रूस-यूक्रेन युद्ध को 12 महीने पूरे, पुतिन के 'विशेष सैन्य अभियान' पर क्या कहते हैं रूसी नागरिक

रूस
AFP
रूस

  • 24 फ़रवरी 2022 को व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ विशेष सैन्य अभियान की घोषणा की.
  • इस युद्ध को आज एक साल पूरा हो रहा है.
  • युद्ध के एक साल पूरे होने के एक दिन पहले फरवरी 23 को संयुक्त राष्ट्र आम सभा में रूस के ख़िलाफ़ प्रस्ताव लाया गया. इसमें मांग की गई कि रूस जल्द से जल्द यूक्रेन से बाहर निकले. प्रस्ताव के पक्ष में 141 वोट पड़े, इसके विरोध में 7 वोट पड़ें. भारत और चीन समेत 32 देशों में इस प्रस्ताव पर वोटिंग नहीं की.
  • शुक्रवार यानी 24 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन वर्चुअल कॉन्फ्रेसिंग के ज़रिए जी7 देशों के नेताओं से मुलाक़ात करने वाले हैं. इस दौरान यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेन्स्की भी मौजूद होंगे. व्हाइट हाउस का कहना है कि इस दौरान रूस के ख़िलाफ़ और प्रतिबंध लगाए जाने की उम्मीद है.
  • युद्ध को एक साल पूरे होने के क़रीब दो दिन पहले चीनी के विदेश मंत्रालय के आला नेता वांग यी मॉस्को पहुंचे और रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मुलाक़ात की. उन्होंने शांति वार्ता पर ज़ोर दिया और कहा जो देश यूक्रेन को हथियार दे रहे हैं वो शांति तक पहुंचने के रास्ते को और कठिन बना रहे हैं.
  • समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार अमेरिका ने कहा है कि चीन रूस को हथियारों की सप्लाई करने के बारे में विचार कर रहा है. उसका कहना है कि इससे युद्ध के और बढ़ने की आशंका है जिसमें एक तरफ रूस और चीन होंगे तो दूसरी तरफ यूक्रेन और अमेरिका के नेतृत्व नवाले सैन्य गठबंधन नैटो के सहयोगी देश.
  • रूस यूक्रेन के नेटो में शामिल होने का विरोध करता है. उसका कहना है कि ऐसा हुआ तो नेटो के नेतृत्व वाले देशों के सैन्य ठिकाने उसकी सरहदों के पास पहुंच जाएंगे.
  • रूसी हमले का पश्चिमी मुल्कों ने जमकर विरोध किया और रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं.
  • रूस से यूक्रेन के पूर्वी और दक्षिणी हिस्से से शुरुआत की और लुहांस्क, दोनेत्स्क के कई इलाक़ों पर कब्ज़ा कर लिया. उसने इन्हें रूस का हिस्सा घोषित कर दिया.
  • संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी के अनुसार, युद्ध के कारण अब तक1.86 करोड़ लोग यूक्रेन छोड़ कर जा चुके हैं. देश छोड़ने वालों में अधिकांश महिलाएं और बच्चे हैं. 18 साल से 60 की उम्र के लोगों को यूक्रेनी सरकार ने देश में रहकर युद्ध करने को कहा है.
  • फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा जैसे कई मुल्क साफ़ तौर पर यूक्रेन की मदद के लिए आगे आए और उसे ज़रूरी हथियार दे रहे हैं. वहीं बेलारूस ने स्पष्ट तौर पर रूस का साथ देने की बात की.
  • भारत रूस के मुद्दे पर तटस्थ रहा है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि ये युद्ध का दौर नहीं है और दोनों को बातचीत के ज़रिए मुद्दे को हल करना चाहिए.

रूसी हमले से पहले के हफ़्तों में मैं सेंट्रल मॉस्को डिस्ट्रिक्ट ज़मोस्कवोरेचिये में घंटों घूमा करता था. सात साल से मैं यहीं रह रहा था और बीबीसी ऑफ़िस में काम करता था.

ये शहर का सबसे शांत इलाक़ा है. मेरे लिए ये जगह रूस के जटिल वर्तमान और अतीत को अपने में समेटे हुए है.

सदियों से मॉस्को में रहने वाले यहां घर बनाने और बिज़नेस करने का काम करते रहे हैं और शांति से अपनी ज़िंदगी में मशगूल रहे हैं. उन्होंने अपने शासकों को देश का बड़ा मंच संभालने और अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए अकेला छोड़ दिया है. इस बड़े मंच पर अब एक आम रूसी नागरिक के करने के लिए कुछ नहीं था.

इस इलाक़े के एक तरफ़ मोस्कवा नदी और क्रेमलिन है और दूसरी तरफ़ स्टालिन के युग के अपार्टमेंट. शोरगुल भरे यहां के सादोवोये रिंग रोड पर 21वीं सदी में बनी गगनचुंबी इमारतें हैं.

यहां की पतली-पतली सड़कों का जाल रूस के अतीत की याद दिलाता है, जहां जगह-जगह 19वीं सदी के चर्च और आलीशान बंगले बने हुए हैं.

बोलशाया ओर्डिंका सड़क का नाम तातार मंगोल शासन के नाम पर पड़ा है, जहां सौ साल पहले उसके दूत, मॉस्को के शाही घरानों से धन इकट्ठा करने आते थे.

Short presentational grey line
BBC
Short presentational grey line

पिछली फ़रवरी में मैं वहीं था जब मेरे पास एक दोस्त का फ़ोन आया. यह दोस्त यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर ख़ारकीएव में पैदा हुआ था और अब मॉस्को में काम करता था.

उसने पूछा कि पुतिन क्या वाक़ई यूक्रेन के साथ युद्ध शुरू करने जा रहे हैं? हम दोनों ही इस ख़बर पर भरोसा नहीं करना चाहते थे.

लेकिन रूस के आक्रामक अतीत को देखते हुए, मैंने ये महसूस किया कि युद्ध अब अपरिहार्य था.

रूस
Getty Images
रूस

युद्ध शुरू होने के बाद से लाखों रूसी लोग रूस छोड़ चुके हैं. उनमें मैं और बीबीसी रूसी सेवा के मेरे कई सहयोगी भी शामिल हैं.

लेकिन अधिकांश लोग जो रूस में रुक गए, उनके लिए रूस के बाहर की ज़िंदगी वैसी ही है जैसी हमेशा हुआ करती थी, ख़ासकर बड़े शहरों में.

ज़मोस्कवोरेचिये में अधिकांश दुकानें, कैफ़े, व्यवसाय और बैंक खुले हुए हैं. अधिकांश पत्रकार और आईटी विशेषज्ञ यहां से चले गए हैं लेकिन उनकी जगह बाकी लोगों ने भर दी है.

दुकानदार बढ़ती महंगाई की शिकायत करते हैं लेकिन यहां दुक़ानों में इम्पोर्टेड सामानों की जगह स्थानीय उत्पादों ने ले ली है.

क़िताब की दुकानों पर हर तरह की क़िताबें उपलब्ध है हालांकि जिन क़िताबों को काम का नहीं समझा जाता है उन्हें प्लास्टिक कवर में बेचा जाता है.

दुकानें
BBC
दुकानें

यहां की लोकप्रिय कार शेयरिंग सर्विस अभी भी चल रही है लेकिन अब इनके बेड़े में अब चीन में बने कारों की संख्या बढ़ गई है.

संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका समेत कई मुल्कों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं. लेकिन इन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद रूस 1990 के दशक की आर्थिक बदहाली जैसी हालत में नहीं पहुंचा है.

हालांकि बेलफ़ास्ट के रूसी अकादमिक अलेक्जेंडर टिटोव का कहना है, "बावजूद इसके इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रूस संकट से होकर गुजर रहा है."

Short presentational grey line
BBC
Short presentational grey line

रूस का ये मौजूदा संकट धीरे-धीरे बढ़ने वाला है. थोड़ा बारीकी से देखें तो इसके संकेत हर जगह मौजूद दिखते हैं.

यूक्रेन की सीमा के पास और युद्ध से तहस-नहस ख़ारकीएव से महज़ 80 किलोमीटर दूर बेलगोरोद में लोग मोर्चे पर लगातार जा रहे मिलिटरी ट्रकों के काफ़िले के आदी हो गए हैं.

अगर वे उस शहर पर रूसी बमबारी से बेचैन होते हैं जहां उनके दोस्त और रिश्तेदार रहते हैं तो भी वो इसे ज़ाहिर न करने की कोशिश करते हैं.

यूक्रेन
SERGEY BOBOK/AFP
यूक्रेन

मेरे एक दोस्त ने मुझे बताया कि स्थानीय गवर्नर की ओर से आयोजित स्ट्रीट फ़ेस्टिवल में अच्छे खासे लोग आते हैं.

लेकिन साथ ही ये ख़बर भी है कि यहां से स्थानीय डॉक्टर बड़े पैमाने पर अपनी नौकरियां छोड़ रहे हैं. इसका कारण ये है कि स्थानीय अस्पतालों में युद्ध से बड़ी संख्या में घायलों को संभालने के लिए उनके पास पूरी तैयारी नहीं हैं.

यहां के निवासी खुद को छोड़ दिया गया महसूस करते हैं. सीमा के पास स्थित कस्बे शेबेकिनो के लोग ग़ुस्से में हैं. यहां सीमा के दोनों तरफ़ से बमबारी होना रोज़ाना की बात हो गई है.

एक स्थानीय परिवार सेंट पीटर्सबर्ग गया था. वो परिवार ये देखकर हैरान रह गया कि सेंट पीटर्सबर्ग में कुछ भी नहीं बदला है जबकि उनके क़स्बे के लोगों की ज़िंदगी पूरी तरह से पलट गई है.

मुझे बताया गया कि एस्टोनिया और लात्विया की सीमा के पास पस्कोव में माहौल 'सामान्य' बना हुआ है. यहां हर कोई ऐसा जताता है कि जैसे युद्ध के कारण उनकी ज़िंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ा हो.

पोस्कोव 76वां गार्ड्स एयर असॉल्ट डिवीज़न का मुख्य ठिकाना है. इसी कुख्यात डिवीज़न के जवानों पर कीएव के बाहर बूचा में युद्धापराध करने के आरोप हैं.

शहर से स्थानीय कब्रिस्तान के लिए एक नई बस सेवा शुरू की गई है जहां यूक्रेन में बड़ी संख्या में मारे गए सैनिकों को दफ़नाया जा रहा है. ये एक ब्रिज के नीचे है जहां किसी ने लाल रंग से 'PEACE' लिख दिया है.

विबूती गांव का कब्रिस्तान
BBC
विबूती गांव का कब्रिस्तान

मेरे एक एक दोस्त फ़िनलैंड की सीमा के पास स्थित पेत्रोज़ावोदस्क जा रही ट्रेन में सवार थे. ट्रेन में कुछ किशोर गेम खेल रहे थे.

इनमें किसी ने पूछा कि दोनेत्स्क रूस में है या यूक्रेन में? इनमें से किसी को इसका पता नहीं था, जबकि इस जगह पर उनकी ही सरकार ने कब्ज़ा कर लिया है.

मेरे दोस्त ने बताया कि ऐसा नहीं लगा कि युद्ध से इन लोगों को कोई मतलब भी है.

उन्होंने बताया कि ऐसा लगता है कि पेत्रोज़ावोदस्क अपने उजाड़ वाले दिनों में लौट चुका है. यहां दुकानें खाली हैं, दुक़ानों में कोई विदेशी ब्रांड नहीं है और सामान की क़ीमतें आसमान छू रही हैं.

Short presentational grey line
BBC
Short presentational grey line

क्या रूसी नागरिक यूक्रेन में हो रही बर्बरता का समर्थन करते हैं या वे ज़िंदा बचे रहने के लिए बस दिखावा कर रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा?

ऊपरी माहौल देखकर अंदाज़ा लगाना और लोगों से बातचीत कर के किसी भी स्पष्ट नतीजे पर पहुंचना कठिन है. समाजविज्ञानी और रायशुमारी करने वालों ने लोगों के मन की थाह लगाने की कोशिश की लेकिन रूस में बोलने या सूचनाएं पाने की आज़ादी नहीं है इसलिए ये बताना बहुत मुश्किल है कि लोग ईमानदारी से अपनी बात कह रहे हैं.

रायशुमारी इस बात का संकेत देती है कि अधिकांश रूसी नागरिक अगर युद्ध का समर्थन नहीं कर रहे, तो भी वे निश्चित तौर पर इसका विरोध भी नहीं करते.

यह अनिच्छा विदेश में रहने वाले रूसी लोगों के बीच बहस का मुद्दा बन गया है. जो लोग पढ़ने के लिए यहां से बाहर गए हैं और रूस पर ख़बरें लिख रहे हैं (जिनमें मैं भी शामिल हूं) उनका मानना है कि बहुत थोड़े लोग युद्ध का खुलकर समर्थन कर रहे हैं और थोड़ी ही संख्या में लोग खुलकर इसका विरोध कर रहे हैं.

अधिकांश रूसी नागरिक मौजूदा हालात को समझने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उनका कहना है कि ये उनका चुनाव नहीं था. वे कहते हैं कि वे समझ नहीं पा रहे और बदलाव तो चाहते हैं लेकिन खुद को असहाय पा रहे हैं.

क्या वे इस युद्ध को रोक सकते थे?

कुछ का मानना है कि अगर अधिक से अधिक लोग अपनी आज़ादी के लिए खड़े हुए होते और पश्चिम और यूक्रेन के ख़तरे को बढ़ाचढ़ा कर पेश किए जाने वाले सरकारी टीवी के प्रोपेगैंडा को लोगों ने चुनौती दी होती, तो शायद संभव है.

अधिकांश रूसियों ने खुद को राजनीति से दूर रखना चुना और क्रेमलिन को उनका भविष्य तय करने दिया. लेकिन कहते हैं कि सिर झुकाने का मतलब विचलित करने वाला नैतिक समझौता है.

युद्ध से दूर रहते हुए रूसी नागरिकों को ये दिखावा करना पड़ रहा है कि ये आक्रमण कोई अपवाद नहीं है. वो ये दिखावा करने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें उन यूक्रेनियों की ओर से आंखें मूंद लेनी चाहिए जो हज़ारों की तादाद में मारे जा रहे हैं या घायल हो रहे हैं.

और ये सब उस 'स्पेशल मिलिटरी ऑपरेशन' के नाम पर हो रहा है, जिसका दावा रूस करता है.

रूसी नागरिकों को ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि ये नॉर्मल है कि सेना के जवान स्कूलों में जाकर उनके बच्चों को बताते हैं कि युद्ध एक अच्छी चीज़ है.

कि युद्ध का समर्थन करना पादरियों के लिए सामान्य बात है और उन्हें शांति के लिए प्रार्थना बंद कर देनी चाहिए. कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे अब विदेश यात्रा नहीं कर सकते और व्यापक दुनिया का वे हिस्सा नहीं रहे. कि लोग जिन स्वतंत्र मीडिया वेबसाइटों को पढ़ते थे, उन्हें रूस ने ब्लॉक कर सही ही किया था.

ये भी कि कैमरे से ली गई तस्वीरों को सासंद ट्विटर पर पोस्ट कर रहे हैं और अब यह प्रदर्शन रूसी ताक़त का सकारात्मक प्रतीक हो गया है. और ये कि युद्ध के बारे में अपने मन की बात कहने पर सालों तक के लिए जेल जाना एक सामान्य बात है, चाहे आप काउंसलर हों या पत्रकार.

Short presentational grey line
BBC
Short presentational grey line

लेकिन फिर रूसी नागरिक इसके विरोध में प्रदर्शन क्यों नहीं कर रहे हैं?

शायद यह बात ओपिनियन पोल्स की बजाय रूस का इतिहास बेहतर ढंग से समझाता है.

जबसे राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सत्ता में आए हैं, उन्होंने इसे छिपाया नहीं कि वो रूस का पुनर्निर्माण करना चाहते हैं और दुनिया में इसकी सम्मानजनक स्थिति बहाल करना चाहते हैं.

अपने भाषणों और लेखों में उन्होंने अपने इस विश्वास को साफ़ किया है कि पूरब और पश्चिम, दुनिया के दोनों हिस्सों में रूस का विशेष स्थान है. रूस की अलग परंपरा, धर्म और काम करने का अपना तरीक़ा है और रूसियों को सम्मान की चाहत है.

रूस
YURI KADOBNOV/AFP
रूस

पुतिन पहले ही ये साफ़ कर चुके हैं कि ये संदेश सदियों से चला आया है और इसमें किसी बदलाव की संभावना नाकाबिले बर्दाश्त है.

ये पुतिन के पसंदीदा खेल जूडो के 'चोकहोल्ड' (हाथ से गर्दन को फांसी की तरह पकड़ने का पैंतरा) जैसा है. पुतिन के इस विज़न की क़ीमत रूसियों ने अपनी आज़ादी गवां कर और यूक्रेनियों ने अपनी जान गवां कर अदा की है. हर बार तबाही और बर्बादी के बाद ही रूस की आंखें खुली हैं.

साल 1989 में अफ़ग़ानिस्तान में हार के बाद गोर्बाचेव का युग आया. इससे पहले 1905 में जापान से हार के बाद रूस में संवैधानिक सुधार हुए और उससे पहले 1856 में क्रीमियाई युद्ध में हार के बाद ग़ुलामों के हालात बदले.

रायशुमारी करने वालों ने एक पैटर्न की पहचान की है. वो ये कि अधिकांश रूसी कहते हैं कि वे लड़ाई को ख़त्म करने के लिए शांति समझौते का समर्थन करेंगे. लेकिन वे स्वतंत्र यूक्रेन को किस तरह की गारंटी देंगे, ये अभी भी साफ़ नहीं है.

देर सवेर इस सवाल का जवाब देना तो होगा ही और रूसी नागरिकों को इस सवाल का सामना करना पड़ेगा कि उनके देश ने क्या किया है.


(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+