भारत से ब्रह्मोस खरीद सकता है रूस, अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम होंगे फेल.. नाटो देशों की भी पहली पसंद

भारत के पास एडवांस सुपरसॉनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल है जिसके बारे में दावा किया जाता है कि इससे चीन भी खौफ खाता है। यह मिसाइल 400 किलोमीटर दूर अपने टारगेट को निशाना बनाने में सक्षम है।

रूस के सहयोग से निर्मित इस मिसाइल को ब्रह्मास्त्र कहा जाता है। ब्रह्मोस इतना ताकतवर है कि चीन में तैनात S-400 एयर डिफेंस सिस्टम भी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ब्रह्मोस एरोस्पेस के CEO और MD अतुल दिनकर ने हाल ही में द वीक मैगजीन से इन मिसाइल के बारे में चौंकाने वाले खूबियों पर बात की है।

BrahMos Cruise Missile

अतुल दिनकर ने बताया कि फिलहाल कुछ ही देशों के पास S-400 एयर डिफेंस सिस्टम है लेकिन ये भी ब्रह्मोस का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। उन्होंने तर्क दिया कि S-400 डिफेंस सिस्टम खासतौर से बैलिस्टिक मिसाइलों से सुरक्षा के लिए बनाई गई है।

बैलिस्टिक मिसाइल अलग तरह से ऑपरेट होती है। ये अलग ट्रैजेक्टरी से टारगेट की ओर बढ़ती है। जबकि ब्रह्मोस के लॉन्च होने के बाद टारगेट लोकेशन पर इसके प्रभाव के बीच बहुत कम समय होता है, इसलिए किसी भी जमीन से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम के लिए इसे रोक पाना मुश्किल है।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज रफ्तार मिसाइलों में शामिल है। ये 10 मीटर की ऊंचाई पर भी बहुत तेज स्पीड से उड़ान भरती है जिसकी वजह से इसे राडार सहित किसी भी एंटी-मिसाइल सिस्टम से पकड़ना आसान नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि अगर कोई डिफेंस सिस्टम इसे पकड़ने में कामयाब हो भी गया तो वो सिर्फ 1,2 या 3 को रोक पाएगा। एक साथ 5या 6 मिसाइलों की बौछार को रोकना संभव नहीं है। ये मिसाइल किसी न किसी तरह अपने टारगेट तक पहुंच ही जाएंगी। क्रूज मिसाइल की अचूक शक्ति यही है।

दिनकर ने कहा कि ब्रह्मोस अपनी श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ है। यह किसी भी सशस्त्र बल की तिकड़ी में एकमात्र सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है। उन्होंने कहा कि जब हमने इसे बनाना शुरू किया था तो इसका कोई बचाव नहीं था। आज, हम कुछ मिसाइलरोधी प्रणालियों के बारे में सुनते हैं। लेकिन, फिलहाल हमें ऐसा कोई नहीं दिखा है जो ब्रह्मोस को रोक सके।

ब्रह्मोस को रूस के साथ मिलकर बनाया गया है। हालांकि रूस ने खुद ही अपनी मिलिट्री में इसे शामिल नहीं किया था। लेकिन अब हालात इतने बदल चुके हैं कि रूस भी ब्रह्मोस खरीदने में दिलचस्पी दिखा चुका है। अतुल दिनकर ने बताया कि रूसी P-800 ओनिक्स मिसाइल ब्रह्मोस का पुराना वर्जन है। ब्रह्मोस बाद का वर्जन है।

P-800 को डेवलप रूस में किया गया था। हम लगातार रूस को ब्रह्मोस के लिए एक बाजार के रूप में देखते रहे हैं। अगर उन्होंने इसे तब खरीदा होता, तो उनके पास मौजूदा स्थिति में उपयोग करने के लिए बहुत सी चीजें होतीं।

अतुल दिनकर ने वीक को बताया कि यूरोप में चल रहे युद्ध के खत्म होने के बाद हमें रूस से कुछ ऑर्डर मिल सकते हैं, खासकर हवा से लॉन्च होने वाले ब्रह्मोस के लिए। उनके पास कोई समकक्ष नहीं है। दुनिया में हवा से प्रक्षेपित ब्रह्मोस का कोई समकक्ष नहीं है। मैं इसे निर्यात के मामले में गेम-चेंजर के रूप में देखता हूं।

अतुल दिनकर ने बताया कि भारत ने ब्रह्मोस के लिए किन-किन देशों संग डील की है। उन्होंने कहा कि हमने ब्रह्मोस बेचने के लिए पहला कॉन्ट्रैक्ट फिलिपीन्स के रक्षा मंत्रालय के साथ किया। ये उनके समुद्री दल के लिए था। ये बहुत बड़ा कॉन्ट्रैक्ट नहीं था, लेकिन ये एक अच्छी शुरुआत है।

उन्होंने कहा कि NATO सदस्यों सहित दुनिया भर के पश्चिमी देशों ने इसमें अपनी दिलचस्पी दिखाई है। वे सभी ब्रह्मोस चाहते हैं। एक विदेशी नेवल चीफ ने मुझसे कहा था- मैं कभी भी ब्रह्मोस के खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहूंगा। मैं इसे हमेशा अपनी पक्ष में देखना चाहूंगा।

लेटिन अमेरिका के देश भी ब्रह्मोस के लिए हमसे बातचीत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये एक महंगी मिसाइल है। इसे खरीदने से पहले किसी भी देश को इसकी जरूरत को लेकर सही आंकलन करने की जरूरत है। साथ ही उन्हें ये भी इवैल्यूएट करना होगा कि क्या वो हमारे साथ इतने बड़े लेवल पर पार्टनरशिप करना चाहते हैं।

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