लोकसभा चुनाव के बीच भूटान निकले प्रधानमंत्री मोदी.. चीन के बढ़ते खतरों के बीच कितना अहम है दौरा?
PM Modi Bhutan Visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार आज सुबह भूटान की दो दिवसीय राजकीय यात्रा पर रवाना हो गये हैं और उनका शनिवार को लौटने का कार्यक्रम है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा, भारत सरकार की 'पड़ोसी प्रथम नीति' पर जोर देने का हिस्सा है।
पीएम मोदी पहले गुरुवार को ही प्रस्थान करने वाले थे, लेकिन हिमालयी राष्ट्र में खराब मौसम के कारण यात्रा स्थगित कर दी गई थी। विदेश मंत्रालय ने कहा है, कि यह यात्रा दोनों देशों के बीच "नियमित उच्च स्तरीय आदान-प्रदान की परंपरा" और केंद्र की 'नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी' पर जोर देने के मुताबिक है।

भारत में शुरू हुए चुनावी प्रक्रिया के बीच माना जा रहा है, कि प्रधानमंत्री मोदी का अपने दूसरे कार्यकाल का यह आखिरी विदेशी दौरा है और उनकी यह संक्षिप्त यात्,रा भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे की हाल की पांच दिवसीय भारत यात्रा के ठीक बाद हो रही है।
आखिर भारत के लिए भूटान इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं, आइये समझते है।
पीएम मोदी की यात्रा से पहले भारतीय विदेश मंत्रालय ने पिछले हफ्ते कहा था, कि भारत और भूटान आपसी विश्वास, समझ और सद्भावना से भरी एक अद्वितीय और स्थाई साझेदारी साझा करते हैं।
भारत और भूटान एक 'विशेष संबंध' में बंधे हैं, जो 1949 में भारत-भूटान मैत्री पर आधारित है, जिसे 2007 में अपडेट किया गया था। दोनों देशों ने 1968 में राजनयिक संबंध स्थापित किए थे।
भारत दशकों से इस छोटे हिमालयी साम्राज्य का विश्वसनीय मित्र रहा है। नई दिल्ली, भूटान का मुख्य विकास भागीदार बना हुआ है। इकोनॉमिक टाइम्स (ईटी) के अनुसार, भारत 1960 के दशक की शुरुआत से ही भूटान को उसके सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है, जब देश ने अपनी बार पंचवर्षीय योजनाएं शुरू की थीं।
वहीं, जब इस महीने भूटान के नये चुने गय प्रधानमंत्री टोबगे भारत पहुंचे थे, तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें भूटान की 13वीं पंचवर्षीय योजना के लिए नई दिल्ली के पूर्ण समर्थन का वादा किया था, जिसमें आर्थिक मदद भी शामिल है।
इसके अलावा, भारत और भूटान हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और यहां तक की अंतरिक्ष सेक्टर में भी एक साथ काम कर रहे हैं।
पीएम मोदी की ये भूटान यात्रा क्यों है महत्वपूर्ण?
प्रधानमंत्री मोदी की भूटान यात्रा उस वक्त शुरू हुई है, जब भारत में चुनावों की घोषणा हो चुकी है और भारत में आचार संहिता लागू हो चुका है। लिहाजा, इस बात की उम्मीद काफी कम है, कि पीएम मोदी अपने इस यात्रा के दौरान कोई नीतिगत या आर्थिक घोषणा कर सकते हैं। लेकिन, अपनी इस यात्रा से प्रधानमंत्री यह संदेश जरूर देने की कोशिश कर रहे हैं, कि भारत, थंपू के साथ कितना महत्वपूर्ण साझेदारी रखता है।
अपनी यात्रा के दौरान पीएम मोदी, भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक और उनके पिता जिग्मे सिंग्ये वांगचुक से भी मुलाकात करेंगे, जो भूटान के चौथे राजा थे। इसके अलावा, पीएम मोदी भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे से भी मुलाकात करेगे।
वहीं, सूत्रों के हवाले से डेक्कन हेराल्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि भूटान की महत्वाकांक्षी "गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी" परियोजना के लिए पीएम मोदी अपनी प्रतिबद्धता जता सकते हैं।
आपको बता दें, कि भूटान के राजा ने असम के साथ भूटान की दक्षिणी सीमा से लगते, गेलेफू में एक प्रमुख आर्थिक केंद्र विकसित करने की योजना पिछले दिसंबर में शुरू की थी। द हिंदू की रिपोर्ट में कहा गया है, कि गेलेफू को जोड़ने वाली रेल और रोड प्रोजेक्ट और एयरपोर्ट प्रोजेक्ट में भारत की सहायता मांग रहा है।
भारत और भूटान ने असम के कोकराझार से गेलेफू को जोड़ने वाले 58 किलोमीटर लंबी रेल लिंक बनाने का प्रोजेक्ट तैयार किया है। और ये प्रोजेक्ट आगे जाकर असम और पश्चिम बंगाल होते हुए भूटान को म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और सिंगापुर से कनेक्ट करेगा, जो भारत का एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, लेकिन फिलहाल म्यांमार मे सैन्य शासन की वजह से रूका हुआ है। बाकी सभी देश इस प्रोजेक्ट के लिए तैयार हैं।
लिहाजा, जब प्रधानमंत्री मोदी भूटान के राजा और प्रधानमंत्री से मुलाकात करेंगे, तो सीमा पार रेल लिंक समेद द्विपक्षीय कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स बातचीत के एजेंडे में रहने की संभावना है। इसके अलावा, गेलेफू में एक इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने के भूटान के प्रोजेक्ट के लिए भी भारत हामी भर सकता है, भले अभी इसका ऐलान ना हो।
भूटान के 'गेलेफू स्मार्टसिटी प्रोजेक्ट' के लिए भी भारत अपना समर्थन दे सकता है, जो पिछले साल नवंबर में भारत दौरे पर आए भूटान के राजा के एजेंडे मे सबसे बड़ी प्राथमिकता थी।
चीन का बढ़ता खतरा, भारत के लिए भूटान अहम
भूटान की सीमा में लगातार चीनी घुसपैठ जारी है, जो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंताजनक बात है और चीन और भूटान के बीच सीमा समझौते को लेकर होने वाली बात पर भारत करीबी से नजर रख रहा है। भूटान की पिछली सरकार ने चीन से करीबी संबध बनाने की कोशिश की थी, जिसने भारत को थोड़ा परेशान भी किया था, लेकिन भूटान में बनी नई सरकार भारत समर्थक है।
भारत की सबसे बड़ी चिंता ये है, कि चीन चाहता है, कि भूटान उसे डोकलाम क्षेत्र दे दे, बदले में चीन उसे किसी दूसरे हिस्से से अदला-बदली करने के लिए तैयार है। डोकलाम लेने में चीन अगर कामयाब रहता है, तो भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि डोकलाम से चीन को रणनीतिक बढ़त मिल जाएगी।
भारत डोकलाम पठार को भूटान का निर्विवाद क्षेत्र मानता है, जबकि बीजिंग इसे अपनी चुम्बी घाटी का विस्तार मानता है, जो सिक्किम और भूटान के बीच स्थित है।
डोकलाम पठार, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के करीब है, जो भारतीय मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर से जोड़ता है। यह गलियारा भारत को तिब्बत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश से भी जोड़ता है। लिहाजा, चीन और भूटान के बीच डोकलाम को लेकर अगर कोई भी समझौता होता है, तो भारत की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ेगा, वहीं चीन की कोशिश भूटान से राजनयिक संबंध जोड़ने की भी है और भारत इसपर भी नजर रख रहा है।
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