क्या वाकई फायदेमंद है गैजेट्स से ब्रेक लेना?
नई दिल्ली, 26 अगस्त। काम से लेकर एक्सर्साइज तक, हर चीज के लिए स्क्रीन को तकते रहने से तंग आ चुकीं आना रेडमन और उनके प्रेमी लंदन के बाहर एक जंगल में एक केबिन में चले गए थे. इन तीन दिनों के लिए उन्होंने अपने फोन एक सीलबंद लिफाफे में डालकर रख दिए थे.

पब्लिक रिलेशंस में काम करने वालीं 29 साल की रेडमन कहती हैं, "कुछ दिन के लिए पहुंच से बाहर हो जाने का ख्याल लुभावना लगा था." कोविड के कारण हुए लॉकडाउ के दौरान काम से लेकर आराम तक उनकी पूरी जिंदगी ऑनलाइन हो गई थी. नतीजतन उन्हें 'डिजिटल डिटॉक्स' करने की बहुत ज्यादा इच्छा होने लगी थी.
रेडमन और उनके बॉयफ्रेंड जैसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो महामारी के दौरान तकनीकी चीजों के साथ समय बिताकर आजिज आ चुके हैं और इनसे कुछ समय के लिए छुटकारा चाहते हैं.
ऐसे लोगों की इच्छाओं के अनुरूप बहुत से उत्पाद भी बाजार उपलब्ध हो गए हैं. मसलन ऐसे ऐप्स उपलब्ध हैं जो गैजेट को एक निश्चित समय के लिए लॉक कर देते हैं. या फिर ऐसे रीट्रीट यानी आरामघर उपलब्ध हैं जहां वाई फाई की सुविधा सीमित होती है. ऐसे रेस्तरां हैं जहां ग्राहकों को खाने की मेज पर फोन अपने साथ रखने की इजाजत नहीं होती.
बढ़ रही है मांग
विशेषज्ञ कहते हैं कि गैजेट से छुटकारा दिलाने वाली चीजों की मांग और बाजार पिछले कुछ सालों से लगातार बढ़ रहे हैं. 2018 में ब्रिटेन और अमेरिका में 4,000 से ज्यादा लोगों पर हुए एक सर्वे में रिसर्च करने वाली संस्था जीडब्ल्यूआई ने पाया कि लगभग 20 फीसदी लोगों ने डिजिटल डिटॉक्स किया था और 70 फीसदी अपने ऑनलाइन समय को कम करने की कोशिश में थे.
ब्रिटेन का एक स्टार्टअप अनप्लग्ड लंदन के नजदीक ऐसे केबिन उपलब्ध कराता है, जहां गैजेट्स की पहुंच नहीं है. इन्हीं में से एक में रेडमन और उनका प्रेमी रहे थे. अनप्लग्ड ने शुरुआत 2020 में की थी. इसके सह-संस्थापक हेक्टर ह्यूज कहते हैं कि उनके केबिन पूरा साल भरे रहे और इस साल वह पांच और जगहों पर शुरुआत कर चुके हैं.
ह्यूज बताते हैं, "लोग सच में एक ब्रेक चाहते हैं और मुझे लगता है कि यह लॉकडाउन का सीधा असर है जिस दौरान वे सारा समय स्क्रीन के सामने बिता रहे थे. हमने केबिन शहरी जिंदगी से एक घंटा दूर बनाए हैं. लोग वहां जाते हैं अपने फोन एक डिब्बे में बंद कर देते हैं. हम उन्हें एक नक्शा और एक नोकिया देते हैं और तीन रात के लिए छोड़ देते हैं."
सेहत पर असर?
गैजेट्स से छुटकारे को अक्सर सेहत पर एक सकारात्मक प्रभाव के तौर पर प्रचारित किया जाता है. माना जाता है कि इससे नींद बेहतर होती है, तनाव और अवसाद में मदद मिलती है. लेकिन इस बारे में हुए कुछ शोध अलग तस्वीर पेश करते हैं.
अमेरिका में तकनीक से दूर रखने वाले एक आराम घर पर रिसर्च कर रहीं डिजिटल एंथ्रोपोलोजिस्ट थियोड्रा सटन कहती हैं कि डिजिटल डिटॉक्स के प्रचारित फायदे सिर्फ तकनीक से दूर रहने के कारण नहीं होते बल्कि और भी बहुत सी चीजों पर निर्भर करते हैं.
वह बताती हैं, "लोग कहते हैं कि जंगल में एक हफ्ता बिताने के बाद वे बेहतर महसूस कर रहे हैं. लेकिन असल में वे छुट्टी मना रहे थे जिसका उन्होंने लुत्फ उठाया. अगर आप सिर्फ तकनीक को दूर कर दें और उसकी जगह कुछ न दें, तो उतने मात्र से ही आपको बेहतर नहीं महसूस होगा."
ग्रीनविच यूनिवर्सिटी में पर्यटन पढ़ाने वाले वेनजिए काई ने डिजिटल डिटॉक्स पर काफी काम किया है और वह कहते है कि उनके अनुभव में जज्बात का खूब उतार-चढ़ाव हुआ. काई बताते हैं कि बिना तकनीक के छुट्टी पर जाने वाले लोगों ने दिन की शुरुआत में और अंत में भी एंग्जाइटी की शिकायत की.
फालतू की बात!
2019 में ब्रिटेन की लोगबरो यूनिवर्सिटी में एक हुए एक अध्ययन का नतीजा था कि 24 घंटे तक स्मार्टफोन से दूर रहने का मूड और एंग्जाइटी पर कोई असर नहीं पड़ा. ऐसा ही एक अध्ययन ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस साल किया. उन्होंने भी पाया कि एक दिन सोशल मीडिया छोड़ देने का लोगों के आत्मसम्मान या संतोष के स्तर पर कोई असर नहीं पड़ा.
इस अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता ऑक्सफर्ड इंटरनेट इंस्टिट्यूट में एक्सपेरिमेंटल साइकॉलजिस्ट एंड्रयू प्रिजबिल्स्की कहते हैं कि डिजिटल तकनीक के संभावित मानसिक प्रभावों को अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है.
वह कहते हैं, "संभवतया यह बकवास है कि अपने फोन ऑफ कर देने से आप खुश रहने लगेंगे. बतौर इंसान हम बहुत सारी अलग-अलग चीजों के साथ तालमेल बनाने की कोशिश करते हैं, जैसे कि बतौर पिता, बतौर पति, बतौर प्रोफेसर... तो आपको हमेशा एक संतुलन कायम करना होता है."
वीके/एए (रॉयटर्स)
Source: DW
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