Lal Bahadur Shastri Jayanti: लाल बहादुर शास्त्री की मौत का राज आज भी है रहस्यमयी, आखिर उस रात क्या हुआ था?
Lal Bahadur Shastri Jayanti: भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, जो अपनी सादगी और मधुर व्यवहार के लिए प्रसिद्ध थे, 58 साल बाद भी उनकी मौत की कहानी एक रहस्य है और आज तक आम लोग नहीं जान पाए हैं, कि 11 जनवर 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सोवियत संघ के ताशकंद में रहस्यमयी परिस्थितियों में कैसे मौत हो गई थी?
यह मौत कोई साधारण मौत नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी मौत थी जिसका रहस्य आज भी अनसुलझा है। इसको लेकर तरह तरह के दावे किए जाते रहे हैं, थ्योरी बनाए गये हैं, फिल्म बने, किताबें लिखी गईं, लेख लिखे गये, लेकिन पुख्ता तौर पर आज भी कोई कुछ नहीं जानता।

भारत की ताकत का अहसास करवाने वाले प्रधानमंत्री
लाल बहादुर शास्त्री महज 19 महीने तक देश के प्रधानमंत्री रहे। लेकिन इन 19 महीनों में उन्होंने दुनिया को भारत की ताकत का एहसास कराया। 'जय जवान-जय किसान' के नारे के साथ उन्होंने 1965 के युद्ध में पाकिस्तान के अहंकार को हमेशा के लिए तोड़ दिया और पाकिस्तान का कश्मीर पर कब्जा करने का सपना चकनाचूर हो गया। 1965 के युद्ध के बाद 10 जनवरी को भारत और पाकिस्तान ने ताशकंद में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। उसी दिन दोपहर करीब 2 बजे शास्त्री जी का निधन हो गया।
किसी देश के कार्यकारी प्रधानमंत्री का किसी दूसरे देश में रहस्यमयी परिस्थितियों में मर जाना एक असाधारण बात है। लेकिन उस समय मीडिया आज की तरह सशक्त नहीं था। न तो 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल थे और न ही सोशल मीडिया। इसलिए मामले और खबरों को काफी हद तक दबा दिया जाना काफी हद तक संभव था। फिर भी, हमें लगता है कि आज उनकी मौत से जुड़े इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है।
लाल बहादुर शास्त्री की मौत से जुड़ी कुछ ऐसी बातें हैं, जिन पर कभी ज्यादा चर्चा नहीं हुई।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 27 मई 1964 को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। उनकी मौत के 13 दिन बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। यह 9 जून 1964 की बात है। यह वह दौर था, जब हमारा देश 1962 के भारत-चीन युद्ध से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था। और पाकिस्तान भी लगातार जम्मू-कश्मीर का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठा रहा था।
उस समय पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान यह जानने को उत्सुक थे कि भारत में नेहरू की जगह किस नेता ने ली है। वह वास्तव में यह देखना चाहते थे कि क्या लाल बहादुर शास्त्री एक मजबूत नेता हैं और क्या कूटनीतिक स्तर पर उनसे बातचीत करके जम्मू-कश्मीर मुद्दे को और गंभीर बनाया जा सकता है?
प्रधानमंत्री बनने के चार महीने बाद, अक्टूबर 1964 में, जब मिस्र के दौरे से लौटते हुए लाल बहादुर शास्त्री का विमान कराची हवाई अड्डे पर उतरा, तो जनरल अयूब खान ने उनसे पहली बार मुलाकात की। पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो भी उनके साथ मौजूद थे। जनरल अयूब खान और जुल्फिकार अली भुट्टो सूट-बूट में थे, जबकि लाल बहादुर शास्त्री ने सफेद धोती कुर्ता पहना हुआ था, जो उनकी सादगी को दर्शाता है। लेकिन शास्त्री की इसी सादगी को जनरल अयूब खान ने गलत समझ लिया। जनरल अयूब खान ने उन्हें धोती कुर्ता में देखा और कहा, "तो यह वह व्यक्ति है जिसने नेहरू की जगह ली है।" जनरल अयूब खान को लगता था, कि सादे धोती कुर्ते में रहने वाला एक छोटे कद का नेता संयोगवश भारत का प्रधानमंत्री बन गया है और उसे जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर घेरा जा सकता है।
लेकिन, अयूब खान की ये गलतफहमी पाकिस्तान के ऊपर बहुत भारी पड़ी।

छोटे कद के गंभीर और मजबूत राजनेता
लाल बहादुर शास्त्री का शारीरिक कद महज 5 फीट 2 इंच था, लेकिन उनके इरादे फौलादी थे। जबकि जनरल अयूब खान का कद 6 फीट दो इंच था। यानी वो शास्त्री से काफी लंबे थे और उनका पहनावा ब्रिटेन और अमेरिका के बड़े नेताओं जैसा था। कद और सादगी के आधार पर उन्होंने शास्त्री को कमजोर समझने की गलती की और मुलाकात के करीब 10 महीने बाद पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ सैन्य अभियान छेड़ दिया, जिसका मकसद हजारों घुसपैठियों को हथियारों के साथ भारत भेजकर विद्रोह कर कश्मीर को भारत से अलग करना था।
यहीं से 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की शुरुआत हुई। और इसी युद्ध को खत्म करने के लिए 10 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री और जनरल अयूब खान के बीच नौ समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। यानि, समझौते पर लाल बहादुर शास्त्री की मौत से कुछ घंटे पहले ही हस्ताक्षर हुए थे। इसमें कहा गया था कि 25 फरवरी 1966 तक दोनों देशों की सेनाएं अपनी पहले वाली स्थिति में लौट जाएंगी। भारतीय सेना के कब्जे वाले इलाके पाकिस्तान को लौटा दिए जाएंगे और जिन इलाकों पर पाकिस्तान का नियंत्रण था, वे भारत को लौटा दिए जाएंगे।
उस समय भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थित "हाजीपीर दर्रे" पर नियंत्रण कर लिया था। यह इलाका इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यहीं से पाकिस्तान अपनी सेना और कबायलियों को भारत में घुसपैठ करवाता था। इसके अलावा भारतीय सेना ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के एक बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया था और कहा जाता है, कि लाहौर में भारतीय सेना के जवान देखे गए थे। यह बात पाकिस्तान को इसलिए ज्यादा परेशान कर रही थी, क्योंकि भारतीय सेना की कार्रवाई के कारण पांच लाख लोग दूसरे इलाकों में भाग गए थे, जिससे उनकी सरकार पर दबाव बढ़ गया था। जबकि जम्मू और राजस्थान में पाकिस्तान के कब्जे वाले कुछ इलाकों में ज्यादा लोग नहीं रहते थे। इसलिए इस युद्ध में भारत की स्थिति मजबूत थी। लेकिन ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते से पाकिस्तान को कुछ हद तक फायदा हुआ।
शास्त्री जी की मौत की रात क्या हुआ था?
इस समझौते के बाद उस दिन ताशकंद में एक पार्टी रखी गई थी। इसमें शामिल होने के बाद लाल बहादुर शास्त्री रात करीब 10 बजे अपने होटल के कमरे में आए। पार्टी में थोड़ा बहुत खाने के बाद उन्हें भूख नहीं लगी थी, इसलिए उन्होंने पालक की हरी सब्जी और पसंदीदा आलू की सब्जी के साथ हल्का खाना खाया। और रात 11 बजे उन्होंने दिल्ली फोन करके अपनी पत्नी ललिता से बात की। इस दौरान उनकी पत्नी उनकी आवाज साफ नहीं सुन पाईं और इसलिए उन्होंने फोन अपनी बेटी कुसुम को थमा दिया। उन्होंने अपनी बेटी कुसुम से पूछा, कि इस समय भारत में क्या चल रहा है, जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि भारत में हर कोई जानना चाहता है कि समझौते के दौरान क्या हुआ है। शास्त्री ने फिर परिवार से भारतीय अखबार काबुल भेजने को कहा। जहां उन्हें अगले दिन पहुंचना था। ऐसा लगता है कि लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद समझौते पर संभावित प्रतिक्रियाओं को जानने के लिए थोड़े बेचैन थे।
उस दौरान वे अपने होटल के कमरे में टहलने लगे और कहा जाता है, कि दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई। बहुत कम लोग जानते हैं, कि शास्त्री जी दिल के मरीज थे और उन्हें 1959 में एक बार पहले भी दिल का दौरा पड़ा था।

इस मामले में दो सवालों के जवाब कभी नहीं मिले।
पहला- शास्त्री जी की मृत्यु के बाद उनका पोस्टमार्टम ताशकंद में क्यों नहीं किया गया और किसी ने भारत में उनके पार्थिव शरीर का पोस्टमार्टम कराना क्यों ज़रूरी नहीं समझा?
दूसरा- कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनका शरीर नीला पड़ गया था, जिससे सवाल उठता है कि क्या उन्हें ज़हर दिया गया था?
इस बात का जिक्र कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा 'बियॉन्ड द लाइन्स' में किया है, जो उस समय शास्त्री जी के प्रेस सलाहकार के तौर पर ताशकंद में मौजूद थे। उन्होंने अपनी किताब में कहा है, कि उन्हें कभी इस बात का जवाब नहीं मिल पाया कि उनका पोस्टमार्टम ताशकंद या दिल्ली में क्यों नहीं किया गया?
लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज भी रहस्य
पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत को आज भी भारतीय राजनीति के सबसे बड़े अनसुलझे रहस्यों में से एक माना जाता है। और ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब आज तक नहीं मिल पाए हैं।
पोस्टमार्टम: विदेश मंत्रालय का कहना है कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत संदिग्ध होने के बाद भी तत्कालीन यूएसएसआर में उनकी बॉडी का पोस्टमार्टम नहीं किया गया।
न्यायिक जांच नहीं: लाल बहादुर शास्त्री की मौत की कोई न्यायिक जांच नहीं हुई।
कोई कबूलनामा नहीं: शास्त्री जी की मौत के बाद किसी का बयान दर्ज नहीं किया गया।
जहर देने का शक: लाल बहादुर शास्त्री के रूसी बटलर और भारतीय राजदूत से जुड़े भारतीय रसोइए को शास्त्री को जहर देने के संदेह में केजीबी ने गिरफ्तार किया था।
गोपनीय दस्तावेज: पीएमओ के पास शास्त्री की मौत से जुड़ा एक क्लासीफाइड दस्तावेज है, जिसे आरटीआई अधिनियम के तहत भी हासिल नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उसके सार्वजनिक करने पर रोक है।
आज लाल बहादुर शास्त्री की मौत के 58 साल बीत चुके हैं, लेकिन इन सवालों के जवाब आज तक रहस्य हैं और उम्मीद है, कि एक दिन उनकी मौत के फाइल से धूल हटेगा और सच हर भारतवासी जान पाएगा।
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