चीन को लेकर पुतिन-मोदी ने बनाया अलग-अलग रास्ता, क्या शुरू हो गई भारत-रूस दोस्ती की अंत की शुरूआत?
विशेषज्ञों की चिंता इस बात को लेकर है, कि रूस करीब करीब 60 फीसदी सैन्य सामानों की आपूर्ति भारत को करता है, लिहाजा क्या चीन के साथ बढ़ती दोस्ती भारत की सुरक्षा के लिए क्या चिंता पैदा करने वाला है?
नई दिल्ली, फरवरी 04: चीन से तनाव के बीच भारत ने बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक खेलों का राजनयिक बहिष्कार कर दिया है, जिसमें भाग लेने के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहुंचे हैं। भारत के बीजिंग ओलंपिक का डिप्लोमेटिक बहिष्कार करने के फैसले का अमेरिका ने स्वागत किया है, जबकि चीन पहुंचने से पहले ही रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ऐलान कर दिया है कि, चीन के साथ रूस का रिश्ता अब अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचने वाला है, यानि रूस ने तय कर लिया है, कि चीन के साथ किस तरह का रिश्ता बनाना है, तो फिर सवाल ये उठता है, कि क्या चीन और रूस के 'प्रगाढ़' रिश्ते के बीच भारत तालमेल बिठा पाएगा या फिर रूस के लिए भी अब भारत का महत्व कम हो गया है?

चीन दौरे पर रूसी राष्ट्रपति
मोटे तौर पर देखा जाए तो विश्व की राजनीति में इस वक्त नया करवट लेता हुआ दिख रहा है और कई नये समीकरण बनते हुए दिख रहे हैं। चीन में आज से शुरू हुए बीजिंग शीतकालीन ओलंपिक का अमेरिका और ब्रिटेन समेत दर्जन भर देशों ने जब मानवाधिकार के मुद्दे पर बहिष्कार कर दिया है, उस वक्त रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए पहुंचे हैं। चीन पहुंचने के बाद रूसी राष्ट्रपति ने समाचार एजेंसी शिन्हुआ में लिखे एक लेख में चीन के साथ रिश्ते को अभूतपूर्व बताया है और लिखा है कि, 'रूस-चीन की रणनीतिक साझेदारी एक नये युग में प्रवेश कर रही है और दोनों देशों की साझेदारी अब अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच गई है, जिसकी रूस सराहना करता है।' लेकिन, सवाल ये उठता है, कि अगर पुतिन ने रूस का रिश्ता चीन से इस कदर मजबूत करने का फैसला कर लिया है, तो फिर भारत को लेकर उनका रूख क्या होगा?

बीजिंग ओलंपिक का बहिष्कार
बीजिंग ओलंपिक में गलवान घाटी हिंसा में शामिल पहने वाले पीएलए के सैनिक को मसालवाहक बनाकर चीन ने खेल में भी राजनीति को शामिल कर लिया है, जिसके बाद भारत ने भी चीन के इस कदम को अफसोसजनक बताते हुए बीजिंग ओलंपिक का डिप्लोमेटिक बहिष्कार कर दिया है, हालांकि, भारतीय खिलाड़ी खेल में हिस्सा ले रहे हैं। लेकिन, व्लादिमीर पुतिन के साथ साथ इमरान खान, मध्य एशिया के पांच देशों के राष्ट्रपति, सिंगापुर के राष्ट्रपति हलीमा याकूब, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फत्तेह अल-सीसी और सऊबी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी बीजिंग ओलंपिक के ओपनिंग सेरेमनी में शामिल हो रहे हैं, जिनके जरिए शी जिनपिंग अमेरिका को 'चुनौती' देना चाहते हैं। तो फिर चीन में सजी तानाशाहों के इस चौपाल को लेकर भारत का रूख क्या होने वाला है और बदलते वैश्विक राजनीति में क्या भारत अभी भी गुट निरपेक्ष तरीके से आगे बढ़ेगा, बड़ा सवाल है?

चीन-रूस में कई नये करार
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बीजिंग पहुंचते ही चीन को 10 अरब क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने के लिए तैयार हो गये हैं और माना जा रहा है ये गैस सौदा कर रूसी राष्ट्रपति ने ब्रिटेन समेत यूरोपीय देशों को बड़ा झटका दिया है। इसके साथ ही पुतिन ने यह भी कहा कि चीन को हाइड्रोकार्बन की आपूर्ति पर रूसी तेल व्यवसाय के पास "नए समाधान" हैं। यूक्रेन संकट के बीच जब आशंका युद्ध होने की है, तब चीन के साथ 'गठबंधन' कर रूसी राष्ट्रपति आने वाले वित्तीय संकट से निपटने की प्लानिंग भी कर रहे हैं। असल में देखा जाए तो ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका में तनाव है, तो यूक्रेन को लेकर रूस के सामने अमेरिका है, लिहाजा चीन और रूस ने दोस्ती कर ली है और चीन जब खेल का राजनीतिकरण कर रहा है, पुतिन ने उसका मौन समर्थन कर साफ कर दिया है, कि उनका इरादा क्या है।

यूक्रेन पर रूस के साथ आया चीन
वहीं पिछले हफ्ते चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने साफ तौर पर रूस को समर्थन देने का ऐलान करते हुए साफ कर दिया कि चीन अब क्या चाहता है। चीनी विदेश मंत्री ने कहा कि, 'अमेरिका को रूस की वैधानिक सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से लेना चाहिए', यानि, चीन ने अपना पक्ष साफ कर दिया है और यही चीन से उम्मीद भी थी। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अमेरिका और नाटो गठबंधन पर निशाना साधते हुए कहा कि, 'सैन्य गठबंधन को मजबूत करके या फिर सैन्य गठबंधन का विस्तार कर क्षेत्रीय सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती है'। विशेषज्ञों का मानना है कि, चीन ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। एक तो यूक्रेन के नाटो में शामिल होने की मांग को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है, दूसरी तरफ चीन की नजर 'क्वाड' पर भी है। इसके साथ ही विशेषज्ञों का मानना है कि, चीन और रूस, इस वक्त दोनों को एक दूसरे की जरूरत है, लेकिन इन सबके बीच रूस, भारत को लेकर क्या सोच रहा है और भारत यूक्रेन संकट पर क्या सोच रहा है, ये काफी अहम है।

रूसी सैन्य सामानों पर टिका भारत का डिफेंस
वहीं, अब विशेषज्ञों की चिंता इस बात को लेकर है, कि रूस करीब करीब 60 फीसदी सैन्य सामानों की आपूर्ति भारत को करता है, लिहाजा क्या चीन के साथ बढ़ती दोस्ती भारत की सुरक्षा के लिए क्या चिंता पैदा करने वाला है? हालांकि, भारत के लिए रूस के साथ साथ अमेरिका भी महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक भागीदार बन चुका है। चीन की सीमा पर भारत अमेरिकी टोही विमानों से सैन्य निगरानी करता है, साथ ही भारत खुफिया जानकारियों के लिए कई अमेरिकी सैन्य प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करता है। इतना ही नहीं, चीन की सीमा पर तैनात करीब 50 हजार से ज्यादा जवानों के लिए भारत से यूरोपीय सैन्य भागीदारों से ही गर्म कपड़े मंगवाए हैं, लिहाजा भारत के लिए रूस और अमेरिका में एक विकल्प चुनना काफी मुश्किल होने वाला है। लेकिन, भारत को अभी भी अपने डिफेंस सेक्टर से रूसी सैन्य सामानों को रिप्लेस करने में कई दशक लग जाएंगे। तो फिर सवाल ये है, कि रूस को लेकर भारत अपने रिश्ते को किस तरह से आगे बढ़ाता है।












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