भूटान में नई सरकार का उदय: क्या भारत से रिश्ते होंगे प्रभावित?
नई दिल्ली। भूटान यूनाइटेड पार्टी या ड्रक न्यामरूप त्शोगपा (डीएनटी) ने भूटान में संसदीय चुनाव में जीत हासिल कर ली है और डॉ. लोटे छिरिंग हिमालय की गोद में बैठे इस खूबसूरत देश के नए प्रधानमंत्री बन गए हैं। राजशाही शासन खत्म होने के बाद यह तीसरा मौका है, जब भूटान में संसदीय चुनाव है। भूटान में भी लगभग फ्रांस की तरह दो चरणों में चुनाव होते हैं। भूटान में पहले चरण का चुनाव सितंबर में हुआ था, जिसमें चारों रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियों ने भाग लिया था। वहीं, दूसरे चरण के लिए इसी महीने 18 अक्टूबर को वोट डाले गए थे।

भूटान में इस बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी डीएनटी के लोटे छिरिंग प्रमुख हैं, जिन्होंने ढ़ाका यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस किया है। 50 वर्षीय छिरिंग ने कैनबरा यूनिवर्सिटी से एमबीए भी किया है। भूटान के नए प्रधानमंत्री बनने वाले छिरिंग थिंपू हॉस्पिटल में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। डीएनटी ने सत्ता में आने से पहले गरीब-अमीर के बीच खाई को मिटाने का नारा दिया था। छिरिंग ने अपने 103 पन्नों के मेनिफेस्टो हेल्थ, एजुकेशन और अन्य क्षेत्रो में बेहतर सेवाएं देने और अवसर पैदा करने की बात कही है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट की मुताबिक, भूटान एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन साथ ही देश में उच्च युवा बेरोजगारी और विदेश ऋण की वजह से दबाव भी है। 2017 में इसका भूटान का कर्ज सकल घरेलू उत्पाद का 108.6% था। नई दिल्ली भी भूटानी हाइड्रोपावर का सबसे बड़ा खरीददार है, एक ऐसा क्षेत्र जो जीडीपी का 14% और सरकार के राजस्व का 27% बनाता है। भूटान भी भारत से सब्सिडी वाली गैस और केरोसिन पर निर्भर है। डीपीटी सरकार ने कीमत का भुगतान किया जब भारत ने 2013 के चुनाव से ठीक पहले सब्सिडी वापस लेने का फैसला किया था। डीएनटी ने बायोगैस और इलेक्ट्रिक कारों की शुरूआत का सुझाव दिया है।
भूटान के विकास को बजटीय सपोर्ट के लिए भारत का साथ मिलता है और चीन की विस्तारवादी नीति के खिलाफ नई दिल्ली को थिंपू का साथ मिलता रहा है। इसका ताजा उदाहरण हमने पिछले दो महीने तक चली डोकलाम गतिरोध के दौरान देखने को मिली। हालांकि, इस साल की शुरुआत में चीन ने भूटान से बातचीत की पहल की थी।












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