएसआई ने तालिबान के साथ अपने "सहयोग एजेंटों" को तैनात किया था, जिन्होंने अफगानिस्तान जीतने में तालिबान की मदद की है। वहीं, ताजा वाकये में जब पंजशीर में तालिबान के 2 हजार से ज्यादा आतंकवादी मारे गये, तब तालिबान की मदद करने के लिए पाकिस्तान ने अपने फाइटर जेट भेज दिए। जिसके बाद ही तालिबान के आतंकवादी पंजशीर में दाखिल हो पाए।

तालिबान कैसे बनेगा गुलाम?
चीन के बारे में प्रसिद्ध है कि वो किसी देश को चंदा नहीं देता है। चंदा देने का काम अमेरिका का है। चीन अपना मुनाफा देखता है, भले उसके सामने पाकिस्तान हो या श्रीलंका। चीन पहले ही एक यूरोपीयन देश को कर्ज के पैसे नहीं लौटाने पर करीब करीब गुलाम बना चुका है। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह पर चीन कब्जा कर चुका है और कोलंबो इस्ट बंदरगाह के बड़े इलाके पर भी चीन का कब्जा हो चुका है। पाकिस्तान पहले ही चीन के कर्ज में बुरी तरह से फंसा हुआ है और अब पाकिस्तान किसी भी कीमत पर चीन से पीछा नहीं छुड़ा सकता है। लिहाजा अब पाकिस्तान ने चीन की दलाली करनी शुरू कर दी है। आप सोच रहे होंगे कि भला चीन अभी तक पाकिस्तान पर कब्जा क्यों नहीं कर रहा है, तो उसके पीछे वजह ये है कि फिलहाल चीन को पाकिस्तान से फायदा मिल रहा है और चीन अपने फायदे के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है और यही हाल आगे जाकर तालिबान का होगा।

पाकिस्तान को इस्तेमाल करता चीन
आप सोचेंगे कि पाकिस्तान का इस्तेमाल भला चीन कैसे कर रहा है, तो आपको बता दें कि तालिबान को पाकिस्तान ने बनाया है और पाकिस्तान के कहने पर तालिबान चीन की सारी बात मान रहा है। अगर किसी दिन तालिबान ने चीन की बात मानने से इनकार कर दिया या अपनी मर्जी चलानी शुरू की, तो अमेरिका की तरह चीन अफगानिस्तान पर आक्रमण नहीं करेगा...चीन तालिबान को खत्म करने के लिए पाकिस्तान को कहेगा और यही पाकिस्तान... जो अभी 'मुस्लिम-मुस्लिम' भाई-भाई कहते हैं, यही पाकिस्तानी तालिबान को मारने जाएंगे और विशेषज्ञों का कहना है कि ये इसलिए होकर रहेगा, क्योंकि तालिबान ज्यादा दिनों तक पाकिस्तान की बात मानने वाले नहीं हैं और इसकी झलक तालिबान की सरकार बनने से पहले ही देखी जा चुकी है, जब तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के बीच सरकार बनाने को लेकर झड़प तक हो चुकी है, जिसमें तालिबान का राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार मुल्ला उमर घायल हो चुका है। लिहाजा, फिलहाल यही माना जा रहा है कि तालिबान, चीन की गुलामी की जंजीर पहनने के लिए अपनी गर्दन आगे बढ़ा चुका है।












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