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Sudan: सूडान हिंसा की इनसाइड स्टोरी, सरकार का तख्तापलट करने वाली सेना-RSF के बीच क्यों छिड़ी जंग?

आधिकारिक तौर पर सूडान, सूडान गणराज्या का हिस्सा है और उत्तर पूर्व अफ्रीका में स्थिति एक देश है। सूडान, अफ्रीका और अरब जगत का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है और क्षेत्रफल के लिहाज से ये दुनिया का दसवां सबसे बड़ा देश है।

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Sudan: सूडान में सेना और अर्धसैनिक बलों के बीच चल रहे संघर्ष में अभी तक 56 आम नागरिकों और सेना के जवानों की मौत हो चुकी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, अभी तक 595 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं, जबकि मौत के आंकड़ों में भारी इजाफा होने की आशंका है।

सूडान में ये संघर्ष सेना, जिसका नेतृत्व जनरल अब्देल फतह अल-बुरहान कर रहे हैं, और रैपिड सपोर्ट फोर्स, जिसे RSF कहा जाता है, उसके बीच चल रहा है। मुख्य तौर पर इस संघर्ष के पीछे की वजह देश की सत्ता पर कब्जा करना है।

सूडान के डॉक्टर्स यूनियन ने अपने ताजा ट्वीट में कहा है, कि संघर्ष की वजह से 'भारी संख्या में लोग मारे गये हैं, और भारी संख्या में लोग गंभीर तौर पर घायल हुए हैं।' डॉक्टर्स यूनियन ने कहा है, कि मरने वालों में सेना के जवानों की संख्या काफी ज्यादा है, वहीं दर्जनों ऐसे घायल हैं, जिनकी स्थिति काफी गंभीर है।

रिपोर्टों से पता चलता है, कि मारे गए लोगों में से तीन, यूनाइटेड नेशंस के विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) के कर्मचारी थे।

रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है, कि खार्तूम में हवाई अड्डे पर दो लोग, ओमडुरमैन के पास के शहर में चार, एल फशेर में पांच, न्याला में आठ और एल ओबेद में छह लोग मारे गए हैं।

सूडान में क्यों चल रहा है संघर्ष?

सूडान में सेना और शक्तिशाली आरएसएफ के बीच का ये संघर्ष राजधानी के अलावा देश के कई हिस्सों में फैल चुकी है, जिससे लोकतंत्र में परिवर्तन की आशाओं को एक नया झटका लगा है और एक व्यापक संघर्ष की आशंका बढ़ गई है।

विश्लेषकों और कार्यकर्ताओं का कहना है, कि सूडान के इन दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच अपने अस्तित्व को बचाने और देश की सत्ता पर अपना प्रभुत्व हासिल करने के लिए संघर्ष लंबे समय से चल रहा था, लेकिन पिछले साल शुरू की गई एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थित राजनीतिक प्रक्रिया ने उनके बीच के तनाव को और बढ़ा दिया।

खार्तूम की राजधानी में नागरिकों ने दोनों बलों के बख्तरबंद वाहनों को सड़कों पर घूमते हुए देखा है, जबकि कई शहरी क्वार्टरों में भारी गोलाबारी की आवाज सुनी।

आरएसएफ ने कहा है, कि उसने राष्ट्रपति महल और खार्तूम अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है, हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। समूह ने यह भी कहा, कि उसने मेरोवे हवाई अड्डे को जब्त कर लिया है, जिसमें सूडानी और मिस्र के लड़ाकू विमान हैं। सूडान के सेना प्रमुख जनरल अब्देल फतह अल-बुरहान ने आरएसएफ के दावों का खंडन किया है।

सूडानी कार्यकर्ता दानिया अताबानी ने खार्तूम से अल जज़ीरा को बताया है, कि ""विमान हमारे घरों के ऊपर से उड़ रहे हैं और हम हर जगह फायरिंह की आवाज को सुन सकते हैं।"

सेना और RSF में क्यों हुआ अलगाव?

सूडान में 25 अक्टूबर 2021 को सेना और आरएसएफ ने साथ मिलकर लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट किया था। जिसके बाद सूडान के ऊपर अंतर्राष्ट्रीय दबाव काफी बढ़ने लगा और आखिरकार पिछले साल दिसंबर में सेना और आरएसएफ ने एक समझौता फ्रेमवर्क पर साइन किए।

उस समझौते ने देश में एक नई राजनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत की। इस समझौते के तहत देश के सभी प्रमुख मुद्दों को संबोधित करने और उन्हें सुलझाने की बात कही गई थी। वहीं, समस्याओं को सुलझाने के बाद देश में फिर से चुनाव कराने और एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन का वादा भी इस समझौते में किया गया था।

इस समझौते में सुरक्षा बलों पर लगाम लगाने के लिए सुरक्षा क्षेत्र में सुधार सबसे महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण मुद्दा था। लेकिन, चार राजनयिकों का कहना है, कि इस समझौते ने सुरक्षा बलों को अपनी ताकत को लेकर असुरक्षित कर दिया। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय जल्द से जल्द एक नागरिक सरकार की बहाली चाहता था। लिहाजा, ये समझौता पटरी से उतर गया।

नतीजतन, राजनीतिक प्रक्रिया ने आरएसएफ और सेना के बीच के टकराव को तेज कर दिया। दोनों बल, देश की सत्ता पर अपना नेतृत्व चाहते हैं।

स्वतंत्र राजनीतिक टिप्पणीकार जोनास हॉर्नर का कहना है, कि दोनों ही बलों को इस बात का डर है, कि अगर वो हारे, तो सूडान में उनकी हैसियत ही खत्म हो जाएगी।

आरएसएफ को किस बात का है डर?

ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित वैश्विक अधिकार समूहों के मुताबिक, आरएसएफ अरब सशस्त्र समूहों के सहयोग से विकसित हुआ, जिन पर 2000 के दशक की शुरुआत में दारफुर में नरसंहार करने का आरोप लगाया गया था।

इसका गठन साल 2013 में सूडान के पूर्व राष्ट्रपति उमर अल-बशीर ने किया था, जिन्होंने इस समूह को सीधे अपनी कमान में रखा था और इसे अपनी शासन को सेना से बचाने और सेना की खुफिया एजेंसियों से अपनी सरकार की रक्षा करने का काम सौंपा।

हालांकि, तत्कालीन राष्ट्रपति उमर अल-बशीर की ये योजना फेल हो गई और लोकतंत्र समर्थक के महीनों के विरोध के बाद अप्रैल 2019 में सेना और आरएसएफ, दोनों ही अल-बशीर के खिलाफ हो गए। आरएसएफ ने सेना से स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू कर दिया और दोनों के बीच राज्य की संपत्ति, विदेशी संरक्षक, वैधता और भर्तियों के लिए प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।

अक्टूबर 2021 में दोनों सेनाओं ने सूडान के उमर अल-बशीर की सरकार का तख्तापलट तो कर दिया, लेकिन उसी वक्त विशेषज्ञों ने चेतावनी दे दी थी, कि ये दोनों बल आगे चलकर एक दूसरे के खिलाफ हो जाएंगे। अब जाकर ये आशंका सच साबित हुई है।

सूडानी विश्लेषक और लोकतंत्र आंदोलन का समर्थन करने वाले वकील हामिद मुर्तदा ने संघर्ष से एक दिन पहले अल जज़ीरा को बताया था, कि "सेना और आरएसएफ दोनों ने सुविधा का विवाह किया था, लेकिन सेना में आरएसएफ को शामिल करने के मुद्दे को नजरअंदाज किया जाता रहा।"

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ये संघर्ष क्यों शुरू हुआ है?

सूडान में इस वक्त संघर्ष उस वक्त शुरू हुआ है, जब दो दिन पहले उत्तरी शहर मेरोवे में आरएसएफ को तैनात किया गया था। जिसके बाद सेना ने चेतावनी दी थी, कि अगर आरएसएफ पीछे नहीं हटता है, तो सूडान की सुरक्षा चरमरा सकती है।

वहीं, राजनयिक सूत्रों ने कहा कि क्वाड, जिसमें यूएस, यूके, यूएई और सऊदी अरब शामिल हैं, हाल के दिनों में आरएसएफ और सेना के बीच विवाद में मध्यस्थता करने की कोशिश में सबसे अधिक सक्रिय रहे हैं।

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    सूडान में संयुक्त राष्ट्र के राजनीतिक मिशन, जिसे UNITAMS के रूप में जाना जाता है, उसने भी अलग-अलग प्रयास किए हैं। लेकिन, ये सभी देश के सैनिकों के बीच के संघर्ष को रोकने में नाकाम रहे हैं।

    वहीं, अब जब लड़ाई छिड़ गई है, तो कई नागरिकों को डर है कि दोनों सेनाओं के बीच लंबे समय के लिए संघर्ष शुरू हो सकता है। आरएसएफ नेता, मोहम्मद हमदान "हेमेती" दगालो ने हाल ही में अल जज़ीरा अरबी को बताया था, कि सेना के प्रमुख अल-बुरहान को या तो इंसाफ के कटघरे में खड़ा किया जाएगा, या फिर कुत्ते की तरह मार दिया जाएगा।

    लिहाजा, माना जा रहा है, कि सूडान में चल रहा ये संघर्ष सैकड़ों की जान ले सकता है और ये संघर्ष कितना लंबा चलेगा, फिलहाल ये कहना मुश्किल है।

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