नहीं सुधरा तालिबान तो दिसंबर 2022 में भारत के पास होगा मिलिट्री एक्शन का मौका
अगर तालिबान अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ होने देता है तो क्या भारत सरकार दिसंबर 2022 में अफगानिस्तान में यूनाइटेड नेशंस की सेना उतार सकती है?
नई दिल्ली, सितंबर 03: अफगानिस्तान में आज तालिबान की सरकार का निर्माण होने जा रहा है और तालिबान ने कहा है कि नमाज के बाद नई सरकार का ऐलान किया जाएगा। वहीं, चीन ने तालिबान की सरकार बनने से पहले आर्थित मदद देने का वादा किया है, वहीं ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अगर तालिबान ने अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ होने दिया, तो दिसंबर 2022 में भारत सरकार अफगानिस्तान में सेना उतार सकती है।

तालिबान पर भारत की राय
अफगानिस्तान में बदले हालात और वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत सरकार काफी सावधानी से तालिबान को लेकर कदम उठा रही है। अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति को लेकर फिलहाल भारत, अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों के साथ खड़ा है और भारत सरकार को लगातार इनका समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिका बार बार भारत सरकार के अफगानिस्तान में किए गये काम की सराहना करता रहा है। वहीं, अगस्त महीने में यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल का अध्यक्ष भारत था और तालिबान को लेकर जो प्रस्ताव यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में पास किया गया, उसमें भारत समेत 13 देशों ने तालिबान को आतंकी संगठन नहीं माना, वहीं चीन और रूस ने प्रस्ताव पर वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया, जिसका मतलब ये हुआ कि भारत सरकार तालिबान को लेकर नजरे गड़ाए हुए है और तालिबान को मौका देने के मूड में है।

तालिबान की भारत को लेकर राय
एक तरफ भारत सरकार तालिबान के रवैये पर नजर रखे हुई है तो तालिबान भारत को लेकर असमंजस में दिखाई दे रहा है। तालिबान चाहता है कि उसे भारत से मान्यता मिले। क्योंकि, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश से मान्यता मिलने का मतलब तालिबान के लिए वैश्विक दरवाजा खुलने जैसा होगा। लिहाजा भारत पर दवाब बनाने के लिए तालिबान लगातार अपने बयान बदल रहा है। काबुल पर कब्जा करने के बाद तालिबान भारत को लेकर कई अलग अलग बयान दे चुका है। पहले तालिबान की तरफ से आधिकारिक तौर पर कहा गया कि वो अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं होने देगा। फिर तालिबान का बयान भारत और पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों को लेकर आता है कि वो भारत और पाकिस्तान के बीच नहीं आएगा, लेकिन तालिबान ने एक बार फिर से अपना बयान बदल दिया है।

कश्मीर पर तालिबान का ताजा बयान
तालिबान पहले बयान देता रहा है कि वो जम्मू-कश्मीर के मसले में अपनी टांग नहीं अड़ाएगा और भारत और पाकिस्तान को मिलकर कश्मीर के मुद्दे को सुलझाना चाहिए। लेकिन, बीबीसी से बात करते हुए तालिबान अपनी बात से पलट गया है। बीबीसी से बात करते हुए तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा है कि उसे जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाने का अधिकार है। तालिबान के प्रवक्ता ने कहा कि तालिबान किसी भी देश के खिलाफ सशस्त्र अभियान चलाना उसकी नीति का हिस्सा नहीं है, लेकिन वो कश्मीर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाने का हक रखता है। यानि, तालिबान साफ तौर पर अपनी बात से पलट चुका है और ऐसे में इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले वक्त में तालिबानी आतंकी कश्मीर की तरफ रूख करें या पाकिस्तानी दहशतगर्दों का समर्थन करे। लिहाजा, तालिबान को लेकर भारत लगातार सतर्क है और भारत के पूर्व राजनयिक अकबरूद्दीन भी इसी के पक्ष में हैं।

सैय्यद अकबरूद्दीन का नजरिया
यूनाइटेड नेशंस में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि सैय्यद अकबरूद्दीन ने साफ तौर पर कहा है कि तालिबान को लेकर तालिबान को जज अभी नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ''जमीनी हकीकत बदली जाए तो कूटनीतिक स्तर पर बारीकियां नजर आने लगती हैं। एक महीने पहले सुरक्षा परिषद में उन सभी ने एक बयान पारित किया, जिसमें कहा गया था कि इस्लामी अमीरात स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने तुरंत इसे 16 तारीख को गिरा दिया। इसके बाद उन्होंने 27 तारीख को, जिसे मैं आतंकवाद और तालिबान से जुड़ाव के संदर्भ में टी-शब्द कहता हूं, उस शब्द को छोड़ दिया। और 30 तारीख को अब उनके पास एक संकल्प है जो कुछ मायनों में एक मौन स्वीकृति है कि तालिबान शायद एकमात्र खिलाड़ी है जिसके साथ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय जुड़ सकता है। यदि 15 दिन लंबा समय था, तो कूटनीति में एक महीना बहुत लंबा समय होता है। यानि, सैय्यद अकबरूद्दीन ने साफ कहा है कि तालिबान को अभी उसके काम के आधार पर जज किया जाना है और वैश्विक समुदाय इस बात को मान रहा है कि अफगानिस्तान में फिलहाल तालिबान की एकमात्र विकल्प है।

क्या भारत उतारेगा सैनिक?
अगस्त महीने में भारत यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल का अध्यक्ष था और भारत ने पाकिस्तान और चीन को इस एक महीने में काफी परेशान किया है। यूएनएससी के अध्यक्ष को विशेषाधिकार प्राप्त रहता है कि वो वैश्विक फैसला ले सकता है। भारत अगली बार दिसंबर 2022 में एक बार फिर से यूएनएससी का अध्यक्ष बनने वाला है और अगला डेढ़ साल का वक्त ये देखने के लिए काफी होगा कि तालिबान का रवैया भारत और विश्व को लेकर कैसा रहने वाला है। अगर तालिबान ने अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए होने दिया, तो दिसंबर 2022 में बतौर यूएनएससी अध्यक्ष भारत के पास अफगानिस्तान में यूनाइटेड नेशंस की सेना को उतारने का अधिकार रहेगा। और अगर भारत यूएनएससी की सेना को फिर से अफगानिस्तान में उतारने का फैसला करता है तो फिर पूरी दुनिया की सेना को अफगानिस्तान में उतरना पड़ेगा। जिसमें पाकिस्तान और चीन की सेना को भी शामिल होना पड़ेगा। यानि, अगर तालिबान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को बढ़ाता है तो फिर भारत के पास दिसंबर 2022 में तालिबान के खिलाफ वैश्विक सेना उतारने का मौका रहेगा। हालांकि, अभी ये सिर्फ विकल्प है, जो भारत को दिसंबर 2022 में भारत के हाथ में रहेगा।












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