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भारत के गैसपाइपलाइन प्रोजेक्ट को लेकर तालिबान में तेज हुई राजनीति, हक्कानी और मुल्ला बरादर किसकी होगी जीत?

हक्कानी ग्रुप चाहता है कि अगर उसका इस पर नियंत्रण हो जाएगा तो वह भविष्य में पाकिस्तान, भारत, तुर्कमेनिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्कों पर दबदबा बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकेगा।

हाल ही में प्रकाशित हुए संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के बीच कुछ अहम प्रोजेक्ट्स को लेकर तनाव बढ़ गया है। इस तनाव का कारणों में तापी प्रोजेक्ट भी है जिसमें भारत भी हिस्सेदार है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क के मुखिया और कार्यवाहक आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी और कार्यवाहक प्रथम उप-प्रधानमंत्री मुल्ला बरादर के बीच कई मुद्दों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है।

Sirajuddin Haqqani and Mullah Baradar

रिपोर्ट के मुताबिक और सिराजुद्दीन हक्कानी तापी प्रोजेक्ट पर अपना नियंत्रण चाहता है, जबकि कार्यवाहक उप-प्रधानमंत्री मुल्ला बरादर उसके प्लान को फेल करने में लगा हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक बरादर के उप-प्रधानमंत्री होने की वजह से उसका सरकार पर असर कम है, लेकिन दक्षिणी प्रांत के प्रशासन में उसका अच्छा-खासा दबदबा है।

दो बेहद ताकतवर प्रशासक होने की वजह से तालिबान सरकार में दो पावर सेंटर बन गए हैं। काबुल गुट का नेतृत्व बरादर और कंधार गुट का नेतृत्व हक्कानी कर रहा है।

कंधार वाला गुट जहां खुद को बाकी दुनिया से अलग रखना चाहता है तो दूसरी ओर काबुल का गुट अंतरराष्ट्रीय मेलजोल बढ़ाने की इच्छा रखता है।

बरादर तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की कोशिश और विदेशी सहायता का विस्तार करने में जुटा है, ताकि विदेश में फ्रीज हुई संपत्तियों और दूसरे कारोबारी सामानों का इस्तेमाल हो सके।

इस बीच तालिबानी और हक्कानी, दोनों ही तापी प्रोजेक्ट पर अपना नियंत्रण चाहते हैं। हक्कानी नेटवर्क चाहता है कि उसे तापी प्रोजेक्ट पर नियंत्रण मिल जाए, ताकि इसके सहारे एक बड़े आर्थिक स्रोत पर उसका नियंत्रण रहे।

हक्कानी ग्रुप चाहता है कि अगर उसका इस पर नियंत्रण हो जाएगा तो वह भविष्य में पाकिस्तान, भारत, तुर्कमेनिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्कों पर दबदबा बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकेगा।

वहीं, मुल्ला बरादर इसे तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने वाले प्रोजेक्ट के तौर पर देख रहा है। आपको बता दें कि तापी प्रोजेक्ट में चार देश शामिल हैं। अगर इस प्रोजेक्ट पर तालिबान की पकड़ होती है तो वो इसके जरिए अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की कोशिश तेज कर सकता है।

आपको बता दें कि तापी या TAPI (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-इंडिया) को ट्रांस-अफगानिस्तान पाइपलाइन प्रोजेक्ट के नाम से जाना जाता था। पाकिस्तान और भारत के शामिल होने के बाद इसका नाम तापी (TAPI) हो गया।

तापी गैस पाइपलाइन अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होते हुए तुर्कमेनिस्तान से भारत पहुंचेगी। ये पूरी पाइपलाइन 1,814 किलोमीटर लंबी होगी। एशियन डेवलपमेंट बैंक के मुताबिक, इस गैस के खरीदार अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत होंगे।

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