अब चीन को रोक नहीं पाएंगे भारत और जापान?

जापान और भारत
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पिछले हफ़्ते जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे का भारत दौरा विदेशी मीडिया में भी छाया रहा है. इस दौरे को लेकर चीनी मीडिया में भी काफ़ी हलचल रही.

चीनी मीडिया ने इस दौरे को शक के नज़रिए से देखा. हालांकि यह भी कहा कि चीन को इस दोस्ती से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. दूसरी तरफ़ चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और चीन के सीमा विवाद में किसी तीसरे पक्ष को नहीं आना चाहिए.

ग्लोबल टाइम्स चीन की सत्ताधारी कॉम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र है. कहा जाता है कि यह अख़बार चीन के रुख को ही सामने रखता है. सोमवार को ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे पिछले चार सालों में तीन बार भारत के दौरे पर जा चुके हैं.

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भारत और जापान में असैन्य परमाणु क़रार ?

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''नंवबर 2016 में भारत और जापान में असैन्य परमाणु करार हुआ है. अबे का भारत दौरा इसलिए भी महत्वूर्ण था. जापान ने जानबूझकर भारत के साथ यह क़रार किया जबकि उसे पता है कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है.''

''अबे ने भारत को यूएस-2 ऐम्फिबीअन एयरक्राफ्ट देने को भी मंजूरी दे दी है. यह भारत के साथ सबसे अहम सुरक्षा समझौता है. भारत जापान से विकास कार्यों में सबसे ज़्यादा मदद पाने वाला देश बन गया है.''

ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है, ''भारत औऱ जापान के नेताओं की हर मुलाक़ात में चीन प्राथमिकता के स्तर पर आता है. भारतीय मीडिया में इस यात्रा को डोकलाम विवाद के कारण काफ़ी तवज्जो मिली. भारत को जापान जिस तरह से चीन के ख़िलाफ़ भ्रमित कर रहा है उसे लेकर सतर्क रहना चाहिए.''

अख़बार ने लिखा है, ''चीन के मसले पर भारत से जापान फ़ायदा उठा रहा है. इसी साल मई मई महीने में अमरीका और जापान चीन के वन बेल्ट वन रोड में शामिल हुए थे जबकि भारत ने इसका बहिष्कार किया था. भारत इसे मिसाल के तौर पर देख सकता है कि जिसका उसने बहिष्कार किया उसमें जापान शरीक हुआ.''

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भारत और जापान ने देरी कर दी?

वहीं फ़ोर्ब्स ने लिखा है कि हिन्द महासागर के ट्रेड रूट्स में चीन के फैलाव को देखते हुए भारत और जापान अब साथ आए हैं. हालांकि फ़ोर्ब्स ने लिखा है कि हिन्द महासागर में चीन के विस्तार को भारत और जापान के नए मिशन से रोकना आसान नहीं है. फोर्ब्स ने लिखा है कि दोनों देशों ने काफ़ी देरी कर दी है और पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं.

फ़ोर्ब्स ने लिखा है, ''जापान भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर और उसकी परमाणु क्षमता को दुरुस्त करने में मदद कर रहा है. दोनों देश हिन्द महासागर में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास करने जा रहे हैं. इससे पहले दोनों देशों ने पिछले साल बंगाल की खाड़ी में नौसैनिक अभ्यास किया था.''

''हिन्द महासागर हमेशा से अफ़्रीका और मध्य पूर्व के साथ अन्य एशियाई देशों से व्यापार के लिए रणनीतिक जलक्षेत्र रहा है. हाल के वर्षों में चीन ने अपना व्यापक पैमाने पर यहां पांव फैलाया है.''

फ़ोर्ब्स ने आगे लिखा है, ''हिन्द महासागर में बिना मजबूत मौजूदगी के चीन साउथ चाइना सी में भी अपना प्रभुत्व नहीं जमा सकता है. इसका कारण यह है कि स्ट्रेट ऑफ मलाका एक ब्लॉकेड है. अमरीका और उसके सहयोगी मध्य-पूर्व से चीन की तेल आपूर्ति को बंद कर सकते हैं. इसके साथ ही चीन को अफ़्रीका से भी अलग किया जा सकता है.''

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हिन्द महासागर में चीन का विस्तार

हालांकि फ़ोर्ब्स का कहना है कि भारत और जापान ने काफ़ी देरी कर दी है. चीन ने पहले ही श्रीलंका में हम्बनटोटा पोर्ट को हासिल कर लिया है. अब यह पोर्ट 99 सालों तक चीन के कब्ज़े में होगा. इसके साथ ही चीन मध्य-पूर्व और अफ़्रीका से जुड़ने के लिए पाकिस्तान के रास्ते इकनॉमिक कॉरिडोर बना रहा है.

फ़ोर्ब्स ने अपनी एक और रिपोर्ट में लिखा है कि भारत और जापान की दोस्ती चीन को परेशान कर रही है. फ़ोर्ब्स ने लिखा है, ''हाल ही में डोकलाम में भारत और चीन की सेना आमने-सामने थी. चीन वहां सड़क बना रहा था और भारत ने उसे रोक दिया. 73 दिनों तक दोनों देशों की सेना 120 मीटर की दूरी पर आमने-सामने थी. अब भी यहां दोनों देशों के सैनिक 150 मीटर की दूरी पर आमने-सामने हैं.''

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अब भी वियतनाम और इंडोनेशिया से पीछे भारत

टाइम मैगज़ीन ने भी शिंज़ो अबे के भारत दौरे को काफ़ी तवज्जो दी है. टाइम ने लिखा है कि मोदी और अबे में अनौपचारिक संबंध को महसूस किया जा सकता है.

टाइम ने लिखा है, ''जापान और भारत एशिया में दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. दोनों के बीच व्यापार अब भी छोटा है. 2013 में दोनों देशों के बीच व्यापार 15.8 अरब डॉलर का था जो कि चीन और भारत के व्यापार का मुश्किल से एक तिहाई है.''

''जापान का भारत में 2007 से 2013 के बीच सीधा निवेश 15.8 अरब डॉलर पहुंच गया है. भारत में निवेश करने के मामले में जापान एक बड़ा निवेशक बनकर सामने आया है. हालांकि अब भी वियतनाम और इंडोनेशिया में जापान का निवेश भारत के मुकाबले ज़्यादा है.''

टाइम ने लिखा है कि हो सकता है कि यह तस्वीर भविष्य में बदल जाए. टाइम ने लिखा है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की सैन्य ताक़त को जापान की मदद से बढ़ाना चाहते हैं.

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