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सऊदी अरब और ईरान: क्या क़रीब आ रहे हैं खाड़ी के दो प्रतिद्वंद्वी?

ईरान सऊदी संबंध
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ईरान सऊदी संबंध

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद-बिन-सलमान खाड़ी देशों के दौरे पर आर्थिक, पर्यावरण और सांस्कृतिक सहयोग पर समझौतों सहित ईरान, यमन और लेबनान में हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ राजनीतिक स्टैंड बनाने की कोशिश कर रहे हैं. ताकि पश्चिमी देशों के साथ ईरान के परमाणु समझौते की बहाली में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम पर भी प्रतिबंध लग सकें.

ओमान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और क़तर के बाद प्रिंस मोहम्मद-बिन-सलमान (एमबीएस) बहरीन और कुवैत का भी दौरा करेंगे. यूएई में, जहां उन्होंने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद-बिन-ज़ायद (एमबीज़ेड) से मुलाक़ात की, वहीं उन्होंने यूएई के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और क्राउन प्रिंस के भाई शेख़ तहनून-बिन-ज़ायद-अल-नाहयान से भी मुलाक़ात की.

शेख़ तहनून-बिन-ज़ायद-अल-नाहयान इस सप्ताह की शुरुआत में अपने ईरानी समकक्ष और देश के कट्टरपंथी राष्ट्रपति इब्राहिम रइसी से मिल कर तेहरान लौटे हैं.

यूएई के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का दौरा इस समय काफ़ी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यूएई लंबे समय से ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए एक प्रमुख क्षेत्रीय ख़तरे के रूप में देखता रहा है.

अबू धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायद के भाई शेख़ तहनून ने कहा कि दोनों देशों को अपने विवादों को बातचीत के ज़रिए सुलझाना चाहिए न कि सैन्य बल के ज़रिए.

सऊदी क्राउन प्रिंस ने अब तक जिन खाड़ी अरब देशों का दौरा किया है, वहां की संयुक्त घोषणाओं में ईरान के परमाणु समझौते की बहाली की स्थिति में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को भी शामिल करने का उल्लेख किया गया है.

सऊदी अरब और ईरान: एक दूसरे के धुर-विरोधी में बातचीत की शुरुआत क्यों

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ओमान में निवेश समझौता

सऊदी अरब और ओमान की राजधानी मस्कट से जारी होने वाले हालिया बयान में ईरान के साथ सहयोग करने के महत्व और ईरान के परमाणु और मिसाइल मुद्दों से गंभीरता और प्रभावी ढंग से निपटने पर ज़ोर दिया गया है.

हालांकि, बयान में यह भी कहा गया है कि इन मुद्दों को इस तरह से निपटाया जाना चाहिए जो क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता में मददगार साबित हो, जो अच्छे पड़ोसी और संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों के सिद्धांतों पर खरे उतरते हों और क्षेत्र को हर तरह की अस्थिरता से बचाते हों.

ओमान और सऊदी अरब का संयुक्त बयान एक ऐसे माहौल में आया है जब क्षेत्र में सऊदी अरब के मुख्य प्रतिद्वंद्वी, ईरान और विश्व शक्तियों के बीच परमाणु समझौते को बचाने के लिए, अहम बातचीत शुरू हो चुकी है, और वह इस महीने होने वाले खाड़ी शिखर सम्मेलन में सभी सदस्यों के शामिल होने को सुनिश्चित करना चाहते हैं.

प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान सोमवार को पड़ोसी खाड़ी अरब राज्यों के दौरे पर रवाना हुए थे. सऊदी सरकारी समाचार एजेंसी एसपीए के अनुसार, क्राउन प्रिंस ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, क़तर और कुवैत का दौरा करेंगे. ओमान का दौरा उनके इस क्षेत्रीय सहयोग दौरे का पहला चरण है.

सऊदी ईरान संबंध
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तनाव के बाद क़तर का पहला दौरा

इसके अलावा, सऊदी क्राउन प्रिंस, जो वर्तमान में सऊदी किंग सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ के ख़राब स्वास्थ्य के कारण राज्य के कार्यवाहक प्रमुख हैं, क़तर की राजधानी दोहा का भी दौरा कर रहे हैं. रियाद और उसके अरब सहयोगियों की तरफ़ से साल 2017 के मध्य में दोहा पर प्रतिबंध लगाये जाने के बाद से क्राउन प्रिंस की क़तर की यह पहली यात्रा होगी. क़तर के साथ संबंधों में सुधार पिछली जनवरी में हुआ था.

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन ने जून 2017 में क़तर पर कट्टरपंथी इस्लामी समूहों का समर्थन करने और रियाद के प्रतिद्वंद्वी तेहरान के बहुत क़रीब होने का आरोप लगाते हुए नाकाबंदी शुरू की थी. दोहा ने इन आरोपों का सख्ती के साथ खंडन किया था.

सऊदी अरब के एक समाचार पत्र, अल-अरबिया ने कहा कि खाड़ी अरब के नेताओं का शिखर सम्मेलन दिसंबर के मध्य में सऊदी राजधानी रियाद में आयोजित किया जाएगा, जिसमें प्रिंस मोहम्मद बिन अब्दुल अज़ीज़ खाड़ी देशों के क्षेत्रीय सहयोग की परिषद के सभी सदस्य देशों के शामिल होने को सुनिश्चित बनाना चाहते हैं. ताकि पूरी दुनिया में और ख़ास तौर से ईरान और तुर्की तक क्षेत्र में सऊदी वर्चस्व का संदेश जाए.

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तुर्की और ईरान के साथ तनाव

क्राउन प्रिंस का ये दौरा क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने का हल, ख़ास तौर से ईरान और तुर्की के साथ एक पृष्ठभूमि में आया है. हाल के हफ्तों में सऊदी अरब और ईरान के रिश्तों के बीच की बर्फ पिघलने के संकेत नज़र आ रहे हैं. इससे पहले, तेहरान और रियाद ने संबंधों में सुधार लाने के उद्देश्य से अप्रैल से कई दौर की बातचीत की है.

सऊदी के नेतृत्व वाली गल्फ़ अरब कौंसिल का गठन ईरान से मुक़ाबला करने के लिए किया गया था, लेकिन क्या इसकी बहाली अब ईरान के ख़िलाफ़ होगी या बदलती दुनिया में सहयोग करने का एक नया तरीक़ा होगा?

इसी बीच, तुर्की ने संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब सहित खाड़ी में अपने पूर्व प्रतिद्वंद्वियों के साथ संबंध बहाल करने की मांग की है.

साल 2018 में इस्तांबुल के दूतावास में सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के बाद अंकारा और रियाद के बीच तनाव बढ़ गया था. क़तर और सऊदी अरब के बीच तनाव के दौरान तुर्की क़तर के समर्थक के रूप में उभरा था.

प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का वर्तमान दौरा तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की मंगलवार को दोहा यात्रा के तुरंत बाद शुरू हो रहा है. हालांकि, क़तर के विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों दौरे इस तरह आगे पीछे होना महज़ एक संयोग है.

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने क्षेत्रीय तनाव पर क़ाबू पाने के लिए अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी ईरान के साथ संबंध बेहतर करने के लिए तीसरे पक्ष और प्रत्यक्ष रूप से अब तक जो भी बात की है, वो वॉशिंगटन और तेहरान के बीच परमाणु समझौते को बचाने की कोशिश के लिए हुई है.

पिछले सप्ताह वियना में नए दौर की वार्ता में, पश्चिमी शक्तियों ने साल 2015 के समझौते को बचाने के लिए ईरान की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाया, जिस पर खाड़ी देशों की आपत्ति है कि ईरान के साथ इस परमाणु समझौते में तेहरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्र में इसके समर्थक प्रॉक्सी नेटवर्क के मामले को शामिल नहीं किया गया है.

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ईरान और खाड़ी देश

अमेरिकी पत्रिका द अटलांटिक में हाल ही में प्रकाशित हुए एक लेख में, एक मशहूर पत्रकार, किम गटास ने रियाद-तेहरान संबंधों की प्रकृति पर अमेरिका में पूर्व सऊदी राजदूत और सऊदी इंटेलिजेंस के पूर्व प्रमुख, तुर्की बिन फ़ैसल से बात की. तुर्की ने उन्हें बताया, 'ईरानी हमें गर्दन से पकड़े हुए हैं."

प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल के अनुसार, सऊदी अरब को कड़े प्रतिबंधों के शिकार, विरोधी के सामने ख़ुद को सुरक्षित महसूस करना चाहिए, एक ऐसा विरोधी जिसकी अर्थव्यवस्था सऊदी अर्थव्यवस्था की एक तिहाई से भी कम है, जिसका सैन्य बजट राज्य के एक चौथाई से भी कम है और जिसका तेल उत्पादन बहुत ही कम है.

किम गटास उनके हवाले से आगे कहती हैं कि "सऊदी अरब में एक सुन्नी अरब साम्राज्य है जबकि ईरान में एक शिया फ़ारसी मुल्लाइयत है. ऐसे में तो सऊदी अरब को बहुत ही आश्वस्त होना चाहिए था. लेकिन इसके बावजूद सऊदी अरब ख़ुद को असुरक्षित महसूस करता है."

तुर्की बिन फ़ैसल के अनुसार, ईरानी अधिकारियों को वर्षों से गर्व है कि वे बेरूत, दमिश्क, सना और बग़दाद चार अरब राजधानियों को नियंत्रित करते हैं. इन सभी देशों में, तेहरान के पास मिलिशिया का एक नेटवर्क है, जिसके ज़रिये यह क्षेत्र में शक्तिशाली है, स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर रहा है, और एक 'आग का घेरा' बनाया हुआ है, जिसने मुख्य रूप से सऊदी अरब को घेरा हुआ है.

वो किम गटास से कहते हैं कि जंग के बारे में ईरान का सस्ता और अपरंपरागत जंग का तरीक़ा उसे अपने अमीर खाड़ी पड़ोसियों की बेहतर हथियारों से लैस, लेकिन कम अनुभवी पारंपरिक सेना पर चनौती देता है. इसमें तेज़ी से आगे बढ़ रहे परमाणु कार्यक्रम को शामिल करें, तो ईरान और भी मज़बूत होगा.

तुर्की बिन फ़ैसल के अनुसार, हालांकि, मध्य पूर्व में हाल ही में अदृश्य लेकिन गंभीर परिवर्तन भी हो रहे हैं, जो ईरान में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहे हैं. उनके विचार में, यही मुख्य कारण है कि ईरान अधिक आश्वस्त दिखाई दे रहा है और परमाणु समझौते पर नई वार्ता के प्रति उसका रवैया ग़ैर-लचकदार दिखाई दे रहा है.

ईरान
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ईरान

विश्लेषक को उम्मीद नहीं है कि क्षेत्र में हालात बेहतर होंगे

क्या ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंधों में सुधार की कोई उम्मीद है या मौजूदा कूटनीतिक गतिविधि इतनी भी गर्म नहीं है कि बर्फ़ पिघल सके? इस मुद्दे को समझने के लिए, हमने क्षेत्र के मुद्दों को समझने वाले चार विश्लेषकों से कुछ सवाल पूछे, जो नीचे जवाब के साथ पेश किये जा रहे हैं.

सऊदी मामलों पर गहरी नज़र रखने वाले कनाडा में रह रहे पत्रकार, सैयद राशिद हुसैन.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रेटिजिक स्टडीज़ इस्लामाबाद की पूर्व शोधकर्ता, फ़ातिमा रज़ा.

सऊदी अरब के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक, ख़ालिद-अल-मुइना और

अमेरिका के कैटो इंस्टीट्यूट, से जुडी वैश्विक मामलों की विश्लेषक, सहर ख़ान.

सऊदी क्राउन प्रिंस खाड़ी देशों के दौरे पर हैं. क्या यह सऊदी विदेश नीति में बदलाव है कि क्राउन प्रिंस क्षेत्रीय देशों का दौरा कर रहे हैं?

राशिद हुसैन: जी हाँ. विभिन्न भू-राजनीतिक हालात में बदलाव के ज़रिये यह उनकी निर्धारित विदेश नीति में बदलाव का संकेत देता है. अमेरिका के दबाव में उन्हें क़तर के प्रति अपना रवैया बदलना पड़ा. उन्होंने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन ज़ायद (एमबीज़ेड) के साथ यमन सहित कई मुद्दों पर मतभेद पैदा कर लिए थे.

दोनों देशों के सामरिक हितों में काफ़ी अंतर थे. इसके बावजूद उन्हें पीछे हटना पड़ा. खाड़ी देशों के संगठन के सबसे बड़े देश सऊदी अरब के व्यावहारिक तौर पर वास्तविक शासक की संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों की वर्तमान यात्रा उनकी सामरिक मजबूरियों को दर्शाती है.

इसराइल के साथ खाड़ी अरब देशों की बढ़ती दोस्ती इसी का प्रतिबिंब है. यूएई इसे खुले तौर पर और तेज़ी से कर रहा है जबकि रियाद अभी भी इसे गुप्त रूप से जारी रखना पसंद कर रहा है. स्पष्ट कारणों के आधार पर. सच कहा जाए तो अरब की सड़कें अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं. मध्य-पूर्व से अमेरिका की लगातार वापसी के बाद, तेल की दौलत से मालामाल खाड़ी अरब राज्य सुरक्षा की तलाश में हैं, ये सुरक्षा उन्हें इसरायल मुहैया कर सकता है.

फ़ातिमा रज़ा: यह एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करता है, जो बुनियादी तौर पर मध्य-पूर्व की क्षेत्रीय राजनीति में शामिल रहने के लिए अमेरिका के झुकाव में कमी की वजह से हुई है.

इस क्षेत्र में अमेरिका की दिलचस्पी में कमी सऊदी के लिए चिंता का विषय है क्योंकि यह क्षेत्र के मौजूदा सुरक्षा माहौल को अस्थिर कर सकता है. हूती के प्रभाव को कम करने के सभी सऊदी प्रयास कमोबेश बेअसर रहे हैं, इसलिए क्राउन प्रिंस का छह देशों का दौरा आतंक के ख़िलाफ़ जंग या शांति क़ायम करने के लिए समर्थन हासिल करने का एक प्रयास है.

ख़ालिद-अल-मुइना: सऊदी सरकार क्षेत्र में तनाव नहीं चाहती है. उन्होंने (प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने) बार-बार कहा है कि ग़ैर-हस्तक्षेप और छद्म युद्ध से कोई फ़ायदा नहीं होगा, बल्कि इससे अस्थिरता पैदा होगी.

सहर ख़ान: हम सभी को इस बात का अंदाज़ा है कि यूएई और सऊदी अरब के बीच दोस्ती है, ख़ास तौर से ईरान के प्रभाव का काउंटर करने की रणनीति के मामले में.

हम यह भी जानते हैं कि ईरान और सऊदी अरब एक-दूसरे के ख़िलाफ़ छद्म युद्ध में लगे हुए हैं, दोनों एक-दूसरे का काउंटर करना चाहते हैं और दोनों चाहते हैं कि अमेरिका की नीति एक-दूसरे की ओर न बदले.

यूएई के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने हाल ही में तेहरान का दौरा किया था. क्या संयुक्त अरब अमीरात की नीति में सऊदी अरब के साथ उसका कोई समन्वय हो सकता है?

राशिद हुसैन: ईरान के संबंध में, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब दोनों को अहसास है कि व्हाइट हाउस में बदलाव के साथ, वे अपनी पुरानी, मज़बूत ईरान विरोधी नीतियों को जारी नहीं रख सकते हैं.

इसलिए, रियाद और सऊदी अरब दोनों ने महसूस किया है कि उन्हें तेहरान के साथ अपने संबंध सुधारने की ज़रुरत है. फिर भी, यह कहना उचित है कि यूएई ने हमेशा ईरान के साथ किसी न किसी तरह के संबंध बनाए रखे हैं. कड़े अमेरिकी प्रतिबंधों के दिनों में भी दोनों के बीच व्यापारिक संबंध बने रहे.

दुबई ने लगभग दुनिया और ईरान के बीच एक कड़ी की भूमिका निभाई है. ख़ास तौर से व्यापार और वाणिज्य के क्षेत्र में. दोनों के बीच एक दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था. सऊदी अरब का मामला अलग था. रियाद ने कई कारणों से तेहरान के ख़िलाफ़ कड़ा रुख अपनाया.

इसकी रूढ़िवादी स्टेब्लिशमेंट ने हमेशा इस क्षेत्र में "शिया क्रिसेंट" (ईरान, इराक, सीरिया और लेबनान का एक संभावित गठबंधन) के उभरने की आशंका जताई है. यह सऊदी परिवार के लिए ख़तरा था. इस तरह उसने सुरक्षा के लिए अमेरिका की ओर देखा. ख़ास तौर से ईरान के ख़िलाफ़ और तमाम मतभेदों के बावजूद अगर रियाद की नज़र में पाकिस्तान अब भी पसंदीदा देश है तो इसका मुख्य कारण उसकी सैन्य क्षमता है.

फ़ातिमा रज़ा: दोनों के बीच कुछ हद तक सामंजस्य का संकेत मिल रहा है क्योंकि बहुत से लोग एमबीएस की संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की यात्रा को यूएई और सऊदी अरब के बीच तनावपूर्ण संबंधों को सुधारने के प्रयास के रूप में देखते हैं.

हालांकि, दो घटनाक्रमों के बीच बुनियादी सच यह है कि इस क्षेत्र के बारे में अमेरिका की नीति के बदलने के नतीजे में मध्य पूर्व के अंदर सुरक्षा कारक नाटकीय रूप से बदल रहे हैं.

ख़ालिद-अल-मुइना: दुर्भाग्य से, ईरान की तरफ़ से युद्ध की आवाज़ें आ रही हैं. वहां के कट्टरपंथी समूह नई भू-राजनीतिक स्थिति से बेख़बर हैं. सऊदी क्राउन प्रिंस ने कहा था कि उनकी पहली प्राथमिकता सऊदी अरब को विकसित करना और उसके जीवन स्तर को ऊपर उठाना है, इस क्षेत्र को तनाव मुक्त रखने के लिए हर संभव प्रयास करना है. हूती विद्रोहियों को भी इसका एहसास होना चाहिए और देश पर हमला करना बंद कर देना चाहिए.

सहर ख़ान: अभी ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संबंधों में जो बदलाव नज़र आ रहा है वास्तव में ये अमेरिका के लिए अधिक प्रासंगिक है. अमेरिका चाहता है कि इस क्षेत्र के देश यूएई को एक मध्यस्थ के रूप में देखें. इसलिए, अमेरिका चाहता है कि यूएई के सऊदी अरब के साथ अच्छे संबंध हों, लेकिन वह यह भी चाहता है कि यूएई के ईरान के साथ भी बेहतर संबंध हों.

ईरान और सऊदी अरब के प्रतिनिधियों की अलग-अलग जगहों पर मुलाक़ातें होती रही हैं. क्या निकट भविष्य में ईरानी राष्ट्रपति रईसी और सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच सीधी बातचीत हो सकती है?

राशिद हुसैन: ईरानी और सऊदी प्रतिनिधियों के बीच चल रही बैठकें एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम हैं. यह कुछ ऐसा था जिसके बारे में कभी सोचा ही नहीं था. इसके कई कारण रहे हैं. अब उन्हें सख्ती से महसूस किया जा रहा है.

इस क्षेत्र से अमेरिका की धीमी वापसी एक प्रमुख कारक है. रियाद को पता है कि उसे अपने ख़तरे की भावना को कम करने की जरूरत है. इसलिए, तेहरान के साथ संबंधों में सुधार की संभावना बढ़ रही है. दोनों नेताओं के बीच बैठक काफ़ी हद तक चल रही बातचीत पर निर्भर है.

लेकिन फ़िलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता है. दोनों को अपनी दुश्मनी को ख़त्म करने और सहज संबंध बनाने की ज़रूरत है, जैसा कि सऊदी अरब के दिवंगत बादशाह अब्दुल्लाह और ईरान के दिवंगत राष्ट्रपति रफ़संजानी के बीच संबंध बने थे.

फ़ातिमा रज़ा: जी हाँ, दोनों पक्षों के बीच इराक़ी सुविधा के साथ चार दौर की बातचीत हो चुकी है. हालांकि यह इस अशांत क्षेत्र के लिए एक स्वागत योग्य घटनाक्रम है, लेकिन दोनों देशों के नेताओं के बीच सीधी मुलाक़ात की संभावना बहुत कम है.

ख़ालिद अल-मुइना: अगर ईरान हस्तक्षेप न करने पर सहमति ज़ाहिर करता है, तो खाड़ी राज्य उनके साथ बातचीत कर सकते हैं.

सहर ख़ान: मुझे लगता है कि इस समय हम जो समन्वय देख रहे हैं, वह शायद इसलिए है कि चुनाव के बाद ईरान में जो नया प्रशासन सत्ता में आया है, उसे कट्टरपंथी माना जा रहा है, इसलिए सऊदी अरब यह देखना चाह रहा है कि नया प्रशासन परमाणु समझौते को फिर से शुरू करने में किस तरह का लचीलापन दिखाएगा.

ऐसा प्रतीत होता है कि सऊदी क्राउन प्रिंस हिज़्बुल्लाह, हूती या बशर-अल-असद जैसे क्षेत्र में ईरान के सहयोगियों के प्रति अपने नज़रिये में कोई लचीलापन नहीं दिखा रहे हैं. ऐसे में रियाद और तेहरान के बीच संबंध कैसे सामान्य हो पाएंगे?

राशिद हुसैन: मुझे लगता है कि दोनों वार्ता की मेज़ पर बैठने से पहले अपनी-अपनी ताक़त को मज़बूत करने की कोशिश कर रहे हैं. तेहरान चल रही बातचीत में अपने फ़ायदे के लिए हूती और हिज़्बुल्लाह का इस्तेमाल कर रहा है. ईरान के साथ बातचीत के बावजूद, सऊदी अरब ने इस क्षेत्र में ईरान के सहयोगियों के ख़िलाफ़ एक मज़बूत और सख़्त रुख अपनाया हुआ है, बुनियादी तौर पर दोनों ताक़त की पोज़िशन से वार्ता करने के लिए हैं.

फ़ातिमा रज़ा: हां, दोनों पक्षों की तरफ़ से कुछ मुद्दों पर कोई लचीलापन नहीं है और दोनों के बीच संबंध सामान्य होने में काफ़ी समय लगेगा (अगर ऐसा होता है).

ख़ालिद अल-मुइना: ईरान और खाड़ी के बीच किसी भी संबंध के लिए, ईरान को अपने तरीक़ों को सुधारने के लिए एक ईमानदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और एक अच्छे पड़ोसी का अंदाज़ अपनाना चाहिए.

सहर ख़ान: यह सच है कि सऊदी अरब का हिज़्बुल्लाह, हूती और बशर-अल-असद, यानी ईरान के सहयोगी संगठनों और ताक़तों के प्रति एक गैर-लचीला रवैया है. मुझे नहीं लगता कि सऊदी अरब की इस नीति में कोई बदलाव आएगा. चाहे परमाणु समझौते की बहाली हो या ईरान का नया प्रशासन किसी नए समझौते के लिए भी तैयार हो जाये, सऊदी अरब इन ईरानी समर्थकों के प्रति अपना रवैया नहीं बदलेगा. चाहे यूएई भी दोनों के बीच मध्यस्थ के तौर पर कितनी भी कोशिश कर ले.

क्या सऊदी-ईरानी संबंधों में सुधार ईरान के परमाणु समझौते (जेसीओपीए) पर अमेरिकी नीति से सीधे जुड़ा हुआ है या ये दोनों चीजें अलग-अलग अपनी दिशाएँ ख़ुद निर्धारित कर रही हैं?

राशिद हुसैन: हां, इसका सीधा संबंध है. अमेरिका के इस क्षेत्र से वापसी के साथ, सउदी अब तेहरान के साथ अपने संबंधों को सुधारने की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं.

फ़ातिमा राजा: ट्रंप के बाद और अब बाइडन के अधीन अमेरिकी विदेश नीति में सभी बदलावों के साथ इसका अधिक संबंध है, जो अब मध्य पूर्व को तवज्जो का बुनियादी केंद्र नहीं समझते हैं. शायद इसलिए कि अब दोनों क्षेत्रीय खिलाड़ी (ईरान और सऊदी अरब) दूसरे देशों के साथ मिलकर अपनी सिक्योरिटी और स्ट्रेटिजिक ऑप्रेटस ख़ुद संभालना चाहते हैं.

सऊदी अरब इस बात से सावधान हो सकता है कि अमेरिका किस तरह से जेसीपीओए को बहाल करने पर तुला हुआ है और एक बार फिर से रणनीतिक संतुलन को ईरान की तरफ़ कर सकता है. इस लिए वो बढ़ते हुए ईरानी प्रभाव को या कम से कम ईरान को स्थिर होने से रोक रहे हैं, क्योंकि उन्हें एक मज़बूत ईरान से निपटना पड़ेगा. इसके बाद, निश्चित रूप से, अमेरिका के समर्थन के लिए बाहर देखने के बजाय क्षेत्र के भीतर तनाव को ठीक करना अधिक उपयुक्त होगा, लेकिन शायद तनाव फिर भी कम न हो.

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