Video: दुर्लभ Whalefish का वैज्ञानिकों से हुआ आमना-सामना, कहा जाता है इसे 'मायावी' मछली
वॉशिंगटन, 13 अगस्त। पृथ्वी पर 71 फीसदी पानी है, इनमें से ज्यादातर समुद्र का खारा पानी है। इंसान आज भले ही मंगल तक अपनी पहुंच बना चुका है, लेकिन जब बात समुद्री जीवन की आती है तो अभी बहुत जीवों का खोज होना बाकी है। समुद्र की गहराइयों में ऐसे-ऐसे जीव रहते हैं जिसके बारे में वैज्ञानिकों को ज्यादा जानकारी नहीं है। पानी की गहराईयों में जहां सूरज की रोशनी भी नहीं पहुंच पाती, वहां कई जीव फलफूल रहे हैं। हाल ही में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने एक व्हेलफिश को गहरे पानी में जिंदा देखा।

समुद्र की गहराइयों में दुर्लभ व्हेलफिश
व्हेल मछलियां अक्सर भीमकाय आकार की होती हैं और वह समुद्र की ऊपरी सतह पर ही पाई जाती हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक एक व्हेल मछली कभी पानी की गहराई में नहीं रहती क्योंकि सांस लेने के लिए उसे पानी को ऊपर आना पड़ता है। वैसे तो व्हेल की कई प्रजातियां पाई जाती हैं लेकिन गहरे पानी में देखी गई व्हेलफिश दुर्लभ है। ऐसी जगह जहां सूरज की रोशनी भी नहीं पहुंच पाती, वहां व्हेलफिश को जिंदा देख वैज्ञानिक भी हैरान हैं।

34 साल में सिर्फ 18 बार देखी गई
व्हेलफिश का एक वीडियो भी मोंटेरे बे एक्वेरियम रिसर्च इंस्टीट्यूट ने फेसबुक पर शेयर किया गया है जो काफी वायरल हो रहा है। इंस्टीट्यूट का कहना है कि 34 वर्षों में गहरे पानी में सिर्फ 18 बार इस मछली से आमना-सामना हुआ है। रिसर्च सेंटर ने वीडियो को ट्विटर पर भी शेयर किया है। कैप्शन में लिखा गया है, पिछले हफ्ते आरओवी डॉक्टर रिकेट्स के साथ एक व्हेलफिश देखी गई थी। इस व्हेलफिश से सामना 2,013 मीटर गहरे समुद्र में हुआ।

चमकीला नारंगी रंग देख यूजर्स हैरान
वीडियो में एक चमकीली नारंगी मछली को समुद्र की गहराइयों में तैरते हुए देखा जा सकता है। ट्विटर पर एक यूजर ने पूछा कि क्या वास्तव में इन व्हेलफिश का रंग चमकीला नारंगी होता है या रोशनी पड़ने की वजह से यह इतनी चमक रही है। यूजर को जवाब देते हुए MBARI ने लिखा कि ये मछली का वास्तविक रंग है। मोंटेरे बे एक्वेरियम रिसर्च इंस्टीट्यूट ने ट्वीट किया, 'व्हेलफिश को शायद ही कभी गहरे में जीवित देखा गया है, इन मछलियों के बारे में कई रहस्य आज भी बने हुए हैं।'

1895 पहली बार खोजी गई थी
रिसर्च सेंटर ने आगे कहा कि गहरे समुद्र में गोता लगाने के साथ हमरा सामना और अधिक रहस्यों से होता है। 2010 में स्मिथसोनियन ने बताया कि व्हेलफिश पहली बार 1895 में खोजा गया था। व्हेल जैसी बनावट होने की वजह से वैज्ञानिकों ने इसे व्हेलफिश का नाम दिया। हालांकि इस मछली के बारे में कहा जाता है कि इनका शरीर अपने पूरे जीवनकाल में नाटकीय रूप से बदलता है। इन्हें टेपेटेल और बिग्नोज मछली के नाम से भी जाना जाता है। वैज्ञानिक लंबे समय तक मानते रहे कि यह तीनों अलग-अलग प्राणी परिवार से संबंधित है।
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