पीएम मोदी से मिले तो क्या कहेंगे महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी
महात्मा गांधी के पोते और जाने-माने जीवनीकार, लेखक और इतिहासकार राजमोहन गांधी का कहना है कि अगर उनकी मुलाक़ात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से होती है तो वो उनसे कहेंगे कि उनकी शांति से उन्हें बहुत अफ़सोस है.
कुछ ही दिनों पहले राजमोहन गांधी की एक नई किताब प्रकाशित हुई है जिसका नाम है 'इंडिया ऑफ़्टर 1947: रिफ़लेक्शन्स एंड रिकलेक्शन्स'.
बीबीसी संवाददाता से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने अपनी इस नई किताब के अलावा भारत में लोकतंत्र और मीडिया की मौजूदा स्थिति से लेकर राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र सबके बारे में विस्तार से बातचीत की.
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मैंने उनसे पूछा कि अगर प्रधानमंत्री आपको चाय पर बुलाते हैं तो आप उनसे क्या कहना चाहेंगे. इस पर उनका जवाब था कि यह नामुमकिन है कि प्रधानमंत्री उन्हें मिलने के लिए बुलाएंगे लेकिन अगर उन्होंने बुलाया तो वो मिलने ज़रूर जाएंगे.
और जाकर वो क्या कहेंगे, इस पर राजमोहन गांधी का कहना था, "मैं उनसे (मोदी) कहूँगा कि मुझे आपकी शांति से बहुत अफ़सोस है. यहां इतना कुछ ज़ुल्म हो रहा है, पाप हो रहे हैं लेकिन आपके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला है इसका मुझे बहुत दुख है."
राजमोहन गांधी का आगे कहना था, "उनको (मोदी) यह कहना चाहिए कि यह भारत सबका है और चाहे कोई किसी भी धर्म का हो, सरकार उसकी रक्षा करेगी, उसके अधिकार की रक्षा करेगी."
लेकिन जब मैंने कहा कि प्रधानमंत्री अपने हर भाषण में यह कहते हैं तो उन्होंने इसको नकारते हुए कहा, "मोदी ऐसा नहीं कहते हैं. वो यह नहीं कहते हैं कि मैं सबका साथ दूंगा, वो कहते हैं कि सबका साथ मुझे चाहिए."
उन्होंने कहा कि आज़ादी के 75 वर्षों बाद मौजूदा भारत में लोकतंत्र की जड़ें कमज़ोर हुईं हैं. उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं को काफ़ी चोट पहुँची है. बोलने, लिखने और सभाएं करने की आज़ादी कम हो गईं हैं.
लेकिन इन सबके बावजूद भारत की जनता से उन्हें काफ़ी उम्मीद है. उन्होंने कहा कि जो लोग लोकतंत्र से प्यार करते हैं उन्हें अभी हार मानने की ज़रूरत नहीं है.
भारत की मौजूदा मीडिया के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें तो कई बार यक़ीन ही नहीं होता है कि मीडिया में जो हो रहा है वो सच है या नहीं.
राजमोहन गांधी कई वर्षों तक मीडिया से भी जुड़े रहे हैं. वो मुंबई से हिम्मत (1964-81) नाम की एक पत्रिका निकाला करते थे और इमरजेंसी (1975-77) के दौरान उन्होंने अपनी मैगज़ीन के ज़रिए तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार का जमकर विरोध किया था.
कांग्रेस पार्टी के बारे में उन्होंने कहा कि यह सच है कि पार्टी काफ़ी कमज़ोर हो गई है लेकिन कुछ हद तक पार्टी के मौजूदा नेता का उन्होंने बचाव भी किया.
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उन्होंने कहा कि दुनिया भर में एक समूह के वर्चस्व और बराबरी की लड़ाई हो रही है. अमेरिका में कहा जा रहा है कि यह सिर्फ़ गोरे अमेरिकियों का है. उनके अनुसार पिछली सदी के अंत तक बराबरी और लोकतंत्र का बोलबाला था लेकिन इस सदी में एक समूह के वर्चस्व की लड़ाई को ज़्यादा सफलता मिल रही है.
भारत में हिंदुत्ववादी ताक़तों की सफलता के बारे में उन्होंने कहा, "हिंदू राष्ट्रवाद की वकालत करने वाले लोगों के पिछे जो पैसा है वो बहुत ज़बर्दस्त है. इसलिए किसी भी राजनीतिक पार्टी को इससे संघर्ष करना इतना आसान नहीं है."
कांग्रेस के मौजूदा नेता का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि वो भी इंसान हैं, वो कोई जादू नहीं कर सकते हैं.
उन्होंने कहा कि मौजूदा कांग्रेस की विचारधारा और गांधी, नेहरू, पटेल और आज़ाद की कांग्रेस की विचारधारा में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है लेकिन इतना ज़रूर है कि कांग्रेस के कई नेताओं को लगने लगा है कि अगर वो ज़्यादा विचारधारा की बात करेंगे तो कई हिंदू उनसे ख़फ़ा हो जाएंगे.
लेकिन जब मैंने पूछा कि कांग्रेस को भारत के लाखों-करोड़ों धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं पर भरोसा क्यों नहीं है, इसके जवाब में वो कहते हैं, "उनमें से कुछ लोग डर गए हैं. मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी डर गए हैं. इस मामले में राहुल गांधी तो हर चौथे-पाँचवे दिन बोलते हैं."
राहुल गांधी और उनकी भारत जोड़ो यात्रा का उन्होंने जमकर समर्थन किया.
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उन्होंने कहा, "इस यात्रा से देश में कई अच्छी चीज़ें हो रहीं हैं. राहुल गांधी जगह-जगह रुक कर लोगों से जो कह रहे हैं वो सही बात बता रहे हैं. उनकी विचारधारा भी स्पष्ट है."
हालांकि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के चुनावी अभियान पर उन्होंने अफ़सोस जताया.
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का कोई असर होगा या नहीं, इसपर वो कहते हैं, "यह कहना मुश्किल है कि देश की राजनीति पर कोई असर पड़ेगा लेकिन देश के विचार पर इसका अच्छा प्रभाव होगा."
आम आदमी पार्टी के बारे में उन्होंने कहा कि दिल्ली में उनकी सरकार ने कुछ अच्छे काम ज़रूर किए हैं लेकिन उनके अनुसार पार्टी की दो बड़ी कमज़ोरियां हैं.
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वो कहते हैं, "पार्टी संवैधानिक अधिकारों के बारे में, हिंदू-मुस्लिम बराबरी की कोई बात नहीं करती है. इसके अलावा एक ही आदमी सबकुछ चलाता है."
कांग्रेस और कई लोग आम आदमी पार्टी को बीजेपी की बी टीम कहते हैं. इस पर उनका कहना था, "आम आदमी पार्टी में कुछ लोग ज़रूर ऐसे हैं जो आरएसएस की विचारधारा रखते हैं लेकिन पार्टी के अधिकांश लोग लोकतंत्र ही चाहते हैं. लेकिन यह उनकी कमज़ोरी है कि वो खुल्लम-खुल्ला आरएसएस की विचारधारा का विरोध नहीं करते हैं."
आम आदमी पार्टी की स्थापना के समय राजमोहन गांधी पार्टी से जुड़े थे और 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पूर्वी दिल्ली सीट से चुनाव भी लड़ा था, लेकिन वो चुनाव हार गए थे.
अब वो आम आदमी पार्टी से अलग हो चुके हैं.
अपनी किताब में उन्होंने लिखा है कि जो लोग अखंड भारत की बात करते हैं और गांधी और नेहरू को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं, वो लोग सही अर्थों में अखंड भारत नहीं चाहते हैं.
वो ऐसा आरोप क्यों लगाते हैं, इस पर वो कहते हैं, "विभाजन से भारत के लोगों को चोट पहुँची यह तो सच है. आज भारत में क़रीब 14 फ़ीसद मुसलमान हैं. अगर अखंड भारत बन जाता है, पाकिस्तान और बांग्लादेश के सब लोग एक हो जाते हैं तो भारत में मुसलमानों की जनसंख्या क़रीब 35 फ़ीसद हो जाएगी. हिंदू राष्ट्र की बात करने वाले लोग तो इससे दुखी हो जाएंगे. अखंड भारत के सबसे कड़े दुश्मन तो यही लोग हैं."
राजमोहन गांधी ने अपनी किताब के पहले चैप्टर में भगवान राम का ज़िक्र किया है. 113 पन्नों की किताब में उन्होंने 15 पन्नों का पहला चैप्टर लिखा है.
इसका कारण समझाते हुए वो कहते हैं, "राम के नाम गांधी को बहुत पसंद था. मेरे एक भाई का नाम रामचंद्र था. लेकिन गांधी के राम ईश्वर का ही नाम था जो दुनिया का मालिक है. लेकिन पिछले 20-30 सालों में जो एक अभियान चला है उनके राम कोई अलग ही लगते हैं."
उन्होंने कहा कि वाल्मीकि, कंबन, तुलसीदास, अल्लामा इक़बाल और महात्मा गांधी के राम में और पिछले कुछ सालों में जिस तरह से राम की एक छवि पेश की जा रही है उसमें बहुत फ़र्क़ है.
इसकी क्या वजह है, इस पर वो कहते हैं, "वो चाहते हैं कि एक दुश्मन को खड़ा किया जाए. और राम को दुश्मन के ख़िलाफ़ (मुसलमानों के ख़िलाफ़) एक प्रतीक के रूप में पेश किया जाए. मुसलमानों को नीचा दिखाया जाए."
लेकिन उन्होंने विश्वास जताया कि भारत के हिंदू असली राम को ही जानते हैं.
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