khaleda zia Caste: किस जाति से थीं खालिदा जिया? परिवार में कौन-कौन? पति की हत्या के बाद आईं राजनीति में
khaleda zia Caste And Family Tree: बांग्लादेश की राजनीति में एक युग का अंत हो गया। बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP की मजबूत स्तंभ रहीं बेगम खालिदा जिया का 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे बीते 20 दिनों से वेंटिलेटर पर थीं और लंबे समय से कई गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। उनके जाने के साथ ही यह सवाल फिर चर्चा में है कि खालिदा जिया की जाति और धर्म क्या था, उनका परिवार कौन-कौन सा है और वे राजनीति में आखिर कैसे आईं।
khaleda zia Caste: खालिदा जिया की जाति-धर्म
सबसे पहले उस सवाल पर, जो गूगल पर सबसे ज्यादा सर्च किया जाता है, खालिदा जिया किस जाति की थीं। आधिकारिक और विश्वसनीय बायोग्राफिकल स्रोतों के मुताबिक खालिदा जिया मुस्लिम धर्म से थीं। उनका जन्म एक बंगाली मुस्लिम परिवार में हुआ था।

बांग्लादेश में मुस्लिम समाज में जाति व्यवस्था हिंदू समाज की तरह औपचारिक रूप से दर्ज नहीं की जाती। इसी वजह से खालिदा जिया की किसी भी आधिकारिक जीवनी, सरकारी दस्तावेज या अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में उनकी जाति का जिक्र नहीं मिलता। खालिदा जिया एक बंगाली मुस्लिम महिला थीं।
▶️ खालिदा जिया धर्म और जन्म से जुड़ी पूरी कहानी
खालिदा जिया इस्लाम धर्म को मानने वाली थीं। उनका जन्म 1945 के आसपास तत्कालीन ब्रिटिश भारत की बंगाल प्रेसीडेंसी में हुआ था। जन्मस्थान जलपाईगुड़ी माना जाता है, जो आज भारत में है। हालांकि उनका पैतृक घर बांग्लादेश के फेनी जिले के फुलगाजी उपजिला में है। उनके पिता इस्कंदर अली मजूमदार एक चाय व्यवसायी थे और माता का नाम तैयबा मजूमदार था। खालिदा पांच भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थीं।

▶️ khaleda zia Family: खालिदा जिया के परिवार में कौन-कौन?
खालिदा जिया का विवाहबांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान से 1960 में हुआ था। खालिदा जिया के बड़े बेटे तारिक रहमान आज उनकी राजनीतिक विरासत के सबसे बड़े वारिस हैं। वे BNP के कार्यवाहक अध्यक्ष हैं। 2008 से वे लंदन में रह रहे थे और 17 साल के लंबे निर्वासन के बाद 25 दिसंबर 2025 को बांग्लादेश लौटे। उनकी पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान पेशे से डॉक्टर हैं और उनकी बेटी जाइमा रहमान लंदन में रहती हैं। जाइमा पेशे से बैरिस्टर हैं और उन्हें भविष्य की राजनीति का चेहरा माना जा रहा है।
खालिदा जिया के छोटे बेटे अराफात रहमान कोको का निधन 24 जनवरी 2015 को मलेशिया में दिल का दौरा पड़ने से हो गया था। कोको राजनीति से ज्यादा खेल आयोजनों से जुड़े रहे। उनकी पत्नी शर्मिला रहमान सिथी हैं और उनकी दो बेटियां जाहिया और जाइफा हैं।
खालिदा जिया के मायके की बात करें तो उनकी बड़ी बहन खुर्शीद जहां राजनीति में सक्रिय रहीं और मंत्री भी बनीं, हालांकि उनका 2006 में निधन हो गया। उनके भाई सईद इस्कंदर भी राजनेता थे, जिनका 2012 में देहांत हो गया। जीवित भाई-बहनों में शमीम इस्कंदर, जो सेवानिवृत्त फ्लाइट इंजीनियर हैं, और बहन सेलिना इस्लाम शामिल हैं।

▶️ एक सामान्य गृहिणी से प्रधानमंत्री तक का सफर
खालिदा जिया का विवाह 1960 में जियाउर रहमान से हुआ था। उस समय जियाउर रहमान पाकिस्तानी सेना में कैप्टन थे। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में जियाउर रहमान एक बड़े सैन्य नायक के रूप में उभरे और बाद में देश के राष्ट्रपति बने। 1978 में उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना की। उस दौर में खालिदा जिया राजनीति से पूरी तरह दूर एक गृहिणी की भूमिका में थीं।
▶️ पति की हत्या ने बदली जिंदगी की दिशा
30 मई 1981 की रात चिट्टागॉन्ग में एक सैन्य विद्रोह के दौरान राष्ट्रपति जियाउर रहमान की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना खालिदा जिया की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। पति की हत्या के बाद पार्टी को नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में खालिदा जिया ने राजनीति में कदम रखा और BNP की कमान संभाली। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को एक सशक्त नेता के रूप में स्थापित किया।
▶️ दो बार बनीं प्रधानमंत्री, बनाई अलग पहचान
खालिदा जिया 1991 से 1996 और फिर 2001 से 2006 तक दो बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं। उन्हें बांग्लादेश की 'आयरन लेडी' कहा जाने लगा। 2004, 2005 और 2006 में फोर्ब्स मैगजीन ने उन्हें लगातार तीन साल दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं की सूची में शामिल किया। विदेश नीति के मोर्चे पर उनका झुकाव भारत की तुलना में पाकिस्तान की ओर अधिक माना गया। इसी वजह से उनकी छवि एक भारत विरोधी नेता की भी रही, जबकि उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना को भारत का करीबी माना जाता है।
खालिदा जिया का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति के एक पूरे दौर का अंत है। गृहिणी से प्रधानमंत्री तक का उनका सफर, पति की हत्या के बाद राजनीति में उतरने का फैसला और दशकों तक सत्ता के केंद्र में बने रहना, उन्हें इतिहास में हमेशा यादगार बनाए रखेगा।
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