तालिबान से डर, आईएसआईएस से खौफ, भारत पहुंचे सऊदी के विदेश मंत्री ने जताई बड़ी चिंता
सऊदी अरब कट्टरता को पीछे छोड़ रहा है और उसने देश में नई शिक्षा पद्धति लागू कर दी है। तालिबान के पिछले शासन को मान्यता देने वाला सऊदी अरब ने इस बार तालिबान से एक बार भी बात नहीं की है।
नई दिल्ली, सितंबर 20: अफगानिस्तान में तालिबान की अंतरिम सरकार बनने के बाद सऊदी अरब के विदेश मंत्री भारत पहुंचे हैं, जहां सऊदी सरकार ने भारत से बड़ी मदद मांगी है। रविवार को भारत दौरे पर पहुंचे सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ऐसे समय पर भारत के दौरे पर पहुंचे हैं, जब तालिबान अफगानिस्तान में सख्त शरिया कानून लागू कर चुका है और महिलाओं के तमाम अधिकार छीन लिए गये हैं। ऐसे में सऊदी अरब की तरफ से तालिबान को सख्त संदेश भी दिया गया है।

भारत दौरे पर सऊदी विदेश मंत्री
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने इंडिया टुडे के साथ एक विशेष इंटरव्यू में कहा कि, अफगानिस्तान में आतंकवादी समूहों अल-कायदा और आईएसआईएस और तालिबान की वापसी और पुनरुत्थान एक वास्तविक चिंता है। सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने कहा कि, ''अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद चिंता का विषय है। अभी के लिए, तालिबान ने प्रतिबद्धता जताई है कि अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए नहीं किया जाएगा।" प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने यह भी कहा कि, ''सऊदी अरब का अफगानिस्तान में नई तालिबान सरकार से कोई संपर्क नहीं है।'' उन्होंने कहा कि, ''उनका देश नए शासन को मान्यता देने से पहले दूसरे देशों के तरफ ही उसकी कार्रवाई को देखेगा और उसे तालिबान को मान्यता देने की कोई जल्दी नहीं है"। आपको बता दें कि, सऊदी अरब उन तीन देशों में शामिल है, जिन्होंने 1990 के दशक में तालिबान शासन को मान्यता दी थी। लेकिन, इस बार सऊदी अरब ने तालिबान से काफी दूरी बना रखी है।

तालिबान से क्या चाहता है सऊदी?
भारत दौर पर आए सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने कहा कि, "हम अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता का समावेश और तालिबान से शांति का आश्वासन चाहते हैं।'' सऊदी विदेश मंत्री ने कहा कि, ''भारतीय विदेश मंत्री से मुलाकात के दौरान भारत के साथ हमने अफगानिस्तान और तालिबान को लेकर चर्चा की है। और हमारी अफगानिस्तान को लेकर एक राय है''। रविवार को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने सऊदी समकक्ष प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद के साथ बातचीत की है।

भारत-सऊदी अरब संबंध
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने इंडिया टुडे को बताया कि उनका देश भारत में निवेश करने का इच्छुक है। उन्होंने कहा कि भारत और सऊदी अरब के बीच यात्रा और तीर्थयात्रा के लिए जल्द ही उड़ानें फिर से शुरू की जाएंगी। कोविड -19 महामारी के परिणामस्वरूप उड़ानें निलंबित कर दी गई थीं। वहीं, सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने कश्मीर मुद्दे पर भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि यह "भारत और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय मुद्दा" है उन्हें एक-दूसरे से बात करनी चाहिए और विवादों को सुलझाना चाहिए।" सऊदी अरब विदेश मंत्री का कश्मीर पर दिया गया ये बयान पाकिस्तान के लिए काफी बड़ा झटका है, क्योंकि पाकिस्तान चाहता है कि सऊदी अरब कश्मीर पर उसका पक्ष ले, लेकिन सऊदी अरब बार-बार कश्मीर पर बोलने से इनकार कर रहा है।

कट्टरपंथी शासन के खिलाफ सऊदी
आपको बता दें कि 1996 में जब अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनी थी, उस वक्त जिन तीन बड़े देशों ने तालिबान की सरकार को मान्यता दिया था, उनमें एक देश सऊदी अरब भी था। सऊदी अरब के साथ साथ पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने भी तलिबानी शासन को मान्यता दी थी। लेकिन, सऊदी अरब से आ रही रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बार सऊदी अरब तालिबान की शासन को जल्दबाजी में मान्यता नहीं देना चाहता है और वो वैश्विक समुदाय का रूख तालिबान को लेकर देख रहा है। सऊदी अरब के प्रिंस सलमान ने देश में कट्टरपंथी विचारधारा को खत्म करने के लिए 'मिशन 2030' चलाया हुआ है, जिसमें उन्होंने सऊदी अरब की शिक्षा प्रणाली में ऐतिहासिक परिवर्तन कर दिए हैं और पाठ्यक्रम में अलग अलग धर्मों के बारे में भी पढ़ाया जा रहा है, जिसमें गीता और रामायण की शिक्षा भी शामिल है। सऊदी में इंग्लिश सीखना अनिवार्य कर दिया गया है, वहीं अलग अलग लेवल पर छात्रों को अलग अलग देशों की संस्कृति के बारे में सिखाया जा रहा है।
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