Petrol Diesel Crisis: भारत के पास कितने दिनों का पेट्रोल-डीजल और LPG? किसके पास सबसे ज्यादा और कहां खड़े हम?
Petrol Diesel Crisis: इजरायल-अमेरिका और ईरान में चल रही जंग ने दुनिया की गैस और तेल की बड़ी नस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दबा दिया है। जिससे कई देशों में गैस और तेल की किल्लत हो रही है। ऐसे में भारत की युद्ध की तैयारियों और तेल के भंडार करने की स्ट्रेटजी पर सवाल उठ रहे हैं। पुरानी से लेकर मौजूदा तक सभी सरकारों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ऐसे में ये समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि अगर सप्लाई रुक गई तो हम कितने दिन तक सर्वाइव कर पाएंगे और हमारी स्ट्रेटजिक पेट्रोलियम रिजर्व कैपेसिटी कितनी है।
कितना तेल है भारत के पास?
मार्च 2026 में पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी के मुताबिक, भारत के पास 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) का स्ट्रेटजिक रिजर्व है। यह तीन जगहों पर बना है। पहला- विशाखापत्तनम (1.33 MMT), दूसरा- मैंगलोर (1.5 MMT) और तीसरा- पादुर (2.5 MMT). (MMT=Million Metric Tons)

इनमें फिलहाल 3.37 MMT कच्चा तेल मौजूद है, जो करीब 9-10 दिनों की जरूरत के लिए काफी है। लेकिन इसमें मौजूदा वक्त में जितना तेल बचा हुआ है उससे 6-8 दिन काम चल पाएगा। इसके अलावा, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों के पास 64.5 दिनों का एक्स्ट्रा स्टॉक है।
दुनिया के मुकाबले भारत कितना पीछे?
अगर दुनिया के बड़े देशों से तुलना करें, तो भारत काफी पीछे है। जापान के पास 254 दिनों का तेल भंडार है, जबकि चीन के पास 110-140 दिनों तक का स्टॉक है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) अपने सदस्य देशों से कम से कम 90 दिनों का भंडार रखने को कहती है। इसमें अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देश शामिल हैं।

तेजी से बढ़ रही खपत, लेकिन रिजर्व वहीं का वहीं
भारत की तेल खपत तेजी से बढ़ी है। 2013-14 में यह 158.4 MMT थी, जो 2023-24 में बढ़कर 239.2 MMT हो गई। लेकिन SPR क्षमता लगभग स्थिर रही है। यानी जितनी तेजी से डिमांड बढ़ी, उतनी तेजी से भंडार नहीं बढ़ पाया।
संसदीय समिति की चेतावनी
मार्च 2026 की रिपोर्ट में संसदीय समिति ने कहा कि भारत को कम से कम 90 दिनों का तेल रिजर्व रखना चाहिए। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और अचानक सप्लाई रुकने पर अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहेगी।
कब हुई SPR बनाने की शुरुआत?
भारत में स्ट्रेटजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) बनाने का विचार 1990 के दशक के अंत में आया था, लेकिन जमीन पर काम 2000 के दशक के मध्य में ही शुरू हो पाया। पहली फेसिलिटी चालू होने में दो दशक से ज्यादा समय लग गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकारों ने जरूरत तो समझी, लेकिन बजट की कमी और सरकारी प्रक्रियाओं की धीमी गति के कारण काम बहुत स्लो रहा।
अटल से शुरू - मोदी पर पूरा
1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने रणनीतिक तेल भंडार बनाने का प्रस्ताव दिया था। 2004 में UPA सरकार ने इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) बनाई, जो इन भंडारों को मैनेज करती है। हालांकि, 4 साल में बनने वाली ये सुविधाएं 2015 से 2018 के बीच जाकर पूरी हुईं। मतलब जिस काम को 4 साल लगने थे उसे पूरा होते-होते 14 साल लग गए।
नई योजनाएं लेकिन काम अभी भी अधूरा
2021 में सरकार ने 6.5 MMT क्षमता बढ़ाने की योजना बनाई। इसमें ओडिशा के चांदीखोल में नया प्लांट और पादुर का विस्तार शामिल है। लेकिन 5 साल बाद भी ये प्रोजेक्ट जमीन अधिग्रहण और देरी की वजह से शुरुआती चरण में ही हैं। मतलब अभी ठीक से जमीन अधिग्रहण भी पूरा नहीं हुआ है।
क्यों धीमा चल रहा काम?
SPR बनाना बहुत महंगा काम है। जमीन, निर्माण और कच्चे तेल की खरीद-तीनों पर भारी खर्च होता है। सरकार को इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा और वेलफेयर जैसे अन्य खर्चों के साथ संतुलन बनाना पड़ता है। यही वजह है कि यह प्रोजेक्ट धीरे चलता है।
मेंटेनेंस का खर्च भी कम नहीं
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक,
• 2023-24 में Operation & Maintainance पर ₹153 करोड़ खर्च हुए
• 2024-25 में ₹100 करोड़ खर्च हुए
यानि इसे चलाना भी सस्ता नहीं है।
और कहां-कहां बन रहे पेट्रोलियम रिजर्व?
ISPRL अब नए स्टोरेज की तलाश कर रही है।
• बीकानेर में 5 MMT का नमक गुफा भंडार
• मैंगलोर का विस्तार 1.75 MMT तक
• मध्य प्रदेश के बीना में नया प्लांट
अगर ये सब बन जाते हैं, तो कुल क्षमता 20 MMT तक पहुंच सकती है। यानी कि सिर्फ 35.6 दिनों की जरूरत पूरी करेगा। लेकिन जो वर्ल्ड स्टैंडर्ड हैं उससे अभी भी लगभग 54-55 दिन पीछे होंगे। जबकि भारत अपनी 80% से ज्यादा तेल जरूरत आयात करता है, ऐसे में इसे बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं माना जा रहा।
राजनीति भी बनी मुद्दा
पूर्व पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने आरोप लगाया कि सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया। जो आयात निर्भरता घटनी चाहिए थी वह 70% से बढ़ाकर 80% कर दी। इसके अलावा एक खतरा और है। कच्चे तेल से ज्यादा खतरा LPG सप्लाई में है। भारत में 32 करोड़ घर LPG पर निर्भर हैं। लेकिन LPG का बड़ा स्ट्रेटजिक रिजर्व नहीं है।
LPG स्टोरेज की सीमित क्षमता
भारत में सिर्फ दो भूमिगत LPG स्टोरेज हैं:
• मैंगलोर: 80,000 मीट्रिक टन
• विशाखापत्तनम: 60,000 मीट्रिक टन
यानि कुल 140,000 मीट्रिक टन, जो सिर्फ कुछ दिनों के लिए ही काफी है।
LPG संकट सबसे ज्यादा खतरनाक क्यों?
जैसा कि आपको पता है कि पेट्रोल की कमी अमीर और मिडिल क्लास को प्रभावित करती है, लेकिन LPG की कमी लगभग हर घर को सीधे प्रभावित करती है।
क्या है हाल?
भारत ने स्ट्रेटजिक रिजर्व बनाने की दिशा में कदम तो उठाए हैं, लेकिन तेजी से बढ़ती खपत और वैश्विक संकटों को देखते हुए यह अभी भी काफी नहीं है। अगर भविष्य में सप्लाई चेन में बड़ा झटका आता है, तो भारत को गंभीर ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।
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