इसराइल और अरब जगत में बढ़ती नज़दीकियां, क्या ईरान है निशाने पर?
इसराइल में हुई चार अरब देशों और अमेरिका की बैठक ने एक बार फिर इस ओर इशारा किया है कि मध्य-पूर्व में ईरान के ख़िलाफ़ एक नया क्षेत्रीय गठजोड़ उभर रहा है. 27 और 28 मार्च को हुई इस मुलाक़ात ने ये भी स्पष्ट कर दिया है कि अब अरब देश फ़लस्तीन विवाद के मुद्दे का हल निकाले बिना ही इसराइल के साथ संबंध बढ़ाने के लिए तैयार हैं.
इसराइली मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक, बैठक के आख़िर में इसराइली विदेश मंत्री याएर लैपिड ने बताया कि सम्मेलन में शामिल होने वाले सभी देशों के बीच ड्रोन और मिसाइल हमलों, समुद्री हमलों से सुरक्षा के लिए एक "क्षेत्रीय व्यवस्था" बनाए जाने को लेकर चर्चा हुई.
लैपिड का इशारा ईरान या उसके सहयोगी देशों की ओर था.
इसराइल के सरकारी ब्रॉडकास्टर कान के अनुसार सभी देशों ने हर साल सम्मेलन आयोजित करने पर सहमति जताई. साथ ही इन सबके बीच रक्षा और आतंक-रोधी जैसे कई अलग-अलग कार्यकारी समूहों के गठन पर भी सहमति बनी.
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दक्षिणी इसराइल के एक होटल में हुए इस सम्मेलन में संयुक्त राज्य अमीरात, बहरीन और मोरक्को के विदेश मंत्री शामिल हुए. इन तीनों देशों ने इसराइल के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए साल 2020 में समझौते किए थे. इनके अलावा मिस्र के विदेश मंत्री भी बैठक में आए थे.
इसराइली अख़बार हारेत्ज़ की ख़बर के अनुसार बीते साल दो खाड़ी देशों और मोरक्को के साथ रक्षा सहयोग के लिए रास्ते खोलने के बाद इस इलाके में ईरान की गतिविधियों के जवाब में इसराइल "क्षेत्रीय रक्षा गठजोड़" को बढ़ावा देना चाहता है.
अख़बार ने लिखा है, "ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड कॉर्प्स और उनके सहयोगियों की आक्रामक गतिविधियों का जवाब देने, फ़ारस की खाड़ी को निशाना बनाकर किए जाने वाले रॉकेट और मिसाइल हमलों से निपटने के लिए उभरते क्षेत्रीय गठबंधन का इसराइल अहम ख़िलाड़ी है."
अख़बार के मुताबिक, "ये शिखर सम्मेलन तेहरान की सरकार के साथ ही अमेरिकी प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संकेत था, जो इस समय इस गठबंधन से बातचीत कर रहा है. खाड़ी देशों, मोरक्को, मिस्र और इसराइल के बीच घनिष्ठ रक्षा संबंध अब न सिर्फ एक स्थापित तथ्य है बल्कि इसे सार्वजनिक भी कर दिया गया है."
येदियोत अहरोनॉत नाम के एक अन्य अख़बार में प्रसिद्ध कॉलमिस्ट नेहम बार्निया लिखती हैं कि ईरान और दुनिया की महाशक्तियों के बीच नए परमाणु समझौते की बातचीत के बीच इसराइल को डर है कि इससे ईरान पर लगे प्रतिबंध हट जाएंगे और आतंकवाद को भी बढ़ावा मिलेगा. यही कारण है कि इसराइल अब सुन्नी (अरब) देशों के क़रीब आ रहा है.
बार्निया ने ये भी कहा कि इस शिखर सम्मेलन में किसी फ़लस्तीनी प्रतिनिधि का न होना ये बताता है कि सिर्फ़ दिखावे के अलावा फ़लस्तीन का मुद्दा अब एजेंडा में नहीं है.
हारेत्ज़ अख़बार के मुताबिक, शिखर सम्मेलन में शामिल हुए किसी भी सदस्य देश ने ये नहीं कहा कि फ़लस्तीन के साथ कूटनीतिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए.
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फ़लस्तीन की प्रतिक्रिया
फ़लस्तीन प्रशासन ने इस शिखर सम्मेलन को मध्य पूर्व के संघर्ष के मूल मुद्दे और इसराइल की फ़लस्तीन को लेकर नीतियों से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दिया है.
फ़लस्तीन के प्रधानमंत्री मोहम्मद शतयेह ने ट्वीट किया, "इसराइल हमारे लोगों के हितों की अनदेखी कर रहा है, जिनमें से आधे उनके कब्ज़े वाले इलाकों में रह रहे हैं और बाकी आधे शरणार्थी शिविरों और निर्वासन में."
उन्होंने लिखा, "फ़लस्तीन पर इसराइल के कब्ज़े को खत्म किए बिना अरब देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने के लिए हो रही बैठकें सिर्फ़ भ्रम हैं. ये इसराइल के लिए मुफ़्त में मिले इनाम की तरह है."
फ़लस्तीनी प्रशासन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान ट्वीट किया. इसमें कहा गया कि इसराइल के प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट के लिए शांति का मतलब "इधर-उधर के देशों में गतिविधियों को सामान्य करना है." लेकिन ये आप तभी हासिल कर सकते हैं जब "फ़लस्तीन के मुद्दे को सुलझाएं" और ये मानें कि शांति का रास्ता यहीं से होकर गुज़रता है.
इससे पहले एक अन्य बयान में विदेश मंत्रालय ने कहा था कि इस शिखर सम्मेलन फर्ज़ी ईरानी परमाणु संकट पैदा करने के साथ ही फ़लस्तीन मुद्दे की बजाय इस क्षेत्र में अन्य मसलों को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से किया जा रहा है.
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