910 साल पहले आसमान से गायब हुआ था चांद, अब वैज्ञानिकों ने पता लगाई इसकी वजह

जिनेवा। क्या आप कभी सोच सकते हैं कि बिना चांद वाली रात आखिर कैसी दिखती होगी? अगर चांद गायब हो जाए तो लोगों को कैसा लगेगा। ये कोई काल्पनिक बात नहीं है, ऐसा सच में हो चुका है। जी हां, ऐसा आज से करीब 910 साल पहले हुआ था। करीब एक सहस्राब्दी (Millennium) पहले चांद हमारे आकाश से गायब हो गया था। वह धरती से आसमान में महीनों तक दिखाई नहीं दिया था। अब ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकों को इसके पीछे की वजह का पता चल गया है।

सदियों तक नहीं मिला कोई सुराग

सदियों तक नहीं मिला कोई सुराग

ये कहानी करीब 910 साल पुरानी है। वैज्ञानिकों को तब से आज तक इसके पीछे का कारण नहीं मिला था, लेकिन चंद्रमा एक महीने तक लोगों को आसमान में नहीं दिखा था। अब ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकों को इसका कारण पता चल गया है। इसके लिए पृथ्वी की ही एक घटना को जिम्मेदार बताया जा रहा है। इस घटना का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक लंबे समय से खोज कर रहे थे।

कहां हुआ शोध?

कहां हुआ शोध?

इस घटना का जवाब वैज्ञानिकों को हाल ही में हुए एक शोध में मिल गया है। जो स्विट्जरलैंड की जिनेवा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया है। यह शोध 'क्लाइमेट एंड सोसाइटल इंपैक्ट ऑफ अ फॉरगॉटन क्लस्टर ऑफ वॉल्कैनिक इरप्शन्स इन 1109-1110 सीई' शीर्षक से नेचर जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

क्या है इसके पीछे की वजह?

क्या है इसके पीछे की वजह?

शोधकर्ताओं को ये लगता है कि ज्वालामुखी की राख, सल्फर और ठंडे मौसम की वजह से चांद दिखना बंद हो गया था। लेकिन शोधकर्ताओं का इस शोध में ध्यान ज्वालामुखी प्रस्फुटन पर अधिक था। शोध के अनुसार साल 1108 के मध्य में पृथ्वी के वायुमंडल में अचानक ही सल्फर की मात्रा में तेजी से वृद्धि हुई थी। ऐसा उसके अगले दो साल तक हर साल के अंत में होता था जो अगले साल के कुछ शुरुआती महीनों तक होता रहा। सल्फर की ये मात्रा बढ़ी और सल्फर स्ट्रैटोस्फियर तक पहुंच गया, लेकिन बाद में यह सल्फर नीचे आ गया और बर्फ में जम गया। ऐसा ग्रीनलैंड से लेकर अंटार्कटिका तक हुआ था। वैज्ञानिकों को इस बात का प्रमाण मिला है, उन्होंने जगह-जगह बर्फ में सल्फर की मात्रा जमी पाई है जो 1108 से 1110 के बीच की है।

पहले वैज्ञानिकों का क्या कहना था?

पहले वैज्ञानिकों का क्या कहना था?

इससे पहले वैज्ञानिकों को ग्रीनलैंड के बड़े इलाके में ऐसे जमे हुए सल्फर के मिलने के प्रमाण मिले थे, लेकिन तब वह मानते थे कि सल्फर की मात्रा बढ़ने का कारण 1104 में आईसलैंड के हेक्ला ज्वालामुखी का फटना था, लेकिन अब वैज्ञानिकों को प्रमाण मिले हैं कि बड़े पैमाने पर उस समय जमा हुए सल्फर का कारण हेक्ला नहीं था। साथ ही उस इलाके में सल्फर जमा होने का समय 1108 का था न कि 1104 का। वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका में भी इस तरह से सल्फर जमा होने के प्रमाण मिले हैं, जो इसी दौरान जमा हुए पाए गए हैं।

ज्वालामुखी प्रस्फुटन भी बने कारण?

ज्वालामुखी प्रस्फुटन भी बने कारण?

वैज्ञानिकों को अपने ताजा शोध में ये भी पता चला है कि सल्फर के तेजी से बढ़ने का कारण 1108 और 1110 के बीच बहुत से ज्वालामुखी का प्रस्फुटन होना भी था, जो काफी आसपास थे। माना जा रहा है कि ये ज्वालामुखी जापान के माऊंट आसामा के ज्वालामुखी थे, जो साल 1108 में फटे थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि उस घटना के लिए ज्वालामुखी बेशक अकेला कारण न हो लेकिन उसकी अहम भूमिका जरूर थी। इसके साथ ही उस वक्त यूरोप की अन्य घटनाएं भी इशारा करती हैं कि तब बहुत बड़ा असामान्य मौसमी परिवर्तन दिखाई दिया था। हालांकि वैज्ञानिकों के इस अनुमान की पुष्टि हो गई है, इस बारे में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इन सभी कड़ियों को अगर जोड़कर देखा जाए तो उनके अनुमान की पुष्टि होती भी दिख रही है।

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