Pakistan Crisis: भिखारी बना जिन्नालैंड, 75 साल में 130 अरब डॉलर पहुंचा कर्ज, अंतिम सांसे गिन रहा पाकिस्तान
IMF पाकिस्तान के लिए 6.5 बिलियन डॉलर का ऋण मंजूर कर चुका है। लेकिन ऋण की किस्तें पाने के लिए उसने जो शर्तें लगाई हैं, शहबाज शरीफ सरकार उन पर पूरा अमल नहीं कर पाई है।

Image: oneindia
पाकिस्तान के मौजूदा हालात को लेकर दुनिया भर में चर्चा हो रही है। जिन्ना के सपनों का देश पाकिस्तान जो 60 के दशक में दक्षिण एशिया के बाकी देशों की तुलना में कई गुणा तेजी से विकास कर रहा था, आज भिखारी बन चुका है। पाकिस्तान अब भयंकर महंगाई, गरीबी, कर्ज, आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। आलम ये है कि पाकिस्तान बीते 75 सालों में सबसे बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। चीन को छोड़ दें तो दुनिया के हर देश ने पाकिस्तान से मुंह फेर लिया है।
IMF ने की 23 बार मदद
1958 में IMF से पहली बार 2.5 करोड़ डॉलर का कर्ज लेने वाला पाकिस्तान अब तक 23 बार इस अंतरराष्ट्रीय संस्था से लोन ले चुका है। भारत से आजाद होने के बाद पाकिस्तान पर एक पैसे का कर्ज नहीं था। आज स्थिति ये हैं कि पाकिस्तान का सिर्फ विदेशी कर्ज ही 100 बिलियन डॉलर के ऊपर चला जा चुका है और इसमें से 30 बिलियन डॉलर से ज्यादा कर्ज चीन का दिया हुआ है। दिवालिया होने से बचने के लिए पाकिस्तान ने IMF के सामने कई बार हाथ फैलाया है लेकिन स्टाफ लेवल एग्रीमेंट (एसएलए) पर अभी तक कोई इशारा नहीं मिल सका है।
बढ़ता जा रहा कर्ज
पाकिस्तानी विशेषज्ञ प्रोफेसर हाफिज ए पाशा के मुताबिक देश की आजादी के पहले 67 साल में विदेशी कर्ज 65 अरब डॉलर था। वहीं साल 2014-15 से 2021-2022 के बीच में यह कर्ज लगभग दोगुना होकर 130 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यह पाकिस्तान की कुल जीडीपी का 40 प्रतिशत है। पाकिस्तान की वैश्विक साख कितनी गिर चुकी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में IMF ने युद्धग्रस्त यूक्रेन को 15.6 बिलियन डॉलर कर्ज देने पर सहमति जताई है। इससे पहले IMF ने बांग्लादेश और श्रीलंका को भी कर्ज की किश्त जारी करने का फैसला किया है। लेकिन कई वार्ताओं के बाद भी पाकिस्तान की झोली खाली ही रही है।
IMF ने पल्ला झाड़ा
पाकिस्तान के आर्थिक विशेषज्ञों की मानें तो अब IMF के साथ समझौता होगा इसकी संभावना लगभग नगण्य है। ऐसा लगता है कि सरकार खुद देश को उस स्थिति में धकेल रही है। साथ ही वह अब IMF को अपनी असफलताओं के लिए बलि का बकरा बनाने की उम्मीद कर रही है। हाल ही देश की सरकार की तरफ से अलक्षित और मूल्य-आधारित सब्सिडी की घोषणा की जिससे यह साफ होता है कि सरकार ने भी अब सारी उम्मीदों को छोड़ दिया है।












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