Manmohan Singh Economic Reform: 1991 में आर्थिक संकट से 'डूबते' भारत को कैसे मनमोहन सिंह ने बचाया था?

Manmohan Singh Economic Reform: दुनिया के लिए भारत की अर्थव्यवस्था का दरवाजा खोलने वाला वो नेता, जिन्हें भारत की मौजूदा अर्थव्यवस्था का वास्तुकार माना जाता है और जिन्होंने देश को उसके सबसे काले वित्तीय संकटों में से एक के दौरान बचाया था, मनमोहन सिंह का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया है।

1991 में मनमोहन सिंह के ऐतिहासिक सुधारों ने न सिर्फ भारत को दिवालियापन से बचाया था, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की शक्ति से दुनिया का परिचय भी करवाया था।

Manmohan Singh Economic Reform

कितना खतरनाक था 1991 का आर्थिक संकट? ( How Manmohan Singh rescued india in 1991)

यह एक ऐसा संकट था जो पहले कभी नहीं हुआ था। 1991 के मध्य तक, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार खतरनाक रूप से कम हो गया था, मुद्रास्फीति दोहरे अंकों में थी, और एक विशाल राजकोषीय घाटे ने देश को पंगु बना दिया था। उस दौरान वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को संप्रभु डिफॉल्ट को टालने के चुनौतीपूर्ण कार्य का सामना करना पड़ा।

प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के समर्थन से, मनमोहन सिंह ने साहसिक उपाय पेश किए, जिसने दशकों की संकीर्ण आर्थिक नीतियों को खत्म कर दिया और भारत को उदारीकरण के मार्ग पर ले आया। इस समय की तात्कालिकता अभूतपूर्व कार्रवाई की मांग कर रही थी। 1991 के जुलाई में, सरकार ने रुपये का दो बार अवमूल्यन किया, जिससे भारतीय निर्यात काफी प्रतिस्पर्धी हो गया और बहुत जरूरी विदेशी मुद्रा देश में आ गई।

इसी समय, भारतीय रिजर्व बैंक ने अंतरराष्ट्रीय बैंकों को 47 टन सोना गिरवी रख दिया, जिससे विदेशी भंडार को बढ़ाने के लिए अत्यंत जरूरी 600 मिलियन डॉलर जुटाए गए। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से आपातकालीन ऋण, कुल 2 बिलियन डॉलर, ने भारत को और जरूरी राहत प्रदान की।

लेकिन ये तात्कालिक उपाय तो बस शुरुआत थे। 24 जुलाई 1991 को मनमोहन सिंह ने अपना पहला बजट पेश किया, जिसमें उन्होंने संकट मैनजमेंट से आगे बढ़कर भारत के आर्थिक भविष्य को फिर से परिभाषित करने का विजन पेश किया। बजट ने लाइसेंस राज को खत्म कर दिया, नौकरशाही नियंत्रणों का एक जाल, जिसने दशकों से औद्योगिक विकास को रोक रखा था, उसे उखाड़ फेंका। उस बजट में, विदेशी निवेश पर प्रतिबंधों को कम कर दिया गया और 51% तक इक्विटी हिस्सेदारी के लिए स्वचालित अनुमोदन की अनुमति दी, और 18 महत्वपूर्ण क्षेत्रों को छोड़कर, सभी सेक्टर्स के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग को समाप्त कर दिया गया।

हालांकि, उन आर्थिक सुधारों की एक कीमत चुकानी पड़ी। कॉर्पोरेट टैक्स बढ़ाए गए, रसोई गैस और चीनी जैसी आवश्यक वस्तुओं पर सब्सिडी कम की गई, और पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि की गई।

अपनी बेटी दमन सिंह द्वारा लिखी गई जीवनी 'स्ट्रिक्टली पर्सनल: मनमोहन और गुरशरण' में उस पल को याद करते हुए उन्होंने कहा, "उन्होंने [राव] मुझसे मजाक में यह भी कहा, कि अगर चीजें अच्छी तरह से काम करती हैं, तो हम सभी इसका श्रेय लेंगे, और अगर चीजें अच्छी तरह से काम नहीं करती हैं, तो मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा।"

नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह की सरकार ने सुधार की गति को जीवित रखा। एक नई व्यापार नीति ने आयात-निर्यात रेगुलेशन को आसान बनाया और राजा चेलिया और एम. नरसिम्हम जैसे अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व वाली समितियों ने भारत की वित्तीय और कराधान प्रणालियों में संरचनात्मक परिवर्तन पेश किए। इन सुधारों ने विदेशी निवेश को आकर्षित किया, उद्योगों का आधुनिकीकरण किया और दशकों के विकास की नींव रखी।

दो वर्षों के भीतर, भारत का विदेशी भंडार 1 बिलियन डॉलर से बढ़कर 10 बिलियन डॉलर से ज्यादा हो गया, जिसने देश को आर्थिक पतन से बचाया और इसे वैश्विक आर्थिक खिलाड़ी बनने की राह पर ला खड़ा किया।

मनमोहन सिंह की विरासत न सिर्फ उनकी परिवर्तनकारी नीतियों में निहित है, बल्कि उनके इस दृढ़ विश्वास में भी निहित है, कि भारत महानता प्राप्त कर सकता है। उनके शांत, मगर मजबूत संकल्प और परिवर्तनकारी विचारों ने भारत को एक नया रूप दिया।

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