ताइवान के चुनाव में बढ़ी मंदिर की भूमिका, धर्म का सहारा लेकर कम्युनिष्ट चीन भी बिछा रहा जाल

ताइवान में 13 जनवरी को राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। इस चुनाव को ताइवान में पहली बार 1996 में हुए चुनाव के बाद सबसे महत्वपूर्ण चुनाव माना जा रहा है। अगले सप्ताह लगभग ढाई करोड़ की आबादी वाला ये देश एक नया राष्ट्रपति चुनेगा जो चीन के साथ उसके संबंधों का भविष्य तय करेगा।

जैसे-जैसे देश में राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव नजदीक आ रहे हैं, ताइवान के कुछ प्रमुख उम्मीदवारों ने प्रचार अभियान तेज कर दिया है। वे इसके लिए मंदिर का खूब सहारा ले रहे हैं। लगभग हर पार्टी के नेता जनता का वोट हासिल करने के लिए मंदिरों का रुख कर रहे हैं।

temples are a top campaign stop

अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक न्यू ताइपे शहर के घनी आबादी वाले झोंघे जिले के सबसे बड़े मंदिरों में से एक लिक्सिंग फुड मंदिर में डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार विलियम लाई चिंग-ते और डीपीपी सांसद उम्मीदवार वू झेंग ने दौरा किया। उन्होंने मंदिर में धूप-अगरबत्ती जलाई और ताइवान की शांति लोगों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की प्रार्थना की।

इसके बाद उ विलियम लाई और वू झेंग ने मंदिर के प्रांगण में खचाखच भरे लोगों की भीड़ को संबोधित किया। वू ने कहा कि "लंबे समय से, ताइवान दुनिया में एक अनाथ जैसा रहा है। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। हर कोई ताइवान को देख रहा है। हमें लाई के लिए वोट करना है ताकि हम त्साई (वर्तमान राष्ट्रपति) की राजनीति के पिछले आठ वर्षों को जारी रख सकें।"

ताइवान में मंदिर ऐसे सार्वजनिक जगह हैं जहां बड़ी तादाद में श्रद्धालु नागरिकों की मौजूदगी रहती है। यहां 28 फीसदी लोग लोक धर्मों, 20 फीसदी बौद्ध और 19 ताओ धर्म का पालन करते हैं। शेष लोग नास्तिक माने जाते हैं।

ताइवान में चुनावी मौसम में राजनीतिक नेताओं के लिए ऐसे धार्मिक जगहों पर जाना जरूरी होता है। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने एक ही महीने में 43 मंदिरों का दौरा किया था। ताइवान के ग्रामीण इलाके में मंदिर लंबे समय से स्थानीय समुदाय की आधारशिला रहे हैं।

ताइवान आंतरिक मंत्रालय का अनुमान है कि देश में 33,000 पूजा स्थल हैं। ताइवान की टॉप इलेक्ट्रिक कंपनी के मालिक और अरबपति टेरी गॉ भी 2019 और 2023 में राष्ट्रपति पद के लिए दौड़ने का विचार रखते समय कई बार देवताओं का आह्वान कर चुके हैं।

पिछले साल की शुरुआत में उन्होंने दावा किया कि बौद्ध-ताओवादी समुद्री यात्रा देवी माजू उनके सपने में आईं और उन्हें ताइवान जलडमरूमध्य में शांति को बढ़ावा देने के लिए चुनाव में शामिल होने के लिए कहा। हालांकि डेरी गॉ पिछले साल नवंबर में चुनावी दौड़ से हट गए।

ताइवान के कई प्रमुख धर्मों और धार्मिक संगठनों के भी चीन के साथ ऐतिहासिक और संगठनात्मक संबंध हैं, जो उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रभाव और चुनाव हस्तक्षेप के लिए उपजाऊ जमीन बनाते हैं।

ताइवान में बहुत सारे लोग माजू या दूसरी कई ऐसे लोक देवियों की पूजा करते हैं, जिनकी जड़ें चीन में हैं। ऐसे में कई सारे ताइवान और चीन के लोग एक दूसरे देशों के मंदिरों में जाते हैं और साथ-साथ धार्मिक जुलूसों में हिस्सा लेते हैं।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी इस तरह की यात्राओं को बढ़ावा दे रही है। चीन का ये मानना है कि ताइवानी नागरिक जितना अधिक चीन के साथ अपनी पहचान पर जोर देगा उसे ताइवान के 'शांतिपूर्ण एकीकरण' में उतनी ही मदद मिलेगी।

कई रिपोर्ट्स में ऐसा दावा किया जाता है कि चीन, ताइवान के कई मंदिरों में फंडिंग करता है। कम्युनिस्ट चीन एकीकरण के अपने नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए धार्मिक परंपरा का इस्तेमाल कर रहा है।

एक अनुमान के मुताबिक ताइवान के लगभग 60 फीसदी लोग माजू समुदाय के हैं। ऐसे में चीन, ताइवानी लोगों को आकर्षित करने के लिए ताइवानी देवी का इस्तेमाल कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक धर्म के नाम पर चीन के एजेंट्स को ताइवान में घुसपैठ का मौका मिल जाता है और ये लोग ताइवान की जनता को लालच देकर चीन समर्थक उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने के लिए कहते हैं।

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